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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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समाज का रूप चाहे जैसा बने, मनुष्य अपने मूल रूपमें कभी नहीं बदल सकता कि वह
पशुताका आधार ग्रहण करे, अथवा वह स्वयं ही पशु हो जाय। माता-पिता और पत्नी, भाई
और बहन का सम्बंध क्या यह संसार मिटानेका प्रयत्न भी कर रहा होगा, यह मैं नहीं मानता।
यह तो एक सामाजिक ढांचा भर है। इन पर भी जब समाजके रूपमें गहरा आघात
पहुंचे तो लोग या स्वयं मर जाते हैं या फिर अपनी सुरक्षा करने के लिये दूसरों को मारते हैं।
मनुष्य का यही तो वह मूल आधार स्वभाव है। यह मिटा नहीं कि वह स्वयं मिटा और जब तक
वह मिट नहीं सकता, तो यह भी मिट नहीं सकता।
कभी आपने सोचा कि दुर्बलता क्या है? कभी इसका विचार किया है? कभी इस
विषय पर भी कुछ सोचा समझा? दुर्बलता तो निर्बलताके अतिरिक्त शारीरिक तौर कही
नहीं जा सकती। जो तो शारीरिक या अन्य किसी भौतिक रूपमें बलवान् नहीं उसका तो बल
समाप्त हो गया और दुर्बल एक असाध्य रोगके समान ही समाज में रहकर अपना जीवन
बिताता ही नहीं वरन् जीवन भार बन जाता है न! इससे तो अच्छा? स्वयं ही समझो? यही सब सोच,
समझकर, क्या यह उचित? कि किसी व्यक्ति को जो निर्बल और असहाय हो इस तरह छोड़
न दिया जाय जिससे वह, न जाने किसपर भी भार बन जाय।
समाज मनुष्य के लिये जिस तरह बनता उसी तरह मनुष्य भी समाज का पोषण और
रूप इस तरह बनाकर ही रख सकता, जिसे समाज ही कहा जाय? ऐसा ही
करना उचित भी? समाज का स्वरूप तो प्रत्येक रूपमें एक ऐसा रूप बनता
जिसमें न भय का स्थान, न भय देनेवाले, न भय पानेवाले रूपकी ही आवश्यकता
होती जिसका कि आधार मात्र प्यार, सेवा और त्याग, सहानुभूति आदि गुणों के अतिरिक्त
अन्य तो उसका रूप ही नहीं बनता और, जो रूप इस तरह न बनाया जा सके, वह तो
फिर एक परस्परकी शत्रुताका ही रूप तो माना जाय, जो विरोधी के रूपमें खड़ा
रहकर भी भयभीत होकर सब कुछ करता हो और ऐसा समाज तो एक न एक दिन
नष्ट होना ही।
आवश्यकता इस बात की तो तब जान पड़े जब समाज का विनाश हो, या
समाप्त ही कर दिया जाय या फिर इस पर आश्रित रूप ही न रहने दिया जाय।
न तब ऐसा अवसर भी बार बार आया करेगा! तब क्यों न इस बात पर विचार करके
समाज का ही सहारा त्याग दिया जाय। तब समाज अपने आप ही बन-मिट न कर
सदा अपने ही रूप बना ले और, उस समय भी तो सब कुछ वैसा ही बन जाय, जो
कि सब लोग आपस में एक दूसरे को मारें! विनाश तो तब भी समाज व्यक्तियों का
होगा ही, जिसे वर्तमान समाज कहा जा रहा उसी के द्वारा भी।
इसके लिये उपाय ही क्या किया जाय? जिसे केवल एक भय ही मात्र कहा
जाय, उसको तो दूर किया जाय? या फिर जिसके आधारपर समाज बंधा हुआ कहा
जाता? उस सारे वातावरण-को ही ऐसा बनाया जाय जिससे भय तो दूर ही भाग
जाय, तो फिर इसका फल तो सब को भोग ही पड़ेगा।
निर्बलता तो तब तक बनी ही रहेगी जब तक मनुष्य का रूप इस
प्रकार बदला नहीं बन जाता कि समाज उसे किसी प्रकार भी भयभीत न करे।
यह सब कैसे हो?
