पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 726 में से
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प्रतीति ही नहीं होनी चाहिये । विवेक [अर्थात् उपनिषदों के
विचार से उत्पन्न हुआ ज्ञान] ही अविद्या का विरोधी होता है
यह बातें तत्वज्ञानी में देखी जा सकती हैं ।
अविद्यावृतकूटस्थे देहद्वययुता चितिः ।
शुक्तौ रूप्यवदध्यस्ता विक्षेपाध्यास एव हि ॥३३॥
[अब क्रमप्राप्त विक्षेपाध्यास को कहते हैं]—दोनों देहों से
युक्त जो चेतन है वह अविद्या से आवृत्त जो कूटस्थ है उसमें,
शुक्ति में रूप्य की तरह अध्यस्त हो जाता है, बस उसी को ‘विक्षे-
पाध्यास’ कहते हैं ।
इदमंशश्च सत्यत्वं शुक्तिगं रूप्य ईक्ष्यते ।
स्वयन्त्वं वस्तुता चैवं विक्षेपे वीक्ष्यतेऽन्यगम् ॥३४॥
जैसे सीप का इदं भाग तथा सत्यता [अबाधितता] दोनों ही
धर्म उस में आरोपित रजत में प्रतीत होने लगते हैं, इसी प्रकार
चिदाभास में भी दूसरे [कूटस्थ] की स्वयन्ता तथा वस्तुता दीख
पड़ रही हैं ।
शुक्ति की इदन्ता [अर्थात् पुरोदेशादि से सम्बन्धित्व]
तथा सत्यता [अर्थात् अबाधितत्व] जैसे आरोपित रजत में
भासा करता है इसी प्रकार कूटस्थ की स्वयन्ता तथा वस्तुता
भी आरोपित चिदाभास में भासने लगी हैं ।
नीलपृष्ठत्रिकोणत्वं यथाशुक्तौ तिरोहितम् ।
असङ्गानन्दताद्येवं कूटस्थेऽपि तिरोहितम् ॥३५॥
जैसे शुक्ति की नीली पीठ और त्रिकोणपना ढक गया है, इसी प्रकार
कूटस्थ की असङ्गता तथा आनन्दता आदि भी तिरोहित हो गयी
हैं। [यों दोनों ही अध्यासों में विक्षेपअंश की अप्रतीति हो रही है।]