सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

भाषाटीकासमेतम् । (२०७)
विधिके पराङ्मुख होनेमें किस प्रकार धनका उदय हो सकता है वह
औरकोभी ग्रहण कर शंखनिधि ( न छिपाई ) की समान नष्ट हो जातीहै ॥११॥
तदास्तां तावत् विहङ्गामिषलोभो यावत् कुटुम्बवर्त्तनो-
पायभूतं जालमपि मे नष्टम्” । चित्रग्रीवोऽपि लुब्धकमदर्श-
नीभूतं ज्ञात्वा तानुवाच-“भो ! निवृत्तः स दुरात्मा लुब्धकः ।
तत्सर्वैरपि स्वस्थैर्गम्यतां महिलारोप्यस्य प्रागुत्तरदिग्भागे
तत्र मम सुहृत् हिरण्यको नाम मूषकः सर्वेषां पाशच्छेदं
करिष्यति । उक्तञ्च-
पक्षियोंके मासका लोभ तो अलग रहा कुटुम्बकी आजीविकाका उपायभूत
मेरा जालभी नष्ट हुआ” । चित्रग्रीवभी लुब्धकको नेत्रोंसे अलक्षित देखकर
उनसे बोला,-“भो ! वह दुरात्मा लुब्धक निवृत्त हुआ । सो सब स्वस्थ होकर
महिलारोप्यके उत्तर दिशाकी ओर चलो वहा, मेरा सुहृत् हिरण्यक नाम मूष-
कराज सबके पाश छेदन करेगा । कहाहै-
सर्वेषामेव मर्त्यानां व्यसने समुपस्थिते ।
वाङ्मात्रेणापि साहाय्यं मित्रादन्यो न सन्दधे ॥ १२ ॥”
सम्पूर्ण मनुष्योंको व्यसन उपस्थित होनेमे वाणीमात्रकीभी सहायताको
मित्रके विना कौन कर सकता है ॥ १२ ॥”
एवं ते कपोताः चित्रग्रीवेण सम्बोधिताः महिलारोप्ये
नगरे हिरण्यकबिलदुर्गं प्रापुः । हिरण्यकोऽपि सहस्रमुख-
बिलदुर्गं प्रविष्टः सन् अकुतोभयः सुखेन आस्ते, अथवा
साधु इदमुच्यते ।
इस प्रकार चित्रग्रीवसे कहे हुए वे कबूतर महिलारोप्य नगरमें हिरण्यकके
बिलदुर्गको प्राप्त हुए । हिरण्यक भी सहस्र मुखके बिलदुर्गमें प्रविष्ट हुआ निर्भय
सुखसे रहताथा । अथवा अच्छा कहाहै कि-
अनागतं भयं दृष्ट्वा नीतिशास्त्रविशारदः ।
अवसन्मूषकस्तत्र कृत्वा शतमुखं बिलम् ॥ १३ ॥
वे आये हुए भयका देखनेवाला नीतिशास्त्रमें पंडित मूषिक सौ मुखका बिल
बनाकर आनन्दसे रहताथा ॥ ३ ॥