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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तत्त्वविवेकप्रकरणम् ३१
की हज़ारों धारा बरसाने लग पड़ती है [धर्मामृत की मूसलाधार
वृष्टि करने लगती है। साधक को अभ्यास करते करते आनन्द में
नित्य ही हज़ारों तरह से नवीनता आती जाती है ]
अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते ।
समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये ॥६१॥
वाक्यमप्रतिबद्धं सत् प्राक्परोक्षावभासिते ।
करामलकवद् बोधमपरोक्षं प्रसूयते ॥६२॥
इस समाधि के प्रताप से वासनाजालके सम्पूर्ण नष्ट हो जाने
पर,पुण्य पाप नाम के कर्म संचय के समूल उखाड़ दिये जाने
पर, ‘तत्त्वमसि’ आदि वाक्य, बे-रोकटोक होकर, जो तत्व अब तक
परोक्ष रूप से ज्ञात हो रहा था, उसी तत्व के विषय में, हाथ
पर रक्खे आमले की तरह, प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न कर देते हैं।
इस समाधि का परम प्रयोजन तो यही है कि इसके प्रताप
से अहंकार ममकार तथा कर्तृत्व आदि अभिमान का कारण जो
ज्ञान का विरोधी संस्कारसमूह है वह जब निःशेष नष्ट हो जाता
है तथा जब पुण्य पाप नाम के कर्मों का ढेर समूल उन्मीलित हो
चुकता है तब फिर ऐसा अनुकूल वातावरण उत्पन्न होता है कि
‘तत्त्वमसि’ आदि वाक्यों के अर्थ के समझने में जो सत्कर्म तथा
वासना अब तक रुकावट डाल रही थीं, [अर्थ को समझने नहीं
देती थीं] वे सब रुकावटें हट जाती हैं। जो तत्व अब तक परोक्ष
रूप से प्रकाशित हो रहा था अब उसी तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान ‘तत्त्व-
मसि’ आदि वाक्य करा देते हैं। अब ज्ञान का विज्ञान बन जाता है।
परोक्षं ब्रह्मविज्ञानं शाब्दं देशिकपूर्वकम् ।
बुद्धिपूर्वकृतं पापं कृत्स्नं दहति वह्निवत् ॥६३॥