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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( १२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
हुआ, वहां मरकतमणीकी समान छोटे तृणके अग्रभाग भक्षण करता हुआ कुछ
दिनोंमें शिवजीके वृषभके समान स्थूल ककुदवाला बलवान् हुआ प्रतिदिन
वल्मीकके शिखरके अग्रभागोंको शृंगोंसे विदीर्ण करता गर्जता रहा । कहाभी
सत्य है कि-
अरक्षितं तिष्ठति दैवराक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विन-
श्यति ॥ २० ॥
अप्रतिपालित वस्तु दैवसे रक्षित हुई स्थित रहती है, भली प्रकार रक्षित हुई
वस्तुभी दैवसे अरक्षितहो नष्ट होजातीहै, अनाथभी वनमे त्यागन किया जीताहै
यत्न करनेपरभी घरमें नहीं जीताहै, वंशस्थ वृत्त ॥ २० ॥
अथ कदाचित् पिंगलको नाम सिंहः सर्वमृगपरिवृतःपिपा-
साकुल उदकपानार्थं यमुनातटमवतीर्णः सञ्जीवकस्य गम्भीर-
तरारावं दूरादेव अशृणोत् । तच्छ्रुत्वा अतीव व्याकुलहृदयः
ससाध्वसमाकारं प्रच्छाद्य वटतले चतुर्मण्डलावस्थानेन अव-
स्थितः । चतुर्मण्डलावस्थानं त्विदम्-सिंहः सिंहानुयायिनः
काकरवाः किंवृत्ता इति । अथ तस्य करटकदमनकनामानौ द्वौ
शृगालौ मन्त्रिपुत्रौ भ्रष्टाधिकारौ सदानुयायिनौ आस्ताम् ।
तौ च परस्परं मन्त्रयतः। तत्र दमनकोऽब्रवीत्-“भद्र करटक !
अयं तावदस्मत्स्वामी पिङ्गलक उदकग्रहणार्थं यमुनाकक्ष-
मवतीर्य्य स्थितः स किं निमित्तं पिपासाकुलोऽपि निवृत्त्य
व्यूहरचनां विधाय दौर्मनस्येनाभिभूतोऽत्र वटतले स्थितः”।
करटक आह-“भद्र ! किमावयोरनेन व्यापारेण । उक्तञ्च यतः-
एक समय पिंगलक नाम सिंह सम्पूर्ण मृगोंसे युक्त प्याससे व्याकुल जल
पीनेके निमित्त यमुनाके किनारे प्राप्त हुआ, संजीवकका अधिक गम्भीर शब्द दूरसे
सुनता भया । वह सुन अत्यन्त व्याकुल हृदय होकर भयके आकारको छिपाकर
वटवृक्षके नीचे चतुर्मण्डलावस्थान ( जिसके चारों ओर मृग बैठे हों ) से बैठा ।
चतुर्मण्डलावस्थान इसको कहतेहैं, कि सिंह,सिंहानुयायी, काकरव (काककेसे शब्द
करनेवाले ), किंवृत्त (क्यों उपस्थित हुआ है, इस वृत्तान्तके जाननेवाले ) बैठे ।