सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 203

( १८८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
“सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात्रि,
दोनों संध्या और धर्म मनुष्यके कर्तव्यको जानता है ॥ ४३८ ॥
भगवति वनदेवते ! आवयोर्मध्ये यः चौरः त्वं कथय” .
अथ पापबुद्धिपिता शमीकोटरस्थः प्रोवाच-“भोः ! शृणुत
शृणुत धर्मबुद्धिना हतमेतद्धनम्”। तदाकर्ण्य सर्वे ते राज-
पुरुषा विस्मयोत्फुल्ललोचना यावद्धर्मबुद्धेः वित्तहरणोचितं
निग्रहं शास्त्रदृष्ट्या अवलोकयन्ति तावद्धर्मबुद्धिना तच्छ-
मीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना सन्दीपितम् ।
अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरेऽर्द्धदग्धशरीरः स्फुटिते-
क्षणः करुणं परिदेवयन् पापबुद्धिपिता निश्चक्राम । ततश्च
तैः सर्वैः पृष्टः-“भोः ! किमिदम् ?” इत्युक्ते स पापबुद्धिवि-
चेष्टितं सर्व्वमिदं निवेदयित्वा उपरतः । अथ ते राजपुरुषाः
पापबुद्धिं शमीशाखायां प्रतिलम्ब्य धर्मबुद्धिं प्रशस्य इद्-
मूचुः-“अहो ! साधु चेदमुच्यते-
भगवति वनदेवते ! हम दोनोंके बीचमें जो चोरहो उसको तुम कहो” तब
पापबुद्धिका पिता शमीकी खखोडलमेंसे बोला--“भो ! सुनो २ यह धन धर्मबुद्धिने
हरण किया है” यह सुनकर वे सब राजपुरुष विस्मयसे खिले नेत्रवाले जबतक
धर्मबुद्धिको धनहरणके उचित दंडको शास्त्रदृष्टिसे देखते हैं तबतक धर्मबुद्धिने
उस शमीकी खखोडल अग्निभोज्य ( तृणादि ) द्रव्यसे ढककर उसमें आग
लगादी । तब उस शमीकोटरके जलनेपर अर्ध दग्धशरीरवाला नेत्रफूटा करु-
णास्वरसे चिल्लाता हुआ पापबुद्धिका पिता निकला. तब उन सबने पूछा--
“भोः ! यह क्या है ?” । ऐसा कहनेपर वह इस सब पापबुद्धिकी चेष्टाको
निवेदन कर मरगया । तब वे राजपुरुष पापबुद्धिको शर्माशाखामें बांधकर धर्मबु-
द्धिकी प्रशंसा कर यह बोले--“अहो ! यह सत्य कहा है-
उपायं चिन्तयेत्प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् ।
पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः ॥ ४३९ ॥”
बुद्धिमान् उपायकी चिन्ता कर अपायकीभी चिन्ता करे । मूर्ख बगलेके देखते
नौलेने उसके बच्चे खालिये ॥ ४३९ ॥”