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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। ( २४३ )
न तथा बाध्यते लोके प्रकृत्या निर्धनो जनः।
यथा द्रव्याणि संप्राप्य तैर्विहीनः सुखे स्थितः ॥ ९७ ॥
प्रकृतिसे निर्धन मनुष्य इस प्रकार नहीं क्लेशित होता है जैसे द्रव्यको प्राप्त
होकर फिर उसके बिना दुःखमें स्थित होता है ॥ ९७ ॥
शुष्कस्य कीटखातस्य वह्निदग्धस्य सर्वतः।
तरोरप्यूषरस्थस्य वरं जन्म न चार्थिनः ॥ ९८ ॥
सूखे कीडके खाये हुए सब प्रकार अग्निमें जले ऊषरमें स्थित वृक्षका भी
जन्म सफल है भिक्षुकका नहीं ॥ ९८ ॥
शङ्कनीया हि सर्वत्र निष्प्रतापा दरिद्रता ।
उपकर्तुमपि प्राप्तं निःस्वं सन्त्यज्य गच्छति ॥ ९९ ॥
प्रतापहीन दरिद्रतासे सदा शंका करनी चाहिये, उपकार करनेको प्रवृत्त
हुआ भी निर्धन जनको छोड़कर चला जाता है ॥ ९९ ॥
उन्नम्योन्नम्य तत्रैव निर्धनानां मनोरथाः।
हृदयेष्वेव लीयन्ते विधवास्त्रीस्तनाविव ॥ १०० ॥
निर्धनी पुरुषोंके मनोरथ उठ उठकर वहीं लय हो जाते हैं, अर्थात् विध-
वाके कुचोंकी समान मनोरथ मनमेंही लीन हो जाते हैं ॥ १०० ॥
व्यक्तेऽपि वासरे नित्यं दौर्गत्यतमसावृतः ।
अग्रतोऽपि स्थितो यत्नान्न केनापीह दृश्यते ॥ १०१ ॥”
प्रगट दिनमेंभी नित्यही दुर्गतिरूपी अंधकारसे आवृत हुआ, आगे स्थित
हुआभी किसीको दिखाई नहीं देता ॥ १०१ ॥”
एवं विलप्य अहं भग्नोत्साहस्तन्निधानं गण्डोपधानीकृतं
दृष्ट्वा स्वं दुर्गं प्रभाते गतः। ततश्च मद्भृत्याः प्रभाते गच्छन्तो
मिथो जल्पन्ति-“अहो ! असमर्थोऽयमुदरपूरणेऽस्माकम् ।
केवलमस्य पृष्ठलग्नानां बिडालादिविपत्तयः तत् किमनेन
आराधितेन। उक्तञ्च-
इस प्रकारसे विलापकर मैं भग्नोत्साह होकर उस धनको कंधेके नीचे धरा
देखकर प्रभात समय अपने दुर्गमें गया, तब मेरे भृत्य प्रातःकाल जाते हुए
परस्पर कहने लगे-“अहो ! यह हमारे उदरपूर्ण करनेमें असमर्थ है और अब