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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 647, कुल 726 में से

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पृष्ठ 647

कूटस्थदीप का संक्षेप ५९

जो बुद्धि घटाकार हो गई है, उसमें जो चिति है, वह तो
केवल घट को ही प्रकाशित कर सकती है। परन्तु घट में जो
ज्ञातता नाम का धर्म आ जाता है ( जिसके आने पर हम कहने
लगते हैं कि हमने घट को जान लिया) वह तो ब्रह्म चैतन्य से
ही प्रकाशित हुआ करता है। भेद केवल इतना ही होता है
कि—बुद्धि के उत्पन्न होने से पहले पहले वह ब्रह्म इस घट को
अज्ञात रूप से प्रकाशित कर रहा था। अब बुद्धि के उत्पन्न हो
जाने के बाद तो वही ब्रह्म इसको ज्ञात रूप से प्रकाशित करने
लगता है। समझते हो ज्ञान क्या है ? भाले की नोक पर जैसे
लोहा लगा रहता है इसी प्रकार बुद्धिवृत्ति के अग्र भाग में जब
चिदाभास लग जाता है तब उसे ही 'ज्ञान' कहते हैं। अज्ञान
का विवरण हम क्या करें। वह तो जाड्य ही है। अर्थात् स्वयं
स्फूर्ति का न होना ही 'अज्ञान' कहाता है। अब जो कोई घड़ा
ज्ञान से व्याप्त हो जाता है तो उसे 'ज्ञात घट' कहते हैं, तथा
जो घड़ा अज्ञान से व्याप्त रह जाता है उसे 'अज्ञात घट' कहा
जाता है। जैसे 'अज्ञात घट' ब्रह्म से भास्य रहता है ठीक इसी
तरह 'ज्ञात घट' भी ब्रह्म से ही भास्य होता है। चिदाभास का
उपयोग तो केवल इतना ही है कि—वह ज्ञातता नाम के धर्म को
उसमें उत्पन्न कर दिया करे। इस धर्म को उत्पन्न करने के पश्चात्
वह चिदाभास क्षीण हो जाता है। जिस बुद्धि में चैतन्य का
आभास न पड़ा.हो, उस बुद्धि में तो ज्ञातता को उत्पन्न करने
का सामर्थ्य ही नहीं होता। घट में जब चिदाभास नाम के फल
का उदय हो जाता है तब बस यही 'ज्ञातता' कहाती है। वह
ब्रह्म चैतन्य तो (१) बुद्धिवृत्ति (२) चिदाभास तथा (३) घटादि
विषय इन तीनों को ही प्रकाशित किया करता है। परन्तु अकेले