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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 726 में से

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ध्यानदीपप्रकरणम् ३६९
जन्मान्तर दिलाने वाला आगामी प्रतिबन्ध [जिसे कि
प्रारब्धशेष भी कहते हैं, वह भोग के बिना निवृत्त हो ही नहीं
सकता। इस कारण उसकी निवृत्ति का काल भी नियत नहीं
किया जा सकता। वह प्रतिबन्ध] एक जन्म में तो वामदेव
का क्षीण हो पाया था। भरत का तो [नृप-मृग और जड भरत
इन] तीन जन्मों में क्षीण होसका था।
योगभ्रष्टस्य गीतायामतीते बहुजन्मनि ।
प्रतिबन्धक्षयः प्रोक्तो न विचारोऽप्यनर्थकः॥४६॥
जो योगभ्रष्ट हो जाते हैं, [जो तत्वसाक्षात्कार तक विचार
नहीं कर पाते हैं, जिन का विचार बीच में ही टूट जाता है]
उनके प्रतिबन्ध का क्षय होने में बहुत जन्म लग जाते हैं। [एक
दो या तीन जन्मों का कोई भी नियम नहीं है] परन्तु इस रुका-
वट के कारण विचार व्यर्थ नहीं हो जाता है [क्योंकि प्रतिबन्ध
के हटते ही फिर तुरन्त अपरोक्षज्ञानरूपी फल देखा जाता है।]
प्राप्य पुण्यकृतां लोकान्नात्मतत्त्वविचारतः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे साभिलाषोऽभिजायते ॥४७॥
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
निस्पृहो ब्रह्मतत्त्वस्य विचारात् तद्धि दुर्लभम् ॥४८॥
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयस्तस्मादेतद्धि दुर्लभम् ॥४९॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥५०॥
गीता में कहा है कि—योगभ्रष्ट लोग आत्मतत्त्व के विचार