पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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वाला ज्ञान जब नहीं भी रहता तब भी वह नष्ट नहीं हो जाती।
[वह तो तब भी बनी ही रहती है। अथवा सच्ची ब्रह्मता उसका
ज्ञान जब नहीं भी रहता, तब भी विलीन नहीं हो जाती है।
वह तो तब भी बनी ही रहती है।]
ततोऽभिज्ञापकं ज्ञानं न नित्यं जनयत्यदः ।
ज्ञापकाभावमात्रेण न हि सत्यं विलीयते ॥११८॥
क्योंकि वह ब्रह्मभाव नित्य है इसलिए ज्ञान तो उसका
ज्ञापक [बोधक] ही हो सकता है। जनक नहीं हो सकता।
केवल ज्ञापक के न रहने से ही सत्य पदार्थ नष्ट नहीं हो जाता
[अभिप्राय यह है कि-ब्रह्मता यदि ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली
होती तो ज्ञान के नष्ट होते ही नष्ट हो जाया करती। परन्तु वह
नष्ट नहीं होती, इसी से जानते हैं कि-ब्रह्मता उत्पन्न ही नहीं
होती। वह तो नित्य है।]
अस्त्येवोपासकस्यापि वास्तवी ब्रह्मतेति चेत् ।
पामराणां तिरश्चां च वास्तवी ब्रह्मता न किम् ॥११९॥
यदि कोई कहे कि-उपासक भी वास्तव ब्रह्म ही होता
है, तो हम कहेंगे कि इतना ही क्यों कहते हो ? क्या पामर
मनुष्य और पशु पक्षी भी वास्तव ब्रह्म नहीं हैं ?
अज्ञानादपुमर्थत्व मुभयत्रापि तत् समम् ।
उपवासाद् यथा भिक्षा वरं ध्यानं तथान्यतः॥१२०॥
यदि कोई कि-पामर मनुष्यों और पशु पक्षियों को तो
अपनी ब्रह्मता का ज्ञान नहीं होता, इस कारण उनकी ब्रह्मता
उनके किसी मतलब की नहीं होती, [ऐसी अज्ञात ब्रह्मता को
कोई भी पुरुषार्थ नहीं मानता है] तो हम कहेंगे कि यह बात