सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 332

३१२ पञ्चदशी
विषयों के मिलने से प्राणी की जो तृप्ति होती है, वह तृप्ति
साङ्कुश [समर्याद] तृप्ति कहाती है [एक विषय के मिलने से
जो तृप्ति होती है, दूसरे विषय की कामना, हमें उस तृप्ति का
मज़ा पूरी-पूरी तरह लूटने ही नहीं देती। दूसरी कामना उत्पन्न
होते ही पहली तृप्ति के टूक-टूक कर डालती है। इसी से
विषयों से होने वाली तृप्ति को साङ्कुश (परिमित) तृप्ति कहते
हैं] परन्तु यह तृप्ति,जिसका वर्णन अब हम करने लगे हैं, वैसी
मामूली तृप्ति नहीं है। यह तो निरंकुश [अमर्याद = अपरिमित]
तृप्ति है [क्योंकि यह तृप्ति किसी भी कामना से कुण्ठित
(खण्डित) नहीं हो जाती। यह तृप्ति तो नित्य नयी नकोर बनी
रहती है] इस तृप्ति को पा लेने वाले के हृदय भवन में तो सदा
ही ये शब्द गूँजा करते हैं कि 'जो कुछ मुझे करना था सो मैं
कर चुका तथा जो कुछ मुझे पाना था वह मुझे मिल गया।'
ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये।
बहुकृत्यं पुरास्याभूत् तत् सर्वमधुना कृतम् ॥२५३॥
इस ज्ञानी को जब तक तत्व ज्ञान नहीं हुआ था तब तक
इसको इस लोक और परलोक के कामों के तथा मुक्ति की सिद्धि
के लिये बहुत कुछ करना शेष था [इष्ट को पाने और अनिष्ट को
हटाने के लिये खेती आदि करनी थी। स्वर्गादि के लिये याग
उपासना आदि करने थे। ज्ञान की सिद्धि के लिये श्रवणादि
करने रहे थे।] परन्तु अब तो [जब कि इसे किसी भी सांसा-
रिक फल की इच्छा नहीं रही है और ब्रह्मानन्द का साक्षात्कार
हो चुका है] वह सभी कुछ किया सा हो गया