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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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अथ
मित्रसम्प्राप्तिर्नाम द्वितीयं तन्त्रम् ।
अथ इदमारभ्यते मित्रसम्प्राप्तिर्नाम द्वितीयं तन्त्रं तस्य
अयमाद्यः श्लोकः-
अब यह आरंभ किया जाता है मित्रसम्प्राप्ति नामवाले दूसरे तंत्रके जिसका-
यह पहिला श्लोक है-
असाधना अपि प्राज्ञा बुद्धिमन्तो बहुश्रुताः ।
साधयन्त्याशु कार्याणि काकाखूमृगकूर्मवत् ॥ १ ॥
निरुपायभी विद्वान् बुद्धिमान् बहुत शास्त्रदर्शी शीघ्र अपने कार्यको काक
चूहे मृग कच्छपकी समान सिद्ध करते हैं ॥ १ ॥
तद्यथा अनुश्रूयते-
सो यों सुना है-
अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नग-
रम् । तस्य न अतिदूरस्थो महोच्छ्रायवान् नानाविहं-
गोपभुक्तफलः कीटैरावृतकोटरः छायाश्वासितपथिक-
जनसमूहो न्यग्रोधपादपो महान् । अथवा युक्तम्-
कि, दक्षिणके देशमें महिलारोप्य नाम नगर है, उसके निकटही बडी छाया-
वाला अनेक पक्षियोंसे फल खाया हुआ, कीटोंसे भरीखोडळवाला छायामें
पथिक जनोंको आश्वासन देनेवाला एक बडा न्यग्रोध (वट) का पेड है ।
अथवा कहा है-

  • छायासुप्तमृगः शकुन्तनिवहैर्विष्वग् विलुप्तच्छदः
    कीटैरावृतकोटरः कपिकुलैः स्कन्धे कृतप्रश्रयः ।
    विश्रब्धं मधुपैर्निपीतकुसुमः श्लाघ्यः स एव द्रुमः ।
    सर्वाङ्गैर्बहुसत्त्वसङ्गसुखदो भूभारभूतोऽपरः ॥ २ ॥