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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 536 में से

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ध्यगतं दृष्ट्वा सिंहनादं मुमोच । ततः प्रतिशब्देन कूपमध्या-
द्विगुणतरो नादः समुत्थितः। अथ तेन तं शत्रुं मत्वा आत्मानं
तस्य उपरि प्रक्षिप्य प्राणाः परित्यक्ताः । शशकोऽपि हृष्ट-
मनाः सर्वमृगान् आनन्द्य तैः सह प्रशस्यमानो यथासुखं
तत्र वने निवसति स्म । अतोऽहं ब्रवीमि--"यस्य बुद्धिर्बलं
तस्य" इति ।
भासुरक बोला,-"भो ! तुझे इस बातसे क्या उस किलेमे स्थितभी उसे मुझे
दिखा" । तब शशक बोला,-"जो ऐसा है तो आओ स्वामी " यह कहकर
आगे चला । तब उसने आतेमें जो कूप देखा था उसी कूपको प्राप्त होकर
वह भासुरकसे बोला,-"स्वामिन् ! आपका प्रताप कौन सह सक्ताहै । तुमको
देखकर दूरसेही वह चोर सिंह अपने दुर्गमें प्रविष्ट हुआ है सो आओ मैं
दिखाऊ" भासुरक बोला,-"मुझे वह दुर्ग दिखाओ" तब इसने वह कूप दिख-
लाया। तब वहभी मूर्ख सिंह अपने प्रतिबिम्बको कूपमें स्थित देख सिंहनाद करता
भया उसकी प्रतिध्वनिसे कूपसे दूना नाद उठा । उससे वह उसको शत्रु मानकर
अपनेको उसके ऊपर डालकर प्राण छोडता भया । खरगोशभी प्रसन्न मनहो सब
मृगोको आनंदित कर उनके साथ प्रशंसितहो यथासुखसे उस वनमे रहने लगा।
इससे मैं कहताहू "जिसको बुद्धि है उसको बल है, "
तद्यदि भवान् कथयति, तत्तत्रैव गत्वा तयोः स्वबुद्धि-
प्रभावेण मैत्रीभेदं करोमि"। करटक आह--"भद्र ! यदि
एवं तर्हि गच्छ, शिवास्ते पन्थानः सन्तु, यथाभिप्रेतमनु-
ष्ठीयताम्" । अथ दमनकः सञ्जीवकवियुक्तं पिंगलकमव-
लोक्य तत्रान्तरे प्रणम्याग्रे समुपविष्टः । पिंगलकोऽपि
तमाह--"भद्र ! किं चिरात् दृष्टः?" दमनक आह--" न
किञ्चिद्देवपादानाम्स्माभिः प्रयोजनम्, तेन अहं नाग-
च्छामि । तथापि राजप्रयोजनविनाशमवलोक्य सन्दह्यमान-
हृद्यो व्याकुलतया स्वयमेव अभ्यागतो वक्तुम् । उक्तञ्च-
सो यदि आप कहें तो वहा जाकर उनका अपनी बुद्धिके प्रभावसे मैत्री-
भेद करू" । करटक बोला,-"भद्र ! जो ऐसा है तो जाओ, तुम्हारे मार्ग