पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 667, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीप का संक्षेप ७९
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से आगामी जन्म की सूचना जैसे साधारण प्राणी को भी मिल
जाती है या जैसे मरण के समय सगुणोपासकों को उनके
सगुण ब्रह्म दर्शन दे देते हैं, इसी तरह पूर्वाभ्यास के प्रताप से मरते
समय निर्गुणोपासकों को भी निर्गुणब्रह्म का ज्ञान हो ही जायगा,
इसमें वृथा सन्देह क्यों किये जा रहे हो । यदि कहो कि निर्गुणो-
पासक को मरण काल में निर्गुणब्रह्म की ही प्राप्ति हो सकती है,
उसे मुक्ति भी मिल जायगी यह हम क्यों कर मान लें ? उसका उत्तर
यह है कि तुम उस दर्शन का नित्य निर्गुण नाम भले ही गाते
रहो असल में तो वह मोक्ष ही है । जैसे संवादिभ्रम कहने को तो भ्रम
है, असल में तो उसे तत्वज्ञान ही कह देना चाहिए। ऐसे ही
निर्गुणब्रह्म की 'प्राप्ति'और 'मुक्ति' ये दो नाम एक ही वस्तु के हैं।
निर्गुणोपासना का सामर्थ्य ही कुछ ऐसा है कि—उससे मूलाज्ञान
को मार भगाने वाली बुद्धि का जन्म हो ही जाता है । तापनीय-
उपनिषत् में भी मोक्ष को इसी निर्गुणोपासना का फल बताया
है । उपासना करते करते अन्त में तो ज्ञान की उत्पत्ति हो ही
जाती है और यों 'नान्यः पन्था विद्यते' ज्ञान के सिवाय दूसरा रास्ता
ही नहीं है इससे भी विरोध नहीं रह जाता । निष्काम उपासना
करने से मुक्ति मिलती है, तथा सकाम उपासना करने से ब्रह्मलोक
मिलता है । उस ब्रह्मलोक में जाकर भी इस उपासना के सामर्थ्य
से तत्व का दर्शन हो जाता है । फिर वह उपासक इस कल्प में
लौट कर नहीं आता और कल्प का अन्त होते समय कल्पेश्वर
के साथ मुक्त हो जाता है। श्रुतियों में अधिकता से प्रणव की
निर्गुणोपासनायें ही आयी हैं। सगुणोपासना तो कहीं कहीं
दी है। पिप्पलादमुनि ने ओंकार को 'पर' और 'अपर'
ब्रह्मरूप कहा है। यम ने भी नचिकेता से कहा है कि जो