पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् १९२
जीवित हैं [जब तक ये दोनों किसी को भास रहे हैं] तब तक
आत्मा की असंगता का ज्ञान होना भी असंभव ही समझ लो
[अद्वैत ज्ञान के विना असंगता का बोध हो ही नहीं सकता
यह यहां गुप्त भाव है]
अवश्यं प्रकृतिः सङ्गं पुरेवापादयेत् तथा ।
नियच्छत्येतमीशोऽपि कोऽस्य मोक्षस्तथा सति ॥२३१॥
[अपने आपको असंग समझ कर जो कृतकृत्य हो बैठा
है] यह प्रकृति पहले की तरह [जैसे कि उसने पहले असंग में
संग कर रक्खा था] फिर भी उसमें संग पैदा कर ही देगी ।
ईश्वर भी अपना शासन उस पर पूर्ववत् रखेंगे ही । फिर
बताओ कि उस विचारे का यह मोक्ष ही क्या हुआ ?
अविवेककृतः सङ्गो नियमश्चेति चेत् तदा ।
बलादापतितो मायावादः सांख्यस्य दुर्मतेः ॥२३२॥
सङ्ग और नियमन दोनों ही अविवेक से उत्पन्न हुआ करते
हैं [फिर जब एक बार विवेक ज्ञान से अविवेक मर जायगा तब
सङ्ग या नियमन की उत्पत्ति हो ही कैसे सकेगी ?] ऐसा यदि
सांख्य कहता हो तब तो वह अविचारशील ज़बरदस्ती [न
चाहने पर भी] मायावादी हो जाता है । [भाव यह है कि
यदि उस अविवेक को अभावमात्र मानें, तब तो उससे भाव
रूप कार्य की उत्पत्ति ही कैसे हो सकेगी ? यदि और किसी
को संग का कारण मानें तो अविवेक को छोड़कर और कोई
पदार्थ सङ्ग को उत्पन्न करने का कारण देखा ही नहीं गया ।
फिर जब उस अविवेक को भावरूप अज्ञान माना जायगा,
तब इसी को तो मायावाद कहा जायगा ।]