दुर्बलता क्या, या फिर इसका स्वरूप क्या? यह किसी का अपना कोई
स्वरूप? या फिर जब कभी सब अपने भय को ही त्याग बैठते हैं, तो ही दूसरा
उन पर अपना भय जमा लेता अथवा स्वयं दूसरा भयभीत हो कर आतंकित
रूप धारण कर लेता कहलाने का यत्न भी न कर पाता। इसका अर्थ तो यह हुआ,
भय का रूप जब व्यक्तियोंमें आया, तो इसका त्याग कोई एक ही तो नहीं करेगा और
न किया जा रहा है। भय निवारणार्थ रूप न बनने, सब को निर्भय हो इस
वातावरण को भी नष्ट करनेके लिये न तो कोई आगे आ रहा है न इस प्रकार
निर्भय बना सकेगा?
जो लोग समाजमें रहकर भी इस तरहके विचार व्यक्त करते हैं वे समाजके सम्बंधमें
कुछ नहीं जानते कि समाज का आधार ही भय और प्रेम दोनों के ऊपर ही स्थिर
रहता है। न तो भयके, न ही प्रेम मात्रके बलपर समाज की स्थिति रह सकती,
बल्कि दोनों, के एक दूसरे के सम्बंधसे ही समाज का स्वरूप इस प्रकार बना
रहना सदा सम्भव रहा।
"जो केवल भयके आधारपर समाज बनता है, केवल ही प्रेम मात्रपर समाज बनता"
इस बातको इतिहास के पृष्ठ मात्र ही सत्य सिद्ध
कर रहे हैं। ऐसा न कर समाज का संतुलन बिगड़
228

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231

विचारशीलता जहां नहीं, या घट गई या लुप्तप्राय हो, जीवन-व्यवहारों का संचालन या
तो प्रवृत्त प्रकृति द्वारा बने ढर्रे-खांचे पर ही भार की तरह हो, अन्यथा व्यक्तिगत स्वार्थों का
ऐसा घोर रूप प्रकट हो सकता कि समाज के अंग रूप माता-पिता केवल सुख की लालसा तृष्णा
मात्र संतानोत्पत्ति के पश्चात् कर्त्तव्य धर्म का निर्वाह न कर उन्हें दूध--मुंह पर छोड़
दोनों अलग--अलग दिशा में गमन दे लें, अथवा जो माता गर्भस्थ पिंड, या नव जात शिशु
संहारकारिणी हो सकती।
जिसके पास विचारशील मन, या विवेकवान् हो सकने योग्य हृदय, दोनों का अभाव
समझ पड़ता, जो विचारहीन ही सब कुछ अपने लिए उचित मान बैठते अथवा एक दम
पशुता पर ही उतर भी आते हों, तो आश्चर्य कैसा होगा?
विचारहीन तो कह बैठ भी सकते कि विचारशील का काम केवल शास्त्र चर्चा तक ही
सीमित रहे, जहां तक उस ज्ञान द्वारा मिले सुख की रक्षा का कर्त्तव्य ही उपस्थित हो
जाता वहां फिर? ज्ञान क्या तब तक केवल विचारहीनता की ओर हाथ बांधकर देखेगा? या तो
वह सब कुछ ही विचारवान् विचारहीनता के प्रति समर्पण करके अपने कर्त्तव्य समाप्त कर देगा?
विचारवान् की यह कर्त्तव्यनिष्ठा इस रूप में सदा उपेक्षित रहकर समाप्त होवेगी? या विचार
मात्र का ही रूप केवल रहेगा!
इसलिए कर्त्तव्य निर्वाह केवल ज्ञान या मात्र ज्ञान विचार तक ही नहीं, ज्ञान केवल
सुख भोग का साधन या उपभोग ही बनकर न रह जावे वरन् विचार निष्ठावान् बनकर कर्त्तव्य
का रूप भी धारण करे, जहां विचार ज्ञान दोनों हों।
विचार कर्त्तव्य के रूप, जहां भी ज्ञान धर्म की रक्षा का प्रश्न आवेगा वहां, यह ज्ञान
केवल बातों का रूप धारण करके ही रह जावेगा तो वह ज्ञान ही क्या हुआ कहलाता ज्ञान
कभी समाप्त हो जाता या संशय का कारण भी बन सकता? तब फिर ज्ञान कैसा विचार का रूप,
या केवल विचार बनकर, जहां पर ज्ञान कर्त्तव्य को ही न रख सके वहां विचार का ही क्या
मूल्य रह जावे, जो ज्ञान सब कुछ देकर भी न तो अपने को और न ही दूसरों
संकटों से बचा सके, वह ज्ञान संकट कारक हो कर विचारवान् को भ्रमित अवश्य ही कर
सकता हो सके, उस ज्ञान रूपी ज्ञान को, न ज्ञान कहा जा सकता केवल विचार।
यह भी संभव, कि ज्ञान सब कुछ देकर भी जब केवल विचारहीनता का ही रक्षक,
या ज्ञान का रक्षक न होकर केवल विचारहीनता के अनुकूल ही काम करे, अथवा विचार
शून्य, बनकर ही रह जावे, तब कैसा कर्त्तव्य पालन? तो विचारहीन सब कुछ, ज्ञान
शून्य सब कुछ ही? तो कर्त्तव्य क्या है? इस बात को, जो ज्ञान केवल विचार मात्र?
ज्ञान केवल विचार ही? विचार कैसा जो ज्ञान का ही नाश कर देवेगा? विचार
सत्य ज्ञान को धारण करे, ज्ञान कर्त्तव्यवान् बने! ज्ञान ही ज्ञान! ज्ञान विचार का
रूप नहीं!
ज्ञान केवल नाम पर ही कर्त्तव्य का रूप न दे सके मात्र ज्ञान के स्थान पर तो
विचार का ही रूप सब कुछ हो ही सकता।
ज्ञान कर्त्तव्यवान् बनकर ही ज्ञान रूप द्वारा ही कर्त्तव्य बनता है, जो न
केवल ज्ञान रूप ही बना रहे, वरन् जो ज्ञान कर्त्तव्य रूप को अपनावेगा, वह
विचारवान् कहला कर कर्त्तव्य का रूप भी लेगा।
विचार केवल मन की ही बात तक सीमित न रह जावे, जो ज्ञान के अनुकूल
हो, उस विचार युक्त विचार मन का नाम ज्ञान कहा जा सकता कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान
रूप कर्त्तव्य कहलाता या ज्ञान रूप, जिसे जो सब कुछ ही कर्त्तव्य रूप ही? तो
कर्त्तव्य विचारवान् बनकर सब कुछ ज्ञान का ही रूप देकर सब कुछ अपने विचार को ही
सब कर्त्तव्य विचारवान् का रूप देकर कर्त्तव्य का ही ज्ञान रूप सब कुछ ही करता जहां
पर कर्त्तव्य का नाम ही कर्त्तव्य का रूप ही कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान का रूप ही
ज्ञान, सब कुछ ही? ज्ञान का विचार तो ज्ञान ही बना! ज्ञान रूप तो ज्ञान बनकर ही रह
गया फिर ज्ञान केवल विचार का रूप देकर क्या ही करेगा? कर्त्तव्य मात्र का तो
रूप नहीं! ज्ञान का नाम ही ज्ञान रूप ज्ञान बन कर कर्त्तव्य के रूप में अवश्य
आवेगा, तब ही वह विचार का रूप होगा।
तो विचारवान् कर्त्तव्य रूप सब कुछ बनावेगा, जो ज्ञान सदा कर्त्तव्य
ज्ञान रूप बनकर रह सके, तो कर्त्तव्य विचार कर्त्तव्य ज्ञान रूप कर्त्तव्य
का केवल ज्ञान रूप, तो ज्ञान कर्त्तव्य का रूप देकर ज्ञान रूप ही कर्त्तव्य
रूप ही सब कुछ बन
सके ज्ञान रूप, "जो ज्ञान का रूप कर्त्तव्य ज्ञान ही सब कुछ।"
इस तरह ज्ञान का कर्त्तव्य केवल ज्ञान रूप ही न होकर कर्त्तव्य द्वारा ज्ञान
रूप हो तो कर्त्तव्य का ज्ञान ही कर्त्तव्य हो कर ज्ञान बनकर कर्त्तव्य ही हो जावेगा।
232

और पत्र संग्रह-की सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाए"

यद्यपि इस वर्ष एक नये सज्जन उपस्थित हुए परंतु कार्यकारिणी केवल एक बार
मिली।
"साधरण सभा का यह मत था वर्तमान मंडल को धन, सम्पत्ति, सामग्री, पुस्तकें
और पत्र संग्रह-की सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाए"
पर "सब का सब सुपुर्द हो", इस बात विचार ही नहीं हो सकता था, ना कोई कोष,
ना पुस्तक थी, ना पत्रिका थी, केवल एक दो सौ पृष्ठ एक रजिस्टर केवल था जो सब १
विषय था, यह पत्रव्यवहार जिस का प्रत्येक पत्र अलग पत्र पर नहीं हो सकता था, पर
कार्यकारिणी केवल एक ही विषय पर, केवल एक विषय पर बहस करने नियत थी।
केवल कार्यकारिणी सदस्य ही, व प्रधान जी, कार्यकारिणी केवल बात का ध्यास था कि
सब विषय संक्षेप रूप सब सम्मुख रखे जाएं सो, केवल किसी प्रकार नवीन रूपया इकट्ठा
किया जाय इस बात पर विचार नहिं था, केवल कार्यकारिणी विचार केवल नवीन रूपया,
केवल इसी बात पर सब का आकर्षण किया जाय सो, केवल कार्यकारिणी सदस्य,
केवल इस बात पर ध्यान लगा रहा, केवल इसी विषय केवल ध्यान, इस प्रकार
सभा, केवल एक बार
इस प्रकार से कार्यकारिणी समाप्त हुई, पर क्या किसी अन्य प्रकार से? या विचार ही
सब का इस प्रकार विचार करने का ही विचार करने का विचार सब किया जाय, केवल १
विषय पर केवल ही विचार हो सकता है? सब प्रकार से सब ही? सब प्रकार से केवल ही,
सब ही? सब सम्प्रदाय ही ना, सब नवीन रूप? सब प्रकार से ही सम्प्रदाय रूप? सब
प्रकार ही रूपया धन, नवीन रूप? सब प्रकार से ही सब नवीन रूपया धन? सब
प्रकार ही सब नवीन रूपया धन? इस प्रकार से ना व सब?
केवल कार्यकारिणी इस वर्ष के समाप्त करने तक सब एक मत सब विषय
प्रकार सब सम्मुख रखा जाय सो, केवल सब एक मत सब विषय उपस्थित कर सब सम्मुख
कार्यकारिणी पर रख दिए।
केवल इतना किया गया कि यह निश्चय किया गया कि सब यह कार्यकारणी का सम्मुख
सब पत्र-संग्रह का सब की सब वस्तु सुपुर्द
कीजाय केवल कार्यकारिणी
सब नवीन रूपया एकत्रित एकत्रित कर सब सब उपस्थिति
का भेजा जाय।
233

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234

यह जानकर सब लोग चक्रवर्तीके निकट गये ओर हाथजोड विनय कर बोले स्वामिन्
शत्रुने तो केवल दो सौही बाण मारे ऐसा सुना, सो यह चक्रवर्तीके तो एक ही बाण
लगा होगा? सो बात तो इस भांति बनी ही, किन्तु इन तीन सौ; सात सौने बाण ऐसे
लगाये कि कोई बाण तो बाण पर लगा जाकर, बाकी बाणों ने जहां तहां अंगो-
पांगोंको छेदा जिस करके चक्रवर्ती के सर्वांगमें घावों के मारे एक तिल भर भी
घाव विना ना रहा जिस चक्रवर्तीने मूर्च्छित हो प्राण छोडे
यद्यपि कोई कहे कि जब इस भांति राजा रणमें मारा ही, तो सो ही मुक्ति
जाना चाहिये सो राजा सर्वार्थ मे गया ही, सो तो मोक्ष जैसा ही सुखहै सो
संसार की रक्षा निमित्त मरा था इस हेतु जहां गया, सो चक्रवर्ती का तो मोक्ष
अवश्य ही था परन्तु उस भव में तो मुनि ही ना था सो राजा भरत जी की भांति
ना हो सका सो संसार चक्रमें ही था, परन्तु उस भव में राजा सर्वार्थ सिद्धि में
गया सो इस प्रकार से संसार का अंत ही हुआ सो आगे मोक्ष होगा, राजा तो ऐसा
उत्तम जीव था जिसने ऐसा काम किया, परन्तु देखने वाले, जो रणमें ना गये
सो उनका तो मन ही बिगड कर नरक गये सो कहो जहां चक्रवर्ती तो सर्व सिद्धि
में चक्रवर्ती न कहलावे किन्तु देव कहलावे, सो वो, उस जीवको सर्वार्थ सिद्धि तक
भेजने वाला तो नरक में, वो चक्रवर्ती काम-क्रोध कर सब सेना समेत चक्रवर्ती
सद्-गति को पहुंचा सो जीव को उत्तम व पापी निमित्तोंसे कैसे फल मिलते हैं
सब कोई इस बातको विचारे कि मन कैसा बलवान् है, जो काम इस जीवने कियाही
सर्वार्थसिद्धि का फल उस जीव जिसने चक्रवर्तीको उपदेश किया उसने चक्रवर्ती
को तो मुक्ति भेजी ही दी, परन्तु सर्वार्थसिद्धिवाला नरकमें किस लिये
गया ऐसा कहो सो उत्तर कि वो जीव जिसने ऐसा उपदेश दिया वो उस
ही बाण के घाव से मूर्च्छित हो, राजाने तो वो उपदेश याद कर तो घाव सह लिये
सो मुक्ति गया और यह जीव जो, वो तो उपदेश भूल गया सो, वो नरक गया
ऐसी कथा है॥
जो जन धर्म में पक्के होते हैं, वो उपदेश सब जीव न केवल नर ही
देव, नारकी, वा तिर्यञ्च सब जीवों को उपदेश देते हैं केवल, सो सब को पाले,
ना सब को सार भी कहे, जिसने धर्मको धारण कर लिया जिसने सब को
सार कहा, नरक से बचने वाला जीव कहा
जैसे नरक में सब को दुःख होता-होता किसी को सुख का लेश
तक भी ना होता सो जीव दुःखी ही होता, सो वो जीव भी नरक में उपदेशी ही
काम करता नरक में भी सब जीव को ऐसा ही फल सब जन पावे सो, नरक ही
जावे, मन-भाव बुरा, फल, वो तो वो ही नरक गया जिसने वो उपदेश तो
सर्वार्थ को दिया सो चक्रवर्तीको फल-होगा, उपदेशकको तो-वो फल उस जीव का
फल उस उपदेशक को मिलता न रहा, नरक ही फल हुआ
नरक में जीव दुःख से रो रो कर पुकारते हैं बचाओ कोई हमको बचाओ
हमारी इन नाना प्रकारके कष्टोंसे रक्षा करो कोई तो सहायक बनो, कोई
सहायता तो करो शरण शरण हमारी रक्षा करो कोई तो हमें तारो हम अनाथ हैं
व शरण हैं हमको तो कोई शरण देवो ऐसा विलाप करते हैं तो कोई भी शरण
न होता ना चक्रवर्ती होता ना वो राजा होता जिसने वो दो सौ बाण मारे थे वो
भी सब ही नरक गये सो सब ही कष्ट सहते हैं नरक में सब ही रोते हैं
नरक विषय सुखों न रहा! विचार करो नरक में शरण न राजा ना चक्रवर्ती
अकेला नरक में जीव अकेला ही होता सब अकेला सहाय ना कोई ना ही
सगा सम्बन्धी ना राजा ना ही चक्र होता है॥
धर्म केवल शरण जीवका ऐसा जान कर सब जीवों को जो धर्मका ही फल
जीव समझता सो धर्म ही, वो ही शरण सर्व जीवों? सो नरक की शरण कौन सी
है, वो तो धर्म शरण वो नरक से उद्धार करने वाला जीव होगा?
जो जीव सर्व व जीवों को सब प्रकार शरण देता वो संसार में सार है,
संसार के चक्रसे वो सब को सार न पावे, सो संसार शरण विहीन, वो नर व
जीव अनाथ शरणहीन ही रहा जिसका आधार धर्म ही केवल रहा, ऐसा
उपदेशक सारथी ही शरण ही धर्म कहा, सब जीवों को शरण देता
सब उपकारी काम ही करता है, नरक सब जीव जाते सब उपकारी
काम ना ही करता ना करता ही रहा, ऐसा जीव सब सब नरक जाते ही नरक
का फल सब किसी जीवको फल तो होता ही नरक कर्मसे उपदेश सर्वार्थ साधन
ही मुक्ति का साधन ही समझना ऐसा उपदेश का कथन
235

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236

कथा सुन करके सब लोग आश्चर्यमग्न हुये कि कैसा मन्त्र, जो यह कामदेवस्वरूपी शुकदेव को
मोहित करे।
इसके पीछे सब ऋषिगणों तथा शुकदेवाचार्य आदि सब लोग व्यास जीके पीछे हो लिये।
व्यास जीके आश्रम के निकट एक कुण्ड था, उसमें स्त्रियां नग्न होके नहाती थीं, व्यास जी
वृद्धवस्था युक्त जब वहां गये तब तो उनने वस्त्र पहिन लिये, जब शुक जी वहां पहुंचे जिनकी
सोलह वर्षकी पूरी अवस्था नथी, उनकी सुन्दर मनोहर मूर्ति देखकर किसी स्त्रीने अपने अङ्गों
ऊपर वस्त्रों को नहीं डाला।
शुकदेवजी महाराज तो सब जीवोंमें समाये, सब का प्राण अपना समझ कर शुकदेवजी
स्त्रियों के अङ्गोंको देखकर नहर्षित हुये नप्रसन्न हुये। शुकदेवजी निष्काम थे। शुकदेवजी महाराज
जबआगे चलेगये, स्त्रियां, जब शुकदेव को देखकर दो घड़ी न बोलीं, व्यास जी जब आये
स्त्रियों से दो बात पूछने लगे, तब तो स्त्रियोंने हाथ जोड़ कर, व्यास जीसे विनती की
किहे नाथ तुम तो नर और नारायण रूप सब कुछ जान रहे हो, जो बात तुम पूछते हो सब
मिथ्या
बात कह रहे हो। व्यास जीके आगे स्त्रियोंने हाथ जोड़ कर कहा किहे नाथ आप तो सूक्ष्म
दृष्टि रखते हो। व्यास जी शुक जीके पीछे दौड़ते २गये, व्यास शुकजी को पुकारते हैं। व्यास
पुकारते हैं, हे पुत्र शुकदेव! व्यास जीका शुकदेवजी को पुकारना सुन कर सब जड़ चेतन
व्यास जीसे कह रहे हैं, जो तू शुकदेव को बुलाता है सो शुकदेव तो सर्वत्र भरा हुआ
व्याप रहा है। हे व्यास जी! यह जीव जो माया करके सब ओर भ्रमता है, मायाके छूटने
करके यह, जीव अपने रूप को प्राप्त होवे तब सब कुछ आपही रूप हो, उसकी
कोई संज्ञा नहीं है॥
व्यास जीसे कौन कहे? किस जीवका यह पुत्र वा किसका पिता है, सो तू हे व्यास
जी! तू तो हे सर्वज्ञ सबही कुछ जान रहाहै किस निमित्त रोताहै? उस वन के वृक्ष और
लतादिकों करके यह जो शब्द शुक जीका सब बनमें सुनाया शुकजी को यह सब जीवों
का रूप जान कर व्यास जी बड़े प्रसन्न हुये, शुक जी जब सब जीवोंके जीवोंमें व्याप रहे
तो उनको सब जीव अपना समझ करप्यार करते हैं, व्यास जी शुकजी रूप सर्व जीवों
कीमहिमा जान कर बड़े आनन्द को भये, जो मनुष्य सब जीवों आत्माके सम समझ
करके, किसी जीवका अपराध नहीं करते सो निश्चय कर सबों प्यारे लगते हैं॥
सो शुक जीकी महिमा को देख व्यासजी अपने मन में विचारने लगे कि इस शुक जीको
भागवत कथा श्रवण कराऊं। सो व्यास जी अपने शिष्योंको बुलाकरके भागवत के श्लोक
सिखाने लगे। शिष्यों से कहा कि तुम यह श्लोक वन में जाकर के कहो, जब व्यास जीके कहने
से शिष्य वन में जाकर श्लोक कहने लगे तब श्लोकों के शब्दों को सुनकर शुकजी बड़े प्रसन्न
हुये, शुकदेव जी शिष्यों से पूछने लगे कि यह श्लोक किस के हैं॥
सो श्लोक यह है कि श्रीकृष्ण चन्द्र अपने शरीरके ऊपर पीताम्बर और मोर पंखका
मुकुट शीशपर धरके, अधरों पर बंशी धर सब ग्वाल बालकोंके
सहित औ वन फलमाला गलेमें पहिरे वन की शोभा बढ़ाते हुये, सब गोपियों सहित
सुख दे रहे हैं, सो शुकदेवजी इस श्लोक को सुनकर शुकजीने, शिष्यों से पूछा
कि यह श्लोक किस का है। शिष्यों ने शुकदेवजी को व्यास जीका नाम सुनाया, सो शुक
जी शिष्यके मुखसे सुनकर बड़े प्रसन्न हुये, तब शिष्योंके मुखसे श्लोक सुन शुकजी
न आये तब व्यासजीने दूसरा श्लोक अपने शिष्यों को पढ़ने को दिया, सो श्लोक यह है कि
पूतना राक्षसी विष-भरे स्तनों पान करा कर, मारने के लिये आई तो श्रीकृष्ण जी
नेउसको ? मार कर परमगति दीनी! सो ऐसे दयाके समुद्र श्रीकृष्ण जीके ऊपर कौन न प्रीति
करेगा? शुकजी इस श्लोक श्रवण करके वन से आये॥
व्यास जी का मुख देखकर श्लोकों का अर्थ पूछने लगे कि व्यास जी इस श्लोक का अर्थ
कहो तब तो व्यास जीने शुकदेव जीसे कहा कि हे पुत्र! व्यासजी, शुकदेवजी दोनों
परस्पर मिल गये। भागवतकथाका पठन पाठन शुक जी व्यास जीसे करने लगे। जब व्यास जी
शुकदेव जीको भागवत का ज्ञान करा चुके तब शुकजी बोले कि हे व्यास जी! अब सब
कथाका विचार हो चुका, अब आज्ञा दो! शुकजी कथा सुन करके वनमें चले गये। व्यास जी
परमार्थ विचार कर संसारके सब प्रपंचसे विरक्त हो गये॥
इसके पीछे शुकदेवजी का मन तो सब जीवोंमें समा रहा था, जो जीव
व्याकुल होवे उसको सुखी करने का उपाय करते थे, किसीके घर पर, याचनाके निमित्त,
जितना समय गौके दुहने काहोता है, उस काल से अधिक नहीं ठहरतेथे।
शुक जी एकांत निष्काम नाम जपते हुये विचरते हुये सब जीवों को एक जान निष्काम
रूप हो मन मन्दिरमें वास किये हुये भगवन्त का भजन करते॥

जब हम यह जान गये और मान भी, तो यह प्रश्न उठता है, बिना जाने भी क्या काम
चला सकता है? तो उत्तर यह ही हो सकता है? नहीं! जब तक आप किसी वस्तु को
पूरी तरह से, या यथार्थ रूप से नहीं जान लेते तब तक उस वस्तु से आप अपना
अभीष्ट या प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकते। तो फिर हे मानव, तूने यