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सर्वकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

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पातालखण्ड ] * शत्रुघ्न आदिका घोड़ेसहित आरण्यक मुनिके आश्रमपर जाना * ४८३


सेना साथ ले सीताके लिये लङ्कापुरीको चारों ओरसे घेर लिया। तृतीयासे दशमीपर्यन्त आठ दिनोंतक सेनाका घेरा पड़ा रहा। एकादशीके दिन शुक और सारण सेनामें घुस आये थे। पौष-कृष्ण द्वादशीको शार्दूलके द्वारा वानर-सेनाकी गणना हुई। साथ ही उसने प्रधान-प्रधान वानरोंकी शक्तिका भी वर्णन किया। शत्रुसेनाकी संख्या जानकर रावणने त्रयोदशीसे अमावास्यापर्यन्त तीन दिनोंतक लङ्कापुरीमें अपने सैनिकोंको युद्धके लिये उत्साहित किया। माघ-शुक्ल प्रतिपदाको अङ्गद दूत बनकर रावणके दरबारमें गये। उधर रावणने मायाके द्वारा सीताको, उनके पतिके कटे हुए मस्तक आदिका दर्शन कराया। माघकी द्वितीयासे लेकर अष्टमीपर्यन्त सात दिनोंतक राक्षसों और वानरोंमें घमासान युद्ध होता रहा। माघ शुक्ल नवमीको रात्रिके समय इन्द्रजित्ने युद्धमें श्रीराम और लक्ष्मणको नाग-पाशसे बाँध लिया। इससे प्रधान-प्रधान वानर जब सब ओरसे व्याकुल और उत्साहहीन हो गये तो दशमीको नाग-पाशका नाश करनेके लिये वायुदेवने श्रीरामचन्द्रजीके कानमें गरुड़के मन्त्रका जप और उनके स्वरूपका ध्यान बता दिया। ऐसा करनेसे एकादशीको गरुड़जीका आगमन हुआ। फिर द्वादशीको श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे धूम्राक्षका वध हुआ। त्रयोदशीको भी उन्हींके द्वारा कम्पन नामका राक्षस युद्धमें मारा गया। माघ शुक्ल चतुर्दशीसे कृष्ण पक्षकी प्रतिपदातक तीन दिनमें नीलके द्वारा प्रहस्तका वध हुआ। माघ कृष्ण द्वितीयासे चतुर्थीपर्यन्त तीन दिनोंतक तुमुल युद्ध करके श्रीरामने रावणको रणभूमिसे भगा दिया। पञ्चमीसे अष्टमीतक चार दिनोंमें रावणने कुम्भकर्णको जगाया और जागनेपर उसने आहार ग्रहण किया। फिर नवमीसे चतुर्दशीपर्यन्त छः दिनोंतक युद्ध करके श्रीरामने कुम्भकर्णका वध किया। उसने बहुत-से वानरोंको भक्षण कर लिया था। अमावास्याके दिन कुम्भकर्णकी मृत्युके शोकसे रावणने युद्धको बंद रखा। उसने अपनी सेना पीछे हटा ली। फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदासे चतुर्थीतक चार दिनोंके भीतर विसतन्तु आदि पाँच राक्षस मारे गये। पञ्चमीसे सप्तमीतकके युद्धमें अतिकायका वध हुआ। अष्टमीसे द्वादशीतक पाँच दिनोंमें निकुम्भ और कुम्भ मौतके घाट उतारे गये। उसके बाद तीन दिनोंमें मकराक्षका वध हुआ। फाल्गुन कृष्ण द्वितीयाके दिन इन्द्रजित्ने लक्ष्मणपर विजय पायी। फिर तृतीयासे सप्तमीतक पाँच दिन लक्ष्मणके लिये दवा आदिके प्रबन्धमें व्यग्र रहनेके कारण श्रीरामने युद्धको बंद रखा। तदनन्तर त्रयोदशीपर्यन्त पाँच दिनोंतक युद्ध करके लक्ष्मणने विख्यात बलशाली इन्द्रजित्को युद्धमें मार डाला। चतुर्दशीको दशग्रीव रावणने यज्ञकी दीक्षा ली और युद्धको स्थगित रखा। फिर अमावास्याके दिन वह युद्धके लिये प्रस्थित हुआ। चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर पञ्चमीतक रावण युद्ध करता रहा; उसमें पाँच दिनोंके भीतर बहुत-से राक्षसोंका विनाश हुआ। षष्ठीसे अष्टमीतक महापार्श्व आदि राक्षस मारे गये। चैत्र शुक्ल नवमीके दिन लक्ष्मणजीको शक्ति लगी। तब श्रीरामने क्रोधमें भरकर दशशीशको मार भगाया। फिर अञ्जना-नन्दन हनुमान्जी लक्ष्मणकी चिकित्साके लिये द्रोण पर्वत उठा लाये। दशमीके दिन श्रीरामचन्द्रजीने भयङ्कर युद्ध किया, जिसमें असंख्य राक्षसोंका संहार हुआ। एकादशीके दिन इन्द्रके भेजे हुए मातलि नामक सारथि श्रीरामचन्द्रजीके लिये रथ ले आये और उसे युद्धक्षेत्रमें भक्तिपूर्वक उन्होंने श्रीरघुनाथजीको अर्पण किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी चैत्र शुक्ल द्वादशीसे कृष्णपक्षकी चतुर्दशीतक अठारह दिन रोषपूर्वक युद्ध करते रहे। अन्ततोगत्वा उस द्वैरथयुद्धमें रामने रावणका वध किया। उस तुमुल संग्राममें श्रीरघुनाथजीने ही विजय प्राप्त की। माघ शुक्ल द्वितीयासे लेकर चैत्रकृष्ण चतुर्दशीतक सतासी दिन होते हैं, इनके भीतर केवल पंद्रह दिन युद्ध बंद रहा। शेष बहत्तर दिनोंतक संग्राम चलता रहा। रावण आदि राक्षसोंका दाहसंस्कार अमावास्याके दिन हुआ। वैशाख शुक्ल प्रतिपदाको श्रीरामचन्द्रजी युद्धभूमिमें ही ठहरे रहे। द्वितीयाको लङ्काके राज्यपर विभीषणका अभिषेक किया गया। तृतीयाको सीताजीकी अग्निपरीक्षा हुई और देवताओंसे वर मिला। इस प्रकार लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरामने लङ्कापति रावणको थोड़े ही दिनोंमें