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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

भाषाटीकासमेतम् । ( १९१ )
यत्नादपि कः पश्येच्छिखिनामाहारनिःसरणमार्गम् ।
यदि जलदध्वनिमुदितास्त एव मूढा न नृत्येयुः ॥ ४४२ ॥
यत्नसेभी मोरोंके भोजनके ( घीट ) निकलनेके मार्गको कौन देख सक्ता है
यदि मेघकी ध्वनिसे प्रसन्नहुए वेही मूढ न नृत्य करें ॥ ४४२ ॥
यदि त्वं स्वामिनं एनां दशां नयसि तदस्मद्विधस्य का
गणना । तस्मात् मम आसन्नेन भवता न भाव्यम् । उक्तञ्च-
जो तू स्वामीको इस दशामें प्राप्त करता है सो फिर हम सरीकोंकी क्या
गणना है ! इस कारण मेरे समीपमें तुमको रहना उचित नहीं है । कहा है-
तुलां लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः ।
राजँस्तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः ॥ ४४३ ॥”
जहा सहस्रलोहकी तुलाको चूहे खाजाते हैं हे राजन् ! वहीं बालकको
श्येन लेजाता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ४४३ ॥ ”
दमनक आह,-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत-
दमनक बोला,-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-
कथा २१.
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्रः ।
स च विभवक्षयात् देशान्तरगमनमना व्यचिन्तयत् ।
किसी स्थानमें एक जीर्णधन नामवाला वणिक्पुत्र रहताथा वह धनके क्षयसे
देशान्तरमें जानेकी इच्छासे विचारने लगा । कि,
“यत्र देशेऽथवा स्थाने भोगान्भुक्त्वा स्ववीर्यतः ।
तस्मिन्विभवहीनो यो वसेत्स पुरुषाधमः ॥ ४४४ ॥
जिस देश वा जिस स्थानमें अनेक भोगोंको अपने पराक्रमसे भोगे उस
स्थानमें जो ऐश्वर्यहीन होकर वसे वह पुरुष नीच है ॥ ४४४ ॥
तथाच-
तैसेही-
येनाहङ्कारयुक्तेन चिरं विलसितं पुरा ।
दीनं वदति तत्रैव यः परेषां स निन्दितः ॥ ४४५ ॥”