पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( २८५ )
आपत्प्रपन्नस्य च मोक्षणार्थं
यन्मन्त्र्यतेऽसौ परमो हि मन्त्रः ॥ २०१ ॥”
उपार्जित धनकी रक्षाके निमित्त और भविष्य लाभकी प्राप्तिके निमित्त प्राप्त
आपत्तिके दूरकरनको जो सम्मति करताहै वही परम मंत्रहै ॥ २०१ ॥”
तच्छ्रुत्वा वायस आह, - “भो ! यदि एव तत् क्रियतां
मद्वचः । एष चित्रांगोऽस्य मार्गे गत्वा किञ्चित् पल्व-
लमासाद्य तस्य तीरे निश्चेतनो भूत्वा पततु । अह-
मपि अस्य शिरसि समारुह्य मन्दैः चंचुप्रहारैः शिर
उल्लेखयिष्यामि । येन असौ दुष्टलुब्धकोऽमुं मृतं मत्वा
मम चंचुप्रहरणप्रत्ययेन मन्थरकं भूमौ क्षिप्त्वा मृगार्थं
परिधाविष्यति । अत्रान्तरे त्वया दर्भमयाणि पाशानि
खण्डनीयानि । येन असौ मन्थरो द्रुततरं पल्वं
प्रविशति” । चित्रांग आह, - “भो ! भद्रोऽयं त्वया
दृष्टो मन्त्रः नूनं मन्थरोऽयं मुक्तो मन्तव्य इति ।
उक्तञ्च-
यह सुनकर काक बोला- “भो ! यदि ऐसाहै तो मेरा वचन मानो। यह चित्रांग
इसके मार्गमें प्राप्त होकर किसी अल्प सरोवरके निकट प्राप्त हो उसके किनारे
चेतनारहित हो गिरजाय । मैं भी इसके शिरपर चढ मन्द २ चंचु प्रहारसे
शिरको (कुरेडू) खुजाऊ । जिससे यह दुष्ट लुब्धक इसको मराहुआ मानकर
मेरी चोंचप्रहारके विश्वाससे (कि यह मरगया है) मन्थरकको पृथ्वीपर छोडकर
मृगके निमित्त धावमान होगा । इसी अवसरमें तुम कुशके पाश खंडित कर
देना । जिससे यह मन्थरक शीघ्रतासे छोटे सरोवरमें प्रवेशकर जायगा”। चित्रांग
बोला- “भो ! अच्छा यह तुमने मंत्र विचारा अवश्य ही अब मन्थरकको छुटा
हुआ जानो । कहाहै-
“सिद्धं वा यदि वाऽसिद्धं चित्तोत्साहो निवेदयेत् ।
प्रथमं सर्वजन्तूनां तत्प्राज्ञो वेत्ति नेतरः ॥ २०२ ॥
सिद्ध या असिद्ध कार्यको चित्तका उत्साहही पहिले सब प्राणियोंको सूचना
दे देताहै बुद्धिमान् उसको जान लेतहूँ अन्य पुरुष नहीं ॥ २०२ ॥