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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 726 में से

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पृष्ठ 523

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम्
योगानन्दः पुरोक्तो यः स आत्मानन्द इष्यताम् ।
कथं ब्रह्मत्वमेतस्य सद्धयस्येति चेच्छृणु ॥१॥
जिसको पहले 'योगानन्द' कहा है उसी को 'आत्मानन्द'
समझलो—[उसमें और उसमें कोई भेद नहीं है] यह सद्वितीय
आत्मानन्द ब्रह्मानन्द कैसे हो सकता है सो भी सुन लो ।
प्रथमाध्याय में 'ब्रह्मानन्द' 'विद्यानन्द' तथा 'विषयानन्द'
इन तीन तरह का आनन्द बताया था । द्वितीयाध्याय में उन
तीनों आनन्दों से अधिक एक और आत्मानन्द का वर्णन कर
चुके हैं । उसका अभिप्राय यह है कि—जिसको प्रथमाध्याय
में योगानन्द कहा था उसी को आत्मानन्द समझो । उसमें और
उसमें कोई भी भेद नहीं है । भाव यह है कि—योग के द्वारा
साक्षात्कार होने के कारण उसी ब्रह्मानन्द को योगानन्द कह
देते हैं । जब तो इस योगरूपी उपाधि की विवक्षा नहीं रहती
तब उसे सीधे शब्दों में ब्रह्मानन्द या निजानन्द ही कहने लगते
हैं । इसी प्रकार गौण आत्मा कौन है ? मिथ्या आत्मा कौन
से हैं ? मुख्य आत्मा किसे कहते हैं ? इस आत्मविवेचन के
बाद जिस आनन्द की प्राप्ति होती है उसे 'आत्मानन्द' कह
दिया है । असल में योगानन्द और आत्मानन्द एक ही बात
है । जिस द्वारा वह आनन्द प्रकट होता है, उसी के नाम से