क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 73 में से
संदर्भ में पढ़ेंकथा का प्रभाव यह हुआ उनके पिता जी पहले नित्य चार घंटे भजन किया करते थे।
उनके दो लाख भगवद् मन्त्रों के जप का नियम था। भागवत के मर्म रहस्य को जान
कर पिता पुनः 'नित्य' की भाँति भगवद् के स्वरूप लीन रहने लगे।
‘नित्य’ शब्द नित्य ही, नित्य स्वरूप ‘स्व’ को जान कर नित्य लीन ‘नित्य’
स्वरूप बन गया। विचारवान पुरुष, संसार सागर पार हो जाता प्रत्येक क्षण प्रत्येक
अनुगामी जन।
009/ महाराज जी वैष्णव या सम्प्रदाय विशेष के प्रचारक विचारक नहीं
श्री महाराज जी किसी भी मत, या जो मत वाद चल रहा है या जितने मत हैं
सब को ईश्वर सन्निध या भगवान् का अनुग्रह ही माना? जो भी साक्षात्कार का पथ
या मार्ग, प्रत्येक मानव हृदय ग्राह्य बना?
महाराज जी ज्ञान मय पथ पर चल कर सर्व प्रथम अपने आत्मिक या आत्मिक
सत्य को ही सब कुछ मान कर उस पर चले। जब प्रत्येक ज्ञान स्वरूप उस परम सत्य
को जाना ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त हुए।
ज्ञान प्राप्ति का मूल रूप तो प्रभु कृपा या भगवद् कृपा ही रहा सब कुछ उस
भगवद् कृपा पर छोड़ दिया जो कुछ स्वरूप का दर्शन या प्रभु का साक्षात् हुआ,
सो प्रभु-कृपा रूपी ही आधार बन गया। ज्ञान मार्ग पर चल कर ही सब कुछ
जान, श्री महाराज स्वामी जी प्रभु भाव रूप बन गये। वे प्रभु को साकार भी मान
लिया साक्षात्कार भी हो स्वरूप जान कर, सो साकार रूप; निराकार का
साक्षात्कार साक्षात्कार हुआ, पर दो रूपेण विभक्त न विभक्त का रूप बना।
सो जो जन जिस पथ पर चलना चाहे या चल रहा उस पथिक को, उस
ही पथ सम्प्रदाय का सम्बल दे। उस पथ द्वारा प्रत्येक पन्थिक को भगवद् के पथ
पहुँचा दिया, सो जो जन जिस प्रकार पथिक के सम्मुख जो भी भाव
प्रदर्शित हुए।
सो सो तो सम्प्रदाय या जो सम्प्रदाय के मत प्रचार रूप या प्रचारक का रूप जान
पड़ा। पर
महाराज स्वामी जी, अपने स्वरूप प्रभु
को केवल मात्र घट घट में व्याप्त ही ज्ञान भाव द्वारा जाना था, सो जो जन
जिसके सम्मुख जिस भाव से आया उसे उसी के अनुसार पथिक का उपदेशक बना। सो
प्रत्येक पथिक को सम्बल मिला सो सब ही पन्थ या सब पन्थ धारियों का पूज्य बन
गया सब सम्प्रदाय उस के अपने रूप में रूपान्तरित हो गये। न कोई विरक्त, न कोई द्वेषी रहा।
सो सब रूपी सत्य प्रभु
रूप ही बन प्रत्येक पथिक को सो प्रभु के सत्य का रूप सत्य दिया?
सब जन तो केवल सत्य ही विभूति का रूप जान कर सत्य का सम्बल
ही लिया, जो सम्बल लिया सो सत्य
का दिया ही साक्षात्कार किया, जो सत्य विभक्त या भ्रष्ट था? सो ज्ञान था,
केवल ज्ञान रूप या साक्षात्कार रूप ही जाना था, केवल रूप सत्य का स्वरूप
सब सत्य ही सत्य रूप में सब प्रकार सब सत्य बन गया। सब के हृदय मन में,
सत्य ज्ञान-मयी रूपी सो ज्योति जगा कर स्वरूप का दर्शन कराया, सो सब
स्वयं रूप बना।
010/ साक्षात्कार प्रभु का दर्शन सब स्वरूप
ज्ञान विचार-धारा सत्य रूप में व्याप्त ही सत्य का रूप बन सब रूप में
व्याप्त रूप बना।
रूप सत्य बना उस साक्षात्कार का स्वरूप सत्य साक्षात्कार स्वरूप सत्य रूप
सब में व्याप्त उस सत्य के सत्य को ही जाना गया?
प्रभु रूप रूप में सम्मुख आ स्वयं सत्य साक्षात्कार सत्य ही साक्षात्कार सब
स्वरूप बना ज्ञान रूप बन कर ही साकार हुआ।
10