पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(२७२) पञ्चतन्त्रम् ।
सर्पाः पिबन्ति पवनं न च दुर्बलास्ते
शुष्कैस्तृणैर्वनगजा बलिनो भवन्ति ।
कन्दैः फलैर्मुनिवरा गमयन्ति कालं
सन्तोष एव पुरुषस्य परं निधानम् ॥ १६४ ॥
सर्प पवन पीतेहैं परन्तु वे दुर्बल नहीं हैं सूखे तृण खाकरही वनके हाथी
बली होतेहैं,मुनिश्रेष्ठ कन्द और फलसे समयको बितातेहैंइससे सन्तोषही पुरुषोंका
परम निधान ( आश्रय ) है ॥ १६४ ॥
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ॥ १६५ ॥
सन्तोषरूपी अमृतसे तृप्त हुए शान्त चित्तवालोंको जो सुखहै वह धनके
लोभसे इधर उधर धावमान होते हुए पुरुषोंको कहां है ॥ १६५ ॥
पीयूषमिव सन्तोषं पिबतां निर्वृतिः परा ।
दुःखं निरन्तरं पुंसामसन्तोषवतां पुनः ॥ १६६ ॥
अमृतकी समान सन्तोषको पान करनेसे परम शान्ति होतीहै असन्तोषी
पुरुषोंको निरन्तर दुःख होताहै ॥ १६६ ॥
निरोधाच्चेतसोऽक्षाणि निरुद्धान्यखिलान्यपि ।
आच्छादिते रवौ मेघैराच्छन्नाः स्युर्गभस्तयः ॥ १६७ ॥
चित्तके रुकनेसे सब इन्द्रिय रुक जातीहैं जैसे मेघके ढकनेसे सूर्यकी किरणेंभी
ढकजातीहैं ॥ १६७ ॥
वाञ्छाविच्छेदनं प्राहुः स्वास्थ्यं शान्ता महर्षयः ।
वाञ्छा निवर्त्तते नार्थैः पिपासेवाग्निसेवनैः ॥ १६८ ॥
शान्त चित्तवाले महर्षि वासनाके विच्छेदको सुख कहतेहैं अग्निके सेवनसे
प्यास जैसे निवृत्त नहीं होती ऐसेही धनसे वांछा निवृत्त नहीं होती ॥ १६८ ॥
अनिन्द्यमपि निन्दन्ति स्तुवन्त्यस्तुत्यमुच्चकैः ।
स्वापतेयकृते मर्त्याः किं किं नाम न कुर्वते ॥ १६९ ॥
मनुष्य धनके निमित्त अनिन्दितकी भी निन्दा करते हैं स्तुतिके अयोग्यकी
भलीप्रकार स्तुति करतेहैं बहुत क्या ? क्या क्या नहीं करतेहैं ॥ १६९ ॥