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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (२०५)
तथाच-
और देखो-
कृतान्तपाशबद्धानां दैवोपहतचेतसाम् ।
बुद्धयः कुब्जगामिन्यो भवन्ति महतामपि ॥ ५ ॥
कृतान्त पाशमे बंधे हुए, दैवसे हतचित्त, महत्पुरुषोकी बुद्धिभी कुटिलगा-
मिनी होजाती है ॥ ५ ॥
अत्रान्तरे लुब्धकस्तान् बद्धान् विज्ञाय प्रहृष्टमनाः प्रोद्यत-
यष्टिः तद्वधार्थं प्रधावितः । चित्रग्रीवोऽपि आत्मानं सपरि-
वारं बद्धं मत्वा लुब्धकमायान्तं दृष्ट्वा तान् कपोतानूचे-
"अहो ! न भेतव्यम् । उक्तञ्च-
इस अवसरमें वह लुब्धक उनको बँधा हुआ जानकर प्रसन्न मन लकडी
उठाये हुए उनके वधके निमित्त धावमान हुआ, चित्रग्रीवभी अपनेको बँधा
हुआ और लुब्धकको आया हुआ देखकर उन कबूतरोंसे बोला,-"भो ! डरना
न चाहिये। कहा है-
व्यसनेष्वेव सर्वेषु यस्य बुद्धिर्न हीयते ।
स तेषां पारमभ्येति तत्प्रभावादसंशयम् ॥ ६ ॥
सब प्रकारके व्यसन प्राप्त होनेमें जिसकी बुद्धि हीन नहीं होती है उसके
प्रभावसे वह निःसन्देह उसके पार होजाता है ॥ ६ ॥
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ॥ ७ ॥
सम्पत्ति और विपत्तिमें महात्मा एकरूप रहते हैं सूर्य उदय और अस्तमेंभी
लाल रहता है ॥ ७ ॥
तत्सर्वे वयं हेलया उड्डीय सपाशजाला अस्य अदर्शनं
गत्वा मुक्तिं प्राप्नुमः, नो चेद्भयविक्लवाः सन्तो हेलया समु-
त्पातं न करिष्यथ, ततो मृत्युमवाप्स्यथ । उक्तञ्च-
सो हम सब लीलासेही उडकर पाशजाल सहित इसके अदर्शनको प्राप्त
होकर छूटें । और नहीं तो भयसे व्याकुल हो लीलासेही न उडोगे तो मृत्युको
प्राप्त होगे। कहाहै-