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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( १२१ )
दत्त्वा निःसारिताः । एवं तस्य राज्यक्रियायां वर्त्तमानस्य
ते सिंहादयो मृगान् व्यापाद्य तत्पुरतः प्रक्षिपन्ति । सोऽपि
प्रभुधर्मेण सर्वेषां तान् प्रविभज्य प्रयच्छति । एवं गच्छति
काले कदाचित् तेन सभागतेन दूरदेशे शब्दायमानस्य शृ-
गालवृन्दस्य कोलाहलोऽश्रावि । तं शब्दं श्रुत्वा पुलकिततनु-
र्आनन्दाश्रुपरिपूर्णनयनः उत्थाय तारस्वरेण विरोतुमारब्ध-
वान् । अथ ते सिंहादयस्तं तारस्वरमाकर्ण्य शृगालोऽयमिति
मत्वा सलज्जमधोमुखाः क्षणमेकं स्थित्वा मिथः प्रोचुः–‘‘भो
वाहिता वयमनेन क्षुद्रशृगालेन तद्वध्यताम्’’ इति । सोऽपि
तदाकर्ण्य पलायितुमिच्छन् तत्र स्थाने एव सिंहादिभिः
खण्डशः कृतो मृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि “त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा
येन” इति ।
चण्डरखभी उनको भयसे व्याकुल जानकर यह बोला–‘‘भो भो जीवो !
क्यों तुम मुझे देखकर सब ओरको भागे जाते हो ? सो मतडरो, ब्रह्माने आज
स्वयंही मुझको निर्माणकर कहा है कि,–‘‘श्वापदोंके मध्यमें कोई राजा नहीं है,
सो तुझे मैने आज सब जीवोंके आधिपत्यमें अभिषिक्त किया है, ककुद्द्रुम तेरा
नाम है, सो जाकर पृथ्वीपर सब की पालना करना,” इस कारण मैं आया हूं,
सो मेरी छत्र छायामें सम्पूर्ण वनके जीवोंको वर्तना चाहिये । मैं ककुद्द्रुम राजा
त्रिलोकीका अधिपतिहूं”। यह सुन सिंह व्याघ्रादिजीव स्वामिन् ! प्रभो ! आज्ञादो
ऐसा सब ओरसे कहने लगे । तब उसने सिंहको अमात्य पदवी दी, व्याघ्रको
शय्यापालक, गेंडेको ताम्बूलाधिकारी, भेडियेको द्वारपालकत्व दिया और जो
अपनी जातिके शृगाल थे उनसे वार्ताभी नहीं करता, सब शृगाल गलवाही
देकर निकाले गये, इस प्रकार उसके राजक्रियामें वर्तमान होनेसे वे सिंहादिक
मृगोंको मारकर उसके आगे फेंकतेथे और वहभी प्रभुधर्मसे उन सबको विभाग
कर उनके आगे डालता । इस प्रकार समय बीतनेपर कभी उसने आये हुए
दूर देशमे शब्द करनेवाले शृगालसमूहका शब्द सुना । उस शब्दको सुन
पुलकित शरीर अश्रुपूर्णनेत्र होकर उठ ऊचे स्वरसे शब्द करना आरम्भकिया ।
तब वे सिंहादिक उसके उच्च स्वरको जानकर “अरे ! यह शृगाल है” ऐसा