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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (१५)
जो क्षणमात्र भी मनुष्योसे प्रतिष्ठित होकर जीना है, विज्ञान, शूरता, ऐश्वर्यके
गुणोंसे सहित जो जीवित है, उसके जाननेवाले उसीका नाम जीवित कहते हैं,
यो तो कौआभी बहुत कालतक जीता और बलि खाता है ॥ २४ ॥
यो नात्मना न च परेण च बन्धुवर्गे दीने दयां न कुरुते
न च मर्त्यवर्गे। किं तस्य जीवितफलं हि मनुष्यलोके काको
ऽपि जीवति चिरञ्च बलिं च भुंक्ते ॥ २५॥
जो न अपने, न दूसरोंमें, न बन्धुवर्गमें, न दीनोंमें, न मनुष्योमे दया करता
हे, मनुष्यलोकमे उसके जीनेका क्या फल है, योतो कौआभी चिरकालतक
जीता और बलि खाता है ॥ २५ ॥
सुपूरा स्यात्कुनदिका सुपूरो मूषिकाञ्जलिः ।
सुसन्तुष्टः कापुरुषः स्वल्पकेनापि तुष्यति ॥ २६ ॥
कुनदी जल्दी भर जाती है, मूषककी अञ्जली शीघ्र भरजाती है, कापुरुष
शीघ्र सतुष्ट हो जातेहैं, यह स्वल्प वस्तुसे ही सन्तुष्ट हो जाते है ॥ २६ ॥
किञ्च-
कारण कि-
किं तेन जातु जातेन मातुर्यौवनहारिणा ।
आरोहति न यः स्वस्य वंशस्याग्रे ध्वजो यथा ॥ २७ ॥
माताके यौवन हरनेवाले उस पुरुषके जन्मसे क्या है, जो अपने वंशमे
ध्वजाके अग्रभागकी समान नहीं स्थित होता है ॥ २७ ॥
परिवर्त्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।
जातस्तु गण्यते सोऽत्र यः स्फुरेच्च श्रियाधिकः ॥ २८ ॥
बदलते हुए संसारमें कौन नहीं मरा और कौन नहीं उत्पन्न हुआ, वही जन्म
लेनेवाला गिना जाता है, जो अधिक लक्ष्मीसे स्फुरायमानहो ॥ २८ ॥
किञ्च-
और भी-
जातस्य नदीतीरे तस्यापि तृणस्य जन्मसाफल्यम् ।
यत्सलिलमज्जनाकुलजनहस्तालम्बनं भवति ॥ २९ ॥