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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( १५२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
टिट्टिभी बोली-"अवश्यही यदि समुद्रसे विग्रह करतेहो तो और विहंगमोंको
बुलाकर सुहृज्जनोंके सहित ऐसाकर । कहाहै-
बहूनामप्यसाराणां समवायो हि दुर्जयः।
तृणैरावेष्ट्यते रज्जुर्यया नागोपि बध्यते ॥ ३६१ ॥
बहुत निर्बलोंका समूहभी दुर्जय है तिनकोंसे बनी हुई रस्सीमें हाथी बांध
लिये जाते हैं ॥ ३६१ ॥
तथाच-
औरभी कहते है-
चटकाकाष्ठकूटेन मक्षिकादर्दुरैस्तथा ।
महाजनविरोधेन कुञ्जरः प्रलयं गतः ॥ ३६२ ॥
काष्ठ कूटसे चटका, मेडकोसे मक्षिका तथा महाजनोंके विरोधसे हाथी
प्रलयको प्राप्त हुआ ( नाश होगया ) ॥ ३६२ ॥"
टिट्टिभ आह-"कथमेतत् !" सा प्राह-
टिट्टिभ बोला,-"यह कैसे ?" वह बोली-
कथा १५.
कस्मिंश्चिद्वनोद्देशे चटकदंपती तमालतरुकृतनिलयौ
प्रतिवसतः । अथ गच्छता कालेन संततिरभवत् ।
अन्यस्मिन्नहनि प्रमत्तो गजः कश्चित्तं तमालवृक्षं धर्मा-
र्तश्छायार्थी समाश्रितः । ततो मदोत्कर्षात्तां तस्य
शाखां चटकाक्रान्तां पुष्कराग्रेणाकृष्य बभञ्ज । तस्याः
भंगेन चटकाण्डानि सर्वाणि विशीर्णानि । आयुः-
शेषतया च चटकौ कथमपि प्राणैर्न वियुक्तौ । अथ
साण्डभंगाभिभूता प्रलापान्कुर्वाणा न कथंचिदति-
ष्ठत । अत्रान्तरे तस्यास्तान्प्रलापाञ्छ्रुत्वा काष्ठकूटो
नाम पक्षी तस्याः परमसुहृत्तद्दुःखदुःखितोऽभ्येत्य तामु-
वाच-"भवति ! किं वृथाप्रलापेन । उक्तञ्च-
किसी एक वनके निकट चटक चटकी तमालवृक्षमें घोंसला बनाकर रहते
थे । कुछ समयके उपरान्त उनके सन्तान हुई । किसी दिन मत्त हुआ धनका