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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( १३३ )
तो उसीक्षण तुझको मारडालूंगा कारण कि, मैंने इसको अभयदान दियाहै सो
किस प्रकार मारू, कहा है-
न गोप्रदानं न महीप्रदानं न चान्नदानं हि तथा प्रधानम् ।
यथा वदन्तीह बुधाः प्रधानं सर्वप्रदानेष्वभयप्रदानम् ३१३"
न गोदान, न भूमिदान, न अन्नदान ऐसा प्रधान है जैसे पंडितलोग सब
दानोंमें अभयप्रदानको श्रेष्ठ कहते हैं ॥ ३१३ ॥”
तच्छ्रुत्वा शृगाल आह-“स्वामिन् ! यदि अभयप्रदानं
दत्त्वा वधः क्रियते तदा एष दोषो भवति। पुनर्यदि देवपादानां
भक्त्या स आत्मनो जीवितव्यं प्रयच्छति तन्न दोषः,
ततो यदि स स्वयमेव आत्मानं वधाय नियोजयति,
तद्वध्योऽन्यथा अस्माकं मध्यादेकतमो वध्य इति, यतो
देवपादाः पथ्याशिनः क्षुन्निरोधादन्त्यां दशां यास्यन्ति ।
तत् किमेतैः प्राणैरस्माकं ये स्वाम्यर्थे न यास्यन्ति ।
अपरं पश्चादपि अस्माभिर्वह्निप्रवेशः कार्यः । यदि स्वा-
मिपादानां किंचिदनिष्टं भविष्यति । उक्तञ्च-
यह सुनकर शृगाळ बोला-“स्वामिन् ! यदि अभय दान देकर वध किया
जाय तो यह दोष लगे और जो स्वामीके चरणोंमें भक्तिसे अपना जीवदे तो
दोष नहीं है सो यदि वह स्वयंही अपनेको वधके निमित्त प्रदान करे तो वध्य
है नहीं तो हममेसे किसी एकको वधकरना । कारण कि, स्वामीके चरण पथ्य-
व्यापारसे युक्त भूखके कारण मरणावस्थाको प्राप्त हैं । और पीछे भी हमको
अग्निमे प्रवेश करना पडेगा जो स्वामीके चरणोंका कुछभी अनिष्ट होगा ।
कहा है कि-
यस्मिन्कुले यः पुरुषः प्रधानः स सर्वयत्नैः परिरक्षणीयः ।
तस्मिन्विनष्टे कुलसारभूते न नाभिषंगे ह्यरयो वहन्ति ३१४"
जिस कुलमें जो पुरुष प्रधान है उसकी सब यत्नोंसे रक्षा करना चाहिये
उस कुलके सारभूतके नष्ट होनेमें सब ओरसे शत्रु उसको पराभूत करते हैं”
तदाकर्ण्य मदोत्कट आह-“यद्येवं तत् कुरुष्व यद्रोचते”
तच्छ्रुत्वा स सत्वरं गत्वा तान् आह-“भोः स्वामिनो महती