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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 726 में से

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पृष्ठ 221

चित्रदीपप्रकरणम् २०१
मुमुक्षुभाव ही रहता है और न कभी यह मुक्त ही होता है ।
यही परमार्थ है । [ निरोध, उत्पत्ति, बद्धता, साधक भाव,
मुमुक्षुत्व तथा मुक्ति यह कुछ भी वास्तविक नहीं है ।
ये सब तो आत्म-सागर में आने वाली क्षुद्र लहरें हैं। ये
सब तो आत्मसमुद्र में उठ खड़े हुए तुच्छ बुलबुले हैं। समुद्र के
गम्भीर अन्तस्तल के नाई यह आत्मसागर सदा शान्त और एक-
रस ही बना रहता है । उपर्युक्त घटनाओं में से एक भी घटना
'पारमार्थिक नहीं है । बस यही सम्पूर्ण शास्त्रों का निचोड़ किंवा
परमार्थ बात है ] ।
मायाख्यायाः कामधेनो र्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ ।
यथेच्छं पिबतां द्वैतं तत्त्वं त्वद्वैतमेव हि ॥२३६॥
इस सब कथन का सारांश तो यही है कि माया नाम की एक
कामधेनु है, उसके दो बच्चे हैं, एक का नाम 'जीव' है दूसरे का
नाम 'ईश्वर' है । वे दोनों बच्चे द्वैत रूपी दूध को भले ही पेट
भर भर पीते रहें [ वे इसमें किलोलें किया करें ] परन्तु तत्व
तो अद्वैत ही है ।
कूटस्थब्रह्मणोर्भेदों नाममात्रादृते न हि ।
घटाकाशमहाकाशौ वियुज्यते न हि क्वचित् ॥२३७॥
कूटस्थ और ब्रह्म [ दोनों ही पारमार्थिक हैं परन्तु इनका
भेद पारमार्थिक नहीं है क्योंकि इन ] का भेद तो नाम मात्र के
अतिरिक्त कुछ भी नहीं है [ इनका भेद तो कहने ही कहने को
है ] जैसे घटाकाश और महाकाश [ कहने ही कहने को पृथक्
पृथक् होते हैं वस्तुतः इन दोनों ] का पार्थक्य कभी
नहीं होता ।
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