पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ११६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
शीघ्र जाबो”। वह बोला,-“भगवति ! घरमें आये असाधुसेभी कोई ऐसा
नहीं कहताहै। कहाहै-
एह्यागच्छ समाश्वसासनमिदं कस्माच्चिराद्दृश्यसे
का वार्त्तान्वतिदुर्बलोऽसि कुशलं प्रीतोऽस्मि ते दर्शनात् ।
एवं नीचजनेऽपि युज्यति गृहं प्राप्ते सतां सर्वदा
धर्मोऽयं गृहमेधिनां निगदितः स्मार्त्तैर्लघुः स्वर्गदः ॥२७६॥
यहां आओ, यह सुन्दर आसनहै, बहुत दिनोंमें देखा, कहां थे, क्या बात
है, बहुत कमजोर होगये, कुशल है ? हम आपके दर्शनसे प्रसन्नहुए, इस प्रकार
सत्पुरुष नीचके प्राप्त होनेमें भी कहा करते हैं यह गृहस्थी स्मृतिकारोंका स्वर्ग
देनेवाला सामान्य धर्म है ॥ २७६ ॥
अपरं मया अनेकमानुषाणामनेकविधानि रुधिराणि
आस्वादितानि आहारदोषात् कटुतिक्तकषायाम्लरसास्वा-
दानि न च मया कदाचिन्मधुररक्तं समास्वादितम् । तद्यदि
त्वं प्रसादं करोषि तदस्य नृपतेर्विविधव्यञ्जनान्नपानचोष्य-
लेह्यस्वादाहारवशादस्य शरीरे यत् मिष्टं रक्तं सञ्जातं तदा-
स्वादनेन सौख्यं सम्पादयामि जिह्वया इति । उक्तञ्च-
मैने अनेक मनुष्योंके अनेक विधि रुधिर आस्वादन किये हैं । आहार
दोषसे कटु, तिक्त, कषैले अम्ल रसका आस्वाद देखा, परन्तु मैने कभी
मधुर रसका आस्वादन नहीं किया । सो यदि तू प्रसन्नता करे तो इस राजाके
विविध अन्नपान चोष्य लेह्य स्वादु आहारके वशसे इसके शरीरमें जो मीठा
रस है उसके आस्वादनसे जिह्वाका सौख्य सम्पादन करूंगा । कहाहै-
रङ्कस्य नृपतेर्वापि जिह्वासौख्यं समं स्मृतम् ।
तन्मात्रञ्च स्मृतं सारं यदर्थं यतते जनः ॥ २७७ ॥
रंक (कंगाल) और राजाको जिह्वाका सौख्य समान कहा है, जिसके
निमित्त मनुष्य यत्न करता है वही इसमे सार है ॥ २७७ ॥
यद्येवं न भवेल्लोके कर्म जिह्वाप्रतुष्टिदम् ।
तन्न भृत्यो भवेत्कश्चित्कस्यचिद्वशगोऽथवा ॥ २७८ ॥