सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

( १४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
विद्यमाना गतिर्येषामन्यत्रापि सुखावहा ।
ते न पश्यन्ति विद्वांसो देहभङ्गं कुलक्षयम् ॥ ३४९ ॥”
जिनको अन्य स्थानमें सुखदायक गति विद्यमान है वे विद्वान् देहभंग और
कुलक्षयको नहीं देखते हैं ॥ ३४९ ॥”
तदाकर्ण्य प्रत्युत्पन्नमतिः प्राह-“अहो ! सत्यमभिहितं
भवता,ममापि अभीष्टमेतत्, तदन्यत्र गम्यतामिति । उक्तञ्च-
यह सुन प्रत्युत्पन्नमति बोला-“अहो ! आपने सत्य कहा, यह मुझकोभी
अभीष्टहै सो अन्य स्थानमें जाना चाहिये । कहाहै-
: परदेशभयाद्भीता बहुमाया नपुंसकाः ।
स्वदेशे निधनं यान्ति काकाः कापुरुषा मृगाः ॥ ३५० ॥
परदेशके भयसे भीत बहुत ममतावाले नपुंसक काक कापुरुष और मृग
वहीं मृतक होजातेहैं ॥ ३५० ॥
यस्यास्ति सर्वत्र गतिः स कस्मात्
स्वदेशरागेण हि याति नाशम् ।
तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणाः
क्षारं जलं कापुरुषाः पिबन्ति ॥ ३५१ ॥ ”
जिसको सर्वत्रगति विद्यमानहै वह अपने देशके रागसे क्यों नाश होताहै
पिताका कुआँहै ऐसा विचार कर खारे पानीको पुरुष पीते हैं ॥ ३५१ ॥”
अथ तत्समाकर्ण्य प्रोच्चैर्विहस्य यद्भविष्यः प्रोवाच,-
“अहो ! न भवद्भ्यां मन्त्रितं सम्यगेतदिति । यतः किं वाङ्-
मात्रेणापि तेषां पितृपैतामहिकं एतत्सरः त्यक्तुं युज्यते ?।
यदि आयुःक्षयोऽस्ति तदन्यत्र गतानामपि मृत्युर्भविष्यति
एव । उक्तञ्च-
यह वचन सुन ऊंचे स्वरसे हँसकर यद्भविष्य बोला,-“अहो ! आपने
अच्छा मंत्र नहीं किया सो क्या वाणीमात्रसेही उन पिता पितामहादिका यह
सरोवर त्यागन करदें ? यदि आयुका क्षयहै तो अन्य स्थानमें जाकर भी मृत्यु
होगी । कहाहै-