पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २७० ) पञ्चतन्त्रम् ।
समय उसके घरसे निकल उपभुक्तधनके घरको गया । उसने अभ्युत्थानादिसे
सत्कार कर भोजनाच्छादनका सम्मान करा और उसीके घरमें मनोहर सेजपर
सोगया । सो रात्रिमें जबतक देखता है तबतक दोनों पुरुष सम्मति करते हैं उन
दोनोंमें एक बोला,-“भो ! स्वामिन् ! उसने सोमिलकका उपकार करके बहुत
व्यय किया । सो कहो कैसे इसका उद्धार होगा इसने यह सब व्योपारीके घरसे
प्राप्त किया है”। वह बोला-“भो ! कर्म्मन् ! यह सब मेरा कृत्य है ।
परिणाम आपके आधीनहै”। तब प्रभात समय राजपुरुष राजाकी प्रसन्नता
( इनाम ) के धनको लेकर उपभुक्तधनको समर्पण करते भये । यह देखकर
वह सोमिलक विचारने लगा-“संचयसे रहित यह उपभुक्तधन अच्छा है न कि
यह गुप्तधन । कहा है-
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवित्तफलं श्रुतम् ।
रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ॥ १५७ ॥
वेद यज्ञानुष्ठानके फलवाले हैं, शास्त्रपढना देखनेका फल शील धन सुना है,
स्त्रियें रति पुत्रफलके निमित्त हैं, धनका दान और भोगही फल है ॥ १५७ ॥
तद्विधाता मां दत्तभुक्तधनं करोतु, न कार्यं मे
गुप्तधनेन”। ततः सोमिलको दत्तभुक्तधनः सञ्जातः ।
अतोऽहं ब्रवीमि- ।
सो विधाता 'मुझको दत्तभुक्त धन करे । गुप्तधनसे मेरा कुछ कार्य नहीं है'।
तब सोमिलक दत्तभुक्तधन होगया । इससे मै कहता हूं-
“अर्थस्योपार्जनं कृत्वा नैव भोगं समश्नुते ।
अरण्यं महदासाद्य मूढः सोमिलको यथा ॥ १५८ ॥”
“अर्थ उत्पन्न करके भी उसको भोग नहीं सकता जैसे बडे बनमे प्राप्त
होकर मूढ सोमलिक न भोगसका ॥ १५८ ॥”
तद्भद्र हिरण्यक ! एवं ज्ञात्वा धनविषये सन्तापो
न कार्यः । अथ विद्यमानमपि धनं भोज्यबन्ध्यतया
तत् अविद्यमानं मन्तव्यम् । उक्तञ्च-
सो हे भद्र ! हिरण्यक ! ऐसा जानकर धनके विषयमें सन्ताप मतकरो ।
सो विद्यमान भी धन भोगनेकी अशक्यतासे उसको नहीं की बराबर मानना
चाहिये । कहा है-