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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

( २२४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

रोप्य मां तत्र प्रापयिष्यसि । नान्यथा मम गतिः अस्ति” ।
तत् श्रुत्वा सानन्दं वायस आह,—“यदि एवं तद्धन्योऽहं
यद्भवतापि सह तत्र कालं नयामि। अहं सम्पातादिकान्
अष्टौ उड्डीनगतिविशेषान् वेद्मि । तत्समारोह मम पृष्ठं, येन
सुखेन त्वां तत्सरः प्रापयामि” । हिरण्यक आह,—“उड्डी-
नानां नामानि श्रोतुमिच्छामि” । स आह,
हिरण्यक बोला,—“जो ऐसाहै तो मैं भी तुम्हारे साथ जाऊंगा, मुझे भी बडा
दुःखहै” काक बोला,—“भो तुमको क्या दुःखहै। सो कहो” हिरण्यक बोला,—
“इस विषयमें बहुत कुछ कहनाहै वहाँ जाकर सब विस्तारपूर्वक कहूंगा”
काक बोला,—“मैं तो आकाशगतिहूं सो आप कैसे मेरे साथ चलोगे” । वह
बोला-“यदि मेरे प्राणोंकी रक्षा करताहै तो मुझे भी पीठपर चढाकर अपने
साथ लेचल । अन्यथा मेरी गति नहीं है” । यह सुन आनन्दसे वायसबोला,—
“जो ऐसाहै तो मैं धन्यहू जो आपके साथमें समयको व्यतीत करूं मैं सम्पा-
तादि आठ उडनेकी गतिविशेष जानताहू । सो मेरी पीठपर चढो जिससे सुखसे
तुझे उस सरोवरको प्राप्तकरूं” । हिरण्यकने कहा-“उडनेकी गतियोंके नाम
सुननेकी इच्छा करताहू” वह बोला,—
सम्पातं विप्रपातञ्च महापातं निपातनम् ।
वक्रं तिर्य्यक् तथा चोर्ध्वमष्टमं लघुसंज्ञकम् ॥ ६० ॥”
सम्पात, विप्रपात, महापात, निपात, वक्रगति, तिर्यक्, (तिरछीगति),
ऊर्ध्वगति, आठवीं लघुसंज्ञक गति ॥ ६० ॥”
तच्छ्रुत्वा हिरण्यकः तत्क्षणादेव तदुपरि समारूढः।
सोऽपि शनैः शनैः तमादाय सम्पातोड्डीनप्रस्थित-
क्रमेण तत्सरः प्राप्तः । ततो लघुपतनकं मूषकाधिष्ठितं
विलोक्य दूरतोऽपि देशकालवित् असामान्यकाको-
यमिति ज्ञात्वा सत्वरं मन्थरको जले प्रविष्टः। लघुपतन-
कोऽपि तीरस्थतरुकोटरे हिरण्यकं मुक्त्वा शाखाग्रमा-
रुह्य तारस्वरेण प्रोवाच,—“भो मन्थरक ! आगच्छा-
गच्छ तव मित्रमहं लघुपतनको नाम वायसः चिरात्