पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १४५ )
वर्त्तते''। तच्छ्रुत्वा कम्बुग्रीव आह--"भोः! साम्प्रतं न अस्ति
अस्माकं जीवितव्यं जलाभावात्। तथापि उपायश्चिन्त्यता-
मिति। उक्तञ्च-
किसी सरोवरमे कम्बुग्रीव नाम कच्छप रहता था उसके संकट विकटनाम-
वाले हंसजातिके दो मित्रपरम स्नेहकी कोटिको प्राप्तहुए नित्यही सरोवरके समीप
रहतेथे । उसके साथ अनेक देवर्षि महर्षियोंकी कथाकर सूर्यास्तके समय अपने
घोंसलेका आश्रय करते । फिर कुछ दिनोंके उपरान्त अवर्षणसे सरोवर शनैः २
सूखने लगा, तब उसके दुःखसे दुखी हुए वोह बोले,-"हे मित्र ! यह सरोवर
तो कर्दम ( कीच ) मात्र अवशेष है सो आप कैसे रहेंगे यह व्याकुलता हमारे
हृदयमें है" सो सुनकर कम्बुग्रीव बोला,-"भो ! इस समय जलके अभावसे
हमारा जीवन नहीं होगा तो भी उपाय विचारो । कहाहै-
त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि काले
धैर्यात्कदाचिद्गतिमाप्नुयात्सः।
यथा समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे
सांयात्रिको वाञ्छति तर्तुमेव ॥ ३४५ ॥
प्रारब्धके विगड जानेमेंभी धैर्य त्यागन करना न चाहिये कदाचित् धैर्यसे
उसकी गति प्राप्त होजाय अर्थात् उपाय प्राप्त होजाय, जैसे सागरमें पोत
( जहाज ) भंग होनेपर पोतवणिक् धैर्यसे तरनेहीकी इच्छा करताहै ॥ ३४५ ॥
अपरञ्च-
औरभी-
मित्रार्थे बान्धवार्थे च बुद्धिमान्यतते सदा ।
जातास्वापत्सु यत्नेन जगादेदं वचो मनुः ॥ ३४६ ॥
बुद्धिमान् सदा मित्र और बाधवोंके निमित्त यत्न करे चाहे कैसीभी
विपत्तिहो मनुने यह वचन कहाहै ॥ ३४६ ॥
तद् आनीयतां काचित् दृढरज्जुर्लघु काष्ठं वा, अन्विष्यतां
च प्रभूतजलसनाथं सरो येन मया मध्यप्रदेशे दन्तैर्गृहीते
सति युवां कोटिभागयोः तत्काष्ठं मया सहितं संगृह्य
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