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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 726 में से

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पृष्ठ 146

१२८ पञ्चदशी
लगा हुआ है । बस उनकी यह भ्रान्ति ही [ इस संसार का
मूल कारण ] अविद्या कहाती है । [ इस भ्रान्ति ने ही इस
संसारं को चला रक्खा है ] विद्या से ही यह अविद्या निवृत्त
हुआ करती है ।
आत्माभासस्य जीवस्य संसारो नात्मवस्तुनः ।
इति बोधो भवेद् विद्या लभ्यतेऽसौ विचारणात् ॥११॥
'यह संसार तो आत्माभास [चिदाभास] जीव का ही है ।
आत्मवस्तु का संसार नहीं है' ऐसा ज्ञान ही 'विद्या' कहाती
है । अध्यात्म विचार करते रहने से [कालान्तर में] यह विद्या
हाथ आजाती है । [सूखे अध्ययन से इसकी प्राप्ति
नहीं होती ।]
सदा विचारयेत् तस्माज्जगज्जीवपरात्मनः ।
जीवभावजगद्भाववाधे स्वात्मैव शिष्यते ॥१२॥
क्योंकि विचार से विद्या मिलती है, इसलिये सदा ही
जगत्, जीव और परात्मा का विचार करता रहे [ कि इनका
कैसा कैसा स्वरूप है इत्यादि। यहाँ पर प्रश्न होता है कि मोक्षा-
वस्था मिल जाने पर फलरूप में हाथ आने वाले परात्मा का
विचार तो ठीक है, परन्तु जगत् और जीव का विचार करके हम
क्या करें ? उसका उत्तर यह है कि-] जीव भाव और जग-
द्भाव की जब बाधा होजाती है, किंवा जब जीवभाव और जग-
द्भाव का अपवाद कर दिया जाता है उस समय केवल
अपना आत्मा ही शेष रह जाता है [ इसी से कहते हैं कि पर-
मात्मा के विचार के साथ जीव और जगत् का विचार भी
करना ही चाहिये ] ।