पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ९३ )
उपायेन हि यत्कुर्यात्तन्न शक्यं पराक्रमैः ।
काक्या कनकसूत्रेण कृष्णसर्पो निपातितः ॥ २२८ ॥”
उपायसे जो होसकता है वह पराक्रमसे नहीं । काकीने सुवर्णसूत्रसे कृष्णस-
र्पको मारा ॥ २२८ ॥” ॥
करटक आह—“कथमेतत् ?” । सोऽब्रवीत्-
करटक बोला--“यह कैसा ?” वह बोला-
कथा ६.
अस्ति कस्मिंश्चित्प्रदेशे महान् न्यग्रोधपादपः । तत्र वाय-
सदम्पती प्रतिवसतः स्म । अथ तयोः प्रसवकाले वृक्षविव-
रात् निष्क्रम्य कृष्णसर्पः सदैव तदपत्यानि भक्षयति ।
ततस्तौ निर्वेदात् अन्यवृक्षमूलनिवासिनं प्रियसृहदं शृगालं
गत्वा ऊचतुः-“भद्र ! किमेवंविधे सञ्जाते आवयोः
कर्त्तव्यं भवति । एवं तावत् दुष्टात्मा कृष्णसर्पो वृक्षविवरात्
निर्गत्य आवयोर्बालकान् भक्षयति । तत् कथ्यतां तद्रक्षार्थं
कश्चिदुपायः।
किसी स्थानमें एक वडा वटका वृक्ष है वहां एक कौआ और काकी रहते
थे । उसके प्रसव समयमें वृक्षकी खखोडलसे निकलकर काला सर्प सदा उनके
सतानको खाजाता । तब वे परम दुःखसे दूसरे वृक्षकी मूलमे रहनेवाले प्रिय सुहृद
शृगालके निकट जाकर बोले--“इसप्रकारके कृत्यमें हमको क्या करना चाहिये,
इसप्रकारसे वह दुष्टात्मा कृष्णसर्प वृक्षकी खखोडलसे निकल कर हमारे बालक
खाजाता है, सो इसकी रक्षाका कोई उपाय कहो ।
यस्य क्षेत्रं नदीतीरे भार्या च परसंगता ।
ससर्पे च गृहे वासः कथं स्यात्तस्य निर्वृतिः ॥ २२९ ॥
जिसका खेत नदीके किनारे है, भार्या परपुरुषगामिनी है, और सर्पयुक्त
जिसका निवास है, तिसको सुख कैसा अर्थात् सुख नहीं है ॥ २२९ ॥
अन्यच्च-
औरभी-