पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
जैसे छाया और धूप परस्पर सम्बद्ध हैं इसी प्रकार कर्म और उसका कर्ता
परस्पर संघटित हैं ॥ १३७ ॥
तस्मादत्र एव व्यवसायपरो भव ” । कौलिक आह-
“ प्रिये ! न सम्यगभिहितं भवत्या, व्यवसायं विना कर्म
न फलति । उक्तञ्च-
इस कारणसे यहीं रोजगार करो ” कौलिक बोला,--“प्रिये ! तुमने अच्छा
नहीं कहा । रोजगारके बिना कर्मसिद्धि नहीं होती । कहा है-
यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते ।
तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम् ॥ १३८ ॥
जैसे एक हाथसे ताली नहीं बजती इसी प्रकार उद्यम त्यागनेसे कर्मफल
नहीं होता है ॥ १३८ ॥
पश्य कर्मवशात्प्राप्तं भोज्यकालेऽपि भोजनम् ।
हस्तोद्यमं विना वक्त्रे प्रविशेन्न कथञ्चन ॥ १३९ ॥
देखो भोजनके समय प्राप्त हुआभी अन्न हाथके उद्यमके बिना मुखमें किसी
प्रकार प्रवेश नहीं करसक्ता ॥ १३९ ॥
तथाच-
तैसेही-
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी-
दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ॥ १४० ॥
उद्योगी पुरुषसिंहको लक्ष्मी प्राप्त होती है दैव देता है यह कायर कहते हैं
दैवको पृथक् कर आत्मशक्तिसे पुरुषार्थकर यत्न करनेसेभी यदि सिद्धि न हो तो
किसका क्या दोष है ॥ १४० ॥
तथाच-
ओरभी-
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सिंहस्य सुप्तस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ १४१ ॥