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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 726 में से

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पृष्ठ 453

होने से यह तो दुःखी है और प्रसन्न मुख वाला होने से यह
सुखी है । प्रकृत तात्पर्य तो यही हुआ कि ] लोष्ठ आदि में
दीनता या विकास आदि लिंग नहीं पाये जाते इस कारण उनमें
दुःख सुख की कल्पना ही नहीं हो सकती [ यही कारण है कि
लोष्ठ आदि में यह भी निश्चय नहीं किया जा सकता कि उनमें
दुःखाभाव है । ]
स्वकीये सुखदुःखे तु नोहनीये ततस्तयोः ।
भावो वेद्योऽनुभूत्यैव, तदभावोऽपि नान्यतः ॥३७॥
[ अनुभवसिद्ध होने के कारण अपने सुख दुःख तो ऊहना
[ कल्पना ] के योग्य ही नहीं होते, किंवा अनुमेय नहीं होते ।
इस कारण उन सुख दुःख़ों का सद्भाव जैसे अनुभूति ( प्रत्यक्ष )
से मालूम हो जाता है, उसी तरह उन सुख दुःख का अभाव
भी अनुमान आदि से ही नहीं जाना जाता । किन्तु उन सुख
दुःख का अभाव भी प्रत्यक्ष से ही जाना जाता है [ अपने और
पराये सुख दुःख में यही बड़ी विषमता है ]
तथा सति स्वसुप्तौ च दुःखाभावोऽनुभूतिभिः ।
विरोधिदुःखराहित्यात् सुखं निर्विघ्नमिष्यताम् ॥३८॥
जब कि अपने सुखादि अनुभवगम्य सिद्ध हो चुके तब
अपनी सुषुप्ति में का दुःखाभाव भी अनुभव से ही सिद्ध हो गया ।
जागरण के समय जैसे सुख का विरोधी दुःख बना रहता है
सुख का विरोधी वैसा दुःख सुषुप्ति में नहीं रहता । इस कारण
सुषुप्ति के समय निर्विघ्न (बाध रहित) सुख मान ही लेना चाहिये ।
महत्तरप्रयासेन मृदुशय्यादिसाधनम् ।
कुतः संपाद्यते सुप्तौ सुखं चेत् तत्र नो भवेत् ॥३६॥