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सर्वकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 246

भूमिखण्ड ] * सुमनाके द्वारा ब्रह्मचर्य, धर्म तथा धर्मात्मा और पापियोंकी मृत्युका वर्णन * २२९


करना चाहिये। इससे मनुष्यमें चेतनाका विकास होता
है। अब मैं शुश्रूषाका स्वरूप बतलाती हूँ। मन, वाणी
और शरीरसे गुरुके कार्य-साधनमें लगे रहना शुश्रूषा है।
द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने आपसे धर्मका साङ्गोपाङ्ग
वर्णन किया। जो मनुष्य ऐसे धर्ममें सदा संलग्न रहता है,
उसे संसारमें पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता—यह मैं
आपसे सच-सच कह रही हूँ। महाप्राज्ञ ! यह जानकर
आप धर्मका अनुसरण करें।

सोमशर्माने पूछा— देवि ! तुम्हारा कल्याण हो,
तुम इस प्रकार धर्मकी परम पुण्यमयी उत्तम व्याख्या कैसे
जानती हो ? किसके मुँहसे तुमने यह सब सुना है ?

सुमना बोली— महामते ! मेरे पिताका जन्म
भार्गव-वंशमें हुआ है। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण
हैं। उनका नाम है महर्षि च्यवन। मैं उन्हींकी कन्या हूँ।
वे मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानते थे। जिस-जिस
तीर्थ, मुनि-समाज अथवा देवालयमें वे जाते, मैं भी
उनके साथ वहाँ जाया करती थी। मेरे पिताजीके एक
मित्र हैं, जिनका नाम है वेदशर्मा। कौशिकवंशमें उनका
जन्म हुआ है। एक दिन वे घूमते-घामते पिताजीके पास
आये। उस समय वे बहुत दुःखी थे और बारंबार
चिन्तामग्न हो जाते थे। तब उनसे मेरे पिताने
कहा—'सुव्रत ! मालूम होता है आप किसी दुःखसे
संतप्त हैं। आपको दुःख कैसे प्राप्त हुआ है, मुझे इसका
कारण बताइये।' यह सुनकर वेदशर्माने कहा—'मेरी
स्त्री बड़ी साध्वी और पतिव्रता है, किन्तु अबतक उसे
कोई पुत्र नहीं हुआ। मेरा वंश चलानेवाला कोई नहीं है।
यही मेरे दुःखका कारण है; आपने पूछा था, इसलिये
बताया है।'

इसी बीचमें कोई सिद्ध पुरुष मेरे पिताके आश्रमपर
आये। पिताजी और वेदशर्मा दोनोंने खड़े होकर
भक्तिपूर्वक सिद्धका पूजन किया। भोजन आदि उपचारों
और मीठे वचनोंसे उनका स्वागत किया। फिर आपने
पहले जिस प्रकार प्रश्न किया था, उसी प्रकार उन दोनोंने
भी सिद्धसे अपने मनकी बात पूछी। तब धर्मात्मा सिद्धने
मेरे पिता और उनके मित्रसे इस प्रकार कहा—'धर्मके
अनुष्ठानसे ही स्त्री, पुत्र और धन-धान्यकी प्राप्ति होती
है।' उनके उपदेशसे वेदशर्माने धर्मका अनुष्ठान पूरा
किया। उस धर्मसे उन्हें महान् सुख और सुयोग्य पुत्रकी
प्राप्ति हुई। उन सिद्ध महात्माके सत्सङ्गसे ही धर्मके
विषयमें मेरी बुद्धिका ऐसा निश्चय हुआ है।

सोमशर्माने पूछा— प्रिये ! धर्मसे कैसी मृत्यु
और कैसा जन्म होता है ? शास्त्रके अनुसार उस मृत्यु
और जन्मका लक्षण जैसा निश्चित किया गया हो, वह
सब मुझे बताओ।

सुमना बोली— प्राणनाथ ! जिसने सत्य, शौच,
क्षमा, शान्ति, तीर्थ और पुण्य आदिके द्वारा धर्मका
पालन किया है, उसकी मृत्युका लक्षण बतलाती हूँ।
धर्मात्मा पुरुषको मृत्युके समय कोई रोग नहीं होता,
उसके शरीरमें कोई पीड़ा नहीं होती; श्रम, ग्लानि, स्वेद
और भ्रान्ति आदि उपद्रव भी नहीं होते। गीत-ज्ञान-
विशारद दिव्यरूपधारी गन्धर्व और वेदपाठी ब्राह्मण
उसके पास आकर मनोहर स्तुति किया करते हैं। वह
स्वस्थ रहकर सुखदायक आसनपर विराजमान होता है।
अथवा देवपूजामें बैठा होता है। ऐसा भी हुआ करता है
कि धर्मपरायण बुद्धिमान् पुरुष [मृत्युकालमें] स्नानके
लिये तीर्थ-स्थानमें पहुँचा हो। अग्निहोत्र-गृह, गोशाला,
देवमन्दिर, बगीचा, पोखरा, पीपल या बड़का वृक्ष तथा
पाकर अथवा बेलका पेड़—ये मृत्युके लिये पवित्र
स्थान माने गये हैं। धर्मात्मा पुरुष धर्मराजके दूतोंको
प्रत्यक्ष देखता है। वे स्नेहसे युक्त और मुसकराते हुए
दिखायी देते हैं। वह मरनेवाला जीव स्वप्नं, मोह तथा
क्लेशके अधीन नहीं होता। धर्मराजके दूत उससे कहते
हैं—'महाभाग ! परम बुद्धिमान् धर्मराज आपको बुला
रहे हैं।' दूतोंकी यह बात सुनकर उसे मोह और सन्देह
नहीं होता। उसका चित्त प्रसन्न हो जाता है। वह
ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न हो भगवान् श्रीविष्णुका स्मरण
करता है और संतुष्ट एवं हृष्टचित्त होकर उन दूतोंके साथ
चला जाता है।

सोमशर्माने पूछा— भद्रे ! पापियोंकी मृत्यु किन
लक्षणोंसे युक्त होती है, इसका विस्तारके साथ वर्णन करो।