पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 663, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीप का संक्षेप ७५
है । तत्त्वज्ञानी की बाह्य प्रवृत्ति मान कर अतिप्रसक्ति से डरना
ठीक नहीं है। क्योंकि तत्त्वज्ञानी के प्रति तो 'प्रसंग' किंवा 'विधि
शास्त्र' ही नहीं होता । जिस अविचारी को देह के वर्ण, आश्रम,
आयु और अवस्थाओं में अभिमान बना हुआ है, ये सब विधि
और निषेध शास्त्र केवल उसी के लिये बने हैं । ज्ञानी का निश्चय
तो इसके विपरीत होता है । उसे तो यह मालूम हो जाता है कि—
जैसे माया ने देह बनाया है, इसी तरह वर्णाश्रमादि भी उसी ने
घड़ दिये हैं । बोधरूप आत्मा के तो कोई वर्ण या आश्रम आदि
नहीं होते । जिसने अपने जी में से सम्पूर्ण आसक्तियों को निकाल
कर फेंक दिया हो, जिसका आशय निर्मल हो चुका हो, वह तो
मुक्त ही है । ऐसा महापुरुष समाधि करे या न करे, काम करे
या बैठा रहे, यह सब उसकी ( प्रारब्धानुकूल ) इच्छा पर ही
निर्भर होता है । इस बारे में शास्त्र की यह हिम्मत नहीं है कि
उससे कुछ करने को कह सके । जो पुरुष कामवासनाओं के
बन्धन से छूट चुका हो, कर्म को छोड़ बैठने या करते जाने से,
फिर उसे कुछ भी प्रयोजन नहीं रह जाता । समाधि और जप से
भी उसका कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । "आत्मा असंग है
उससे भिन्न सभी कुछ इन्द्रजाल के समान मायिक है" ऐसा
स्थिरनिर्णय जिन्होंने कर लिया हो, उनके मन में वासना कैसे
ठहरेगी ? जब कि तत्वज्ञानी में वासना ही नहीं रहती तब वह
उसे हटाने के लिए ध्यान भी क्यों करेगा ? या जब ज्ञानी को
प्रसंग ही नहीं रह गया है तो अतिप्रसंग कहां से आयेगा ? जिस
बालक के लिये विधि नहीं होती, उसको अति प्रसंग भी नहीं
देखते हैं । जैसा विधि का अभाव बालक को है वैसा ही तत्वज्ञानी
को भी है । कुछ न जानने के कारण बालक के लिये विधि नहीं