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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( २५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अतएव विवेकिनो जितात्मानो धनस्पृहां न कुर्वन्ति ।
उक्तञ्च-
इसी कारण ज्ञानी और आत्माके जीतनेवाले पुरुष धनमें स्पृहा नहीं करते
हैं। कहा है-
सुसञ्चितैर्जीवनवत्सुरक्षितै
र्निजेऽपि देहे न वियोजितैः क्वचित् ।
पुंसो यमान्तं व्रजतोऽपि निष्ठुरै-
रेतैर्धनैः पञ्चपदी न दीयते ॥ १२४ ॥
अति कष्टसे संचित किये प्राणकी समान रक्षित अपनी देहसे किसी प्रकारभी
न नियुक्त किये निष्ठुरधन यमलोकको जाते मनुष्यके पीछे पांच पदभी गमन नहीं
करते हैं ॥ १२४ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
यथामिषं जले मत्स्यैर्भक्ष्यते श्वापदैर्भुवि ।
आकाशे पक्षिभिश्चैव तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ १२५ ॥
जैसे मांस जलमें मच्छोंसे, पृथ्वीमें हिंसक जीवोंसे, आकाशमें पक्षियोंसे खाया
जाता है । इसी प्रकार सर्वत्र धनवान् खाया जाता है ॥ १२५ ॥
निर्दोषमपि वित्ताढ्यं दोषैर्योजयते नृपः ।
निर्धनः प्राप्तदोषोऽपि सर्वत्र निरुपद्रवः ॥ १२६ ॥
निर्दोषी धनीकोभी राजा दोषसे दूषित करता है, और निर्धनी दोषको प्राप्त
होकरभी सदा उपद्रवसे हीन रहता है ॥ १२६ ॥
अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानां च रक्षणे ।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान्कष्टसंश्रयान् ॥ १२७ ॥
धनके इकट्ठा करनेमे दुःख, इकट्ठा कियेके रक्षा करनेमें दुःख, नाशमें दुःख,
खर्चमें दुःख, कष्टके आश्रयवाले धनको धिक्कार है ॥ १२७ ॥
अर्थार्थी यानि कष्टानि मूढोऽयं सहते जनः ।
शतांशेनापि मोक्षार्थी तानि चेन्मोक्षमाप्नुयात् ॥ १२८ ॥
यह मूढमनुष्य धनके निमित्त जितना कष्ट सहता है मोक्षकी इच्छावाला
उसके सौ वें अंश परिश्रम करे तो मुक्त होजाय ॥ १२८ ॥