पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२११)
एवमुक्त्वा चित्रग्रीवस्य पाशं छेत्तुमुद्यतं स तमाह-"भद्र
मा मैवं कुरु, प्रथमं मम भृत्यानां पाशच्छेदं कुरु तदनु
ममापि च"। तच्छ्रुत्वा कुपितो हिरण्यकः प्राह-'भो ! न
युक्तमुक्तं भवता यतः स्वामिनोऽनन्तरं भृत्याः"। स आह,-
"भद्र ! मा मैवं वद, मदाश्रयाः सर्वे एते वराकाः, अपरं स्व-
कुटुम्बं परित्यज्य समागताः । तत् कथमेतावन्मात्रमपि
सम्मानं न करोति । उक्तञ्च-
ऐसा कह चित्रग्रीवके पाश छेदन करनेको उद्यत हुए उससे बोला-"भद्र !
ऐसा मतकरो, पहले मेरे भृत्योंके पाश छेदन करो पीछे मेरे भी" यह सुन क्रोध
कर हिरण्यक बोला-"भो ! आपने युक्त नहीं कहा कारण कि, स्वामीके अन-
न्तर भृत्य होते हैं"। वह बोला-"भद्र ! ऐसा मत कहो यह सब क्षुद्र मेरे
वशमें हैं और यह अपना कुटुम्ब त्याग कर मेरे साथ आये हैं । सो कैसे इत-
नाभी इनका सन्मान न करूं। कहा है-
यः सम्मानं सदा धत्ते भृत्यानां क्षितिपोऽधिकम् ।
वित्ताभावेऽपि तं दृष्ट्वा ते त्यजन्ति न कर्हिचित् ॥ २४ ॥
जो राजा भृत्योंका सदा अधिक सन्मान करता है वे धनके अभावमें भी
उसको कभी त्यागन नहीं करते हैं ॥ २४ ॥
तथाच-
और देखो-
विश्वासः सम्पदां मूलं तेन यूथपतिर्गजः ।
सिंहो मृगाधिपत्येऽपि न मृगैः परिवार्यते ॥ २५ ॥
विश्वासही सम्पत्तियोंकी जड है इससेही हाथी यूथपति कहलाता है
सिंह मृगाधिपति होकरभी मृगोंसे परिवारित नहीं होता है ॥ २५ ॥
अपरं मम कदाचित् पाशच्छेदं कुर्वतस्ते दन्तभंगो भवति
अथवा दुरात्मा लुब्धकः समभ्येति । तत् नूनं मम नरकपात
एव । उक्तञ्च-
और फिर कदाचित् मेरे पाश छेदन करनेमें तेरे दात भग होजाय अथवा
यह दुरात्मा लुब्धकही आजाय तो अवश्य मेरा नरकमें पतन होगा । कहा है-