पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् २०२
है और अज्ञानी रो झींक कर अपने हिस्से आया काम असक्ति
या द्वेष से करता है।
ऐहिकामुष्मिकः सर्वः संसारो वास्तवस्ततः ।
न भाति नास्ति चाद्वैतमित्यज्ञानिविनिश्चयः ॥२४०॥
[स्त्री पुत्रादि का पोषण आदि] ऐहिक तथा [स्वर्ग सुखादि
का अनुभव आदि] आमुष्मिक यह सब संसार वास्तव ही है
और अद्वैत नाम की कोई चीज़ न तो प्रतीत ही होती है और
न वह है ही। बस यही अज्ञानी लोगों की धारणा होती है।
ज्ञानिनो विपरीतोऽस्मान्निश्चयः सम्यगीक्ष्यते ।
स्वस्वनिश्चयतो बद्धो मुक्तोऽहं चेति मन्यते ॥२४१॥
ज्ञानी लोगों को तो इससे विपरीत निश्चय होता है, जो
ज्ञानियों में स्पष्ट ही देखा जाता है [ वे समझते हैं कि अद्वैत ही
एक पारमार्थिक वस्तु है तथा उन्हें अद्वैत की प्रतीति भी होती
है। संसार को तो वे निश्चित रूप से अपारमार्थिक किंवा मिथ्या
समझे रहते हैं। हम तो यही समझते हैं कि] अपने अपने निश्चय
के अनुसार कोई अपने को बद्ध और कोई अपने को मुक्त माना
करते हैं।
नाद्वैतमपरोक्षं चेन्न चिद्रूपेण भासनात् ।
अशेषेण न भातं चेद् द्वैतं किं भासतेऽखिलम् ॥२४२॥
'अद्वैत तो किसी को प्रत्यक्ष ही नहीं होता है ऐसा कहना
ठीक नहीं है। क्योंकि 'घट की स्फूर्ति होती है, पट की स्फूर्ति
होती है' इत्यादि चिद्रूप से उस अद्वैततत्व की प्रतीति सभी को
[ सब पदार्थों में ] हो रही है। इस पर भी यदि यह कहो कि
सम्पूर्ण अद्वैत का भान तो किसी को होता ही नहीं, तो हम यह