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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 726 में से

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पृष्ठ 566

५४४ पञ्चदशी
तैत्तिरीय श्रुति में कहा है कि—ज्ञानी लोग संसार की सम्पूर्ण
कामनाओं को एक ही साथ पा लेते हैं। दूसरे अज्ञानी लोग
जैसे कर्मों को कर करके जन्मपरम्परा में फंसे रहते हैं,
वैसे इन [दिखावटी] कर्मों से ज्ञानी को जन्म लेना नहीं पड़ता ।
अज्ञानी लोग जैसे क्रमानुसार भोगों को भोगा करते हैं श्रोत्रिय
को वैसे भोग नहीं होता । उसको तो सब भोग एक ही साथ
बिना क्रम के होते हैं । [ इसी प्रकरण के ३४ श्लोक में जाकर
यह विषय स्पष्ट हो गया है । ]
युवा रूपी च विद्यावान् नीरोगो दृढचित्तवान् ।
सैन्योपेतः सर्वपृथ्वीं वित्तपूर्णां प्रपालयन् ॥२१॥
सर्वै र्मानुष्यकै र्भोगैः संपन्नस्तृप्तभूमिपः ।
यमानन्दमवाप्नोति ब्रह्मविच्च तमश्नुते ॥२२॥
जवान हो, रूपवान् हो, विद्यावान् हो, नीरोग हो, स्थिर
चित्त हो, भारी सेना हो, धन धान्य से पूर्ण पृथिवी का शासन
कर रहा हो, अथवा संक्षेप में यों कहना चाहिए कि मनुष्यों को
जितने भी भोग प्राप्त हो सकते हैं वे सभी उसे प्राप्त हों, ऐसे
तृप्त भूपति को जो आनन्द मिल सकता है, ब्रह्मज्ञानी पुरुष भी
उसी आनन्द को लूटा करता है [ तैत्तिरीय और बृहदारण्यक
उपनिषदों में यह बात कही गई है । ]
मर्त्यभोगे द्वयोर्नास्ति काम स्तृप्तिस्ततः समा ।
भोगानिष्कामतैकस्य परस्यापि विवेकतः ॥२३॥
[प्रश्न यह है कि सार्वभौम राजा को विषयों की प्राप्ति होती
है, श्रोत्रिय को कोई विषय प्राप्त नहीं होता । फिर भी इन
दोनों का आनन्द, एक सा कैसे होता है ? इसी का उत्तर इस