पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२ ) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-
कितनेही ग्रंथोंका अनुवाद कियाजाताहै कि, जिससे विज्ञ महाशय अपने धर्म
कर्मको यथार्थ जान उसमें प्रवृत्त होकर उभय लोकमें सुख प्राप्तकरें, जिस-
प्रकार धर्मादि करना मनुष्य मात्रका कार्य है, इसीप्रकार लोकनिर्वाह और
बुद्धिकी अधिकाईके निमित्त नीतिका जाननाभी मनुष्य मात्रको उचित है,
इसीकारण सब प्रकारके गुणोंसे युक्त विद्यार्थियोंको परम उपकारक इस
“पंचतंत्र” ग्रंथका भाषामें अनुवाद कियाहै, ऐसा कौन है कि इसकी कथामें
जिसे रुचि न हो, यह ग्रंथ सरकारी परीक्षाओंमें भी नियुक्त है और अंग्रेजीके
साथ जो संस्कृत पढाई जाती है उसके साथभी इसका कोई न कोई अंश
अवश्य रहता है, इसकारण संस्कृतके विद्यार्थियोंकोभी उपयोगी हो, इस
निमित्त संस्कृतके शब्दोंके अनुसारही इसका भावार्थ किया है, कहीं कुछ
न्यूनाधिक नहीं कियाहै और जहाँ कहीं अर्थ खोलनेके लिये कुछ विशेष
लिखा है वहां कोष्ठ करादिया है और संस्कृतमें जहां वाक्य समाप्त होकर
ऐसी। रेखा कर वहां भाषामें भी ऐसीही रेखा कर दीहै, जिससे विद्यार्थियोंको
शब्दार्थ जाननेमें कठिनता न पडे, हाँ अन्वयानुसार अर्थ करनेके कारण श्लोक-
में अधिकतर कर्तासे अर्थका करना प्रारम्भ किया है यदि ऐसा न करते तो
श्लोकार्थ रुचिकर सरस न होता श्लोकका अन्वय कर पाठक उसीके अनुसार
अर्थ पासकेंगे ।
इस ग्रन्थमें नीतिकी उत्कृष्टता सबका सार लेकर वर्णन की है इसकारण
इस टीकेका नामभी "नीतिसर्वस्व” रक्खा है।
इसप्रकार यह ग्रन्थ पूर्णकर जगद्विख्यात परमप्रवीण सनातनधर्म निरत
सद्ग्रन्थप्रचारक परमउपकारक गुणिजनरंजक परमोदार “श्रीवेंकटेश्वर” यंत्रा-
लयाध्यक्ष सेठजी श्रीयुत क्षेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयको सम्पूर्ण स्वत्वके
सहित समर्पण करदियाहै जो कि, अपनी परम उदारतासे हमको सब प्रकार
सन्तुष्ट कररहेहैं ।
हिन्दी भाषाके परम रसिक हमारे परम अनुग्राहक द्विजवंशादिवाकर दान-
शील पंडित हरसहाय पाठक तथा कुमार बनारसी दासजी एम. ए. बाबू उदित
नारायण लाल वर्मा प्लीडर गाजीपुर तथा पंडित हरिहर प्रसाद पाठक मेनेजर
“सत्यसिंधु”, लाला शालिग्रामजी वैश्य, सेठ कुन्दन लाल आदि विज्ञ जनभी
धन्य वादके योग्य हैं जो हिन्दी भाषाके प्रचारमें सदा रत रहते हैं ।
पाठक महाशयोंसे प्रार्थना है कि, यथाशक्ति टीका करनेमें कोई त्रुटि नहीं
की है तथापि यदि कहीं भूल चूक पावै तो उसे क्षमा करें कारण कि, सर्वज्ञ
परमेश्वरहीहैं ।