पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ११९ )
जिसने आभ्यन्तर जनोंको त्याग दियाहै और बाहरी जनोंको अन्तरंगमे
लिया है वह ककुद्द्रुम राजाकी तरह नाश होजाता है ॥ २८२ ॥”
पिङ्गलक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्-
पिंगलक बोला,-“यह कैसी कथा ?” वह बोला-
कथा १०.
कस्मिंश्चित वनप्रदेशे चण्डरवो नाम शृगालः प्रतिवसति-
स्म । स कदाचित् क्षुधाविष्टो जिह्वालौल्यात नगरान्तरे
प्रविष्टः । अथ तं नगरवासिनः सारमेया अवलोक्य सर्वतः
शब्दायमानाः परिधाव्य तीक्ष्णदंष्ट्राग्रैर्भक्षयितुमारब्धाः ।
सोऽपि तैर्भक्ष्यमाणः प्राणभयात् प्रत्यासन्नरजकगृहं प्रविष्टः ।
तत्र च नीलीरसपरिपूर्णमहाभाण्डं सज्जीकृतमासीत् । तत्र
सारमेयैराक्रान्तो भाण्डमध्ये पतितः । अथ यावत् निष्क्रान्त-
स्तावन्नीलीवर्णः सञ्जातः । तत्र अपरे सारमेयास्तं शृगाल-
मजानन्तो यथाभीष्टदिशं जग्मुः चण्डरवोऽपि दूरतरं प्रदेश-
मासाद्य काननाभिमुखं प्रतस्थे न च नीलवर्णेन कदाचित
निजरङ्गस्त्यज्यते । उक्तञ्च-
किसी वनके निकट चण्डरव नामवाला शृगाल रहताथा वह कभी भूखसे
व्याकुल हुआ जिह्वाके लालचसे नगरान्तरमें प्रविष्ट भया । तब उसे नगरके रहने-
वाले कुत्ते देख सब ओरसे भोंकते हुए दौडे और तीक्ष्ण दाढोंसे खाने लगे ।
वहभी उनसे काटा हुआ प्राणभयसे निकटके धोबीके घरमें घुसगया वहां नीलके
रससे पूर्ण महापात्र (नाद) तयार रक्खीथी । सो कुत्तोंसे आक्रात हुआ उस भाण्डमें
गिरपडा । जब उसमेंसे निकला तो नीला होगया तब कुत्ते उसको गीदड न
जानकर यथेष्ट चले गये । चण्डरवभी दूरदेशको प्राप्तहो वनके सन्मुख चला,
नीलवर्ण कभी त्यागा नहीं जाता है। कहाहै-
वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च ।
एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोर्यथा ॥ २८३ ॥
वज्रलेप मूर्ख, नारी और कर्कट (कुकीरक) और मछली इनका नील और
मद्यपान करनेवालेकी समान एकही आग्रह है (वज्र लेपकी कदाचित् मुक्ति