सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 343

तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२३
बोध की स्थिरता हो जाती है । उसकी स्थिरता के लिये किसी
भी साधन की अपेक्षा नहीं होती । [ यों बोध की स्थिरता के
लिये भी निवृत्ति की आवश्यकता नहीं बता सकते हो ।
संसार से निवृत्ति आदि किसी भी साधन से बोध की स्थिरता
[ क़ायमी ] नहीं होती है किन्तु वह तो तब ही स्थिर रहता है
जब कि किसी प्रमाण से उसकी बाधा न हो] बोध की स्थिरता
अबाध पर निर्भर हैं । निवृत्ति पर बोध की स्थिरता निर्भर
नहीं है ।
नाविद्या नापि तत्कार्यं बोधं बाधितुमर्हति ।
पुरैव तत्त्वबोधेन बाधिते ते उभे यतः ॥२७८॥
अविद्या या अविद्या के कार्य [कर्तृत्वादि के अध्यास] भी
बोध की बाधा नहीं कर सकते । क्योंकि उन दोनों को तो तत्त्व-
ज्ञान ने पहले ही पछाड़ दिया था ।
बाधितं दृश्यतामक्षै स्तेन बाधो न शक्यते ।
जीवन्नाखुर्न मार्जारं हन्ति हन्यात् कथं मृतः ॥२७९॥
यह बाधित जगत्, इन्द्रियों से भले ही दीखता रहे, परन्तु
इस बाधित जगत् से [ तत्त्वज्ञान की ] बाधा नहीं हो सकेगी
[ क्योंकि अविद्यारूपी उपादान के निवृत्त हो जाने से उसका
कार्य भी बाधित हो चुका है] दृष्टान्त भी देख लो कि जो चूहा
जीते जी बिल्ली को नहीं मार सकता वह भला मर जाने पर
कैसे मार सकेगा ?
अपि पाशुपतास्त्रेण विद्धश्चेन्न ममार यः ।
निष्फलेषुवितुन्नाङ्गो नङ्क्ष्यतीत्यत्र का प्रमा ॥२८०॥