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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( १३५ )
तच्छ्रुत्वा शृगाल आह-"भोः ! स्वल्पकायो भवान् तव
भक्षणात् स्वामिनस्तावत् प्राणयात्रा न भवति अपरो दोषश्च
तावत् समुत्पद्यते । उक्तञ्च-
यह सुनकर शृगाल बोला,-"आप स्वल्प शरीर हो तुम्हारे भक्षणसे स्वामी-
को प्राणयात्रा न होगी और दोषभी प्राप्त होगा । कहा है-
काकमांसं शुनोच्छिष्टं स्वल्पं तदपि दुर्लभम् ।
भक्षितेनापि किं तेन तृप्तिर्येन न जायते ॥ ३१७ ॥
एक तो काकका मांस दूसरे कुत्तेकी उच्छिष्टतासे बचा हुआ और फिर
थोडा तथा दुष्प्राप्य उसके खानेसे क्या है जिससे कि, तृप्ति नहो ॥ ३१७ ॥
तद्दर्शिता स्वामिभक्तिर्भवता, गतं च आनृण्यं भर्तृपि-
ण्डस्य, प्राप्तश्च उभयलोके साधुवादः तदपसर अग्रतः अहं
स्वामिनं विज्ञापयामि"। तथानुष्ठिते शृगालः सादरं प्रणम्य
उपविष्टः प्राह-"स्वामिन् ! मां भक्षयित्वा अद्य प्राणयात्रां
विधाय मम उभयलोकप्राप्तिं कुरु । उक्तञ्च-
सो आपने स्वामीभक्ति दिखादी स्वामीकी अनृणताकी प्राप्ति की, दोनों
लोकोंमें साधुवाद प्राप्तकिया, सो आगेसे हटो मै स्व.मीको कहू,” यह होनेपर
शृगाल आदरसे प्रणाम कर बैठा और बोला-"स्वामिन् ! मुझ भक्षणकर, आज
ग्राणयात्रा कर मेरी उभयलोकप्राप्ति करो । कहाहै-
स्वाम्यायत्ताः सदा प्राणा भृत्पानामर्जिता धनैः ।
यतस्ततो न दोषोऽस्ति तेषां ग्रहणसम्भवः ॥ ३१८ ॥”
प्राण सदा स्वामीके आधीनहैं कारण कि, स्वामीने वह धनसे खरीद लियेहैं
सो उनके ग्रहण करनेमे कुछ दोष नहीं होताहै ॥ ३१८ ॥”
अथ तच्छ्रुत्वा द्वीपी आह-“भोः ! साधु उक्तं भवता, पुनः
भवानपि स्वल्पकायः स्वजातिश्च, नखायुधत्वात् अभक्ष्य
एव। उक्तञ्च-
यह सुनकर गैंडा बोला,-"भो ! तुमने ठीक कहा आपभी स्वल्पकाय और
सजातीयहो नखायुध होनेसे अभक्ष्यहो । कहाहै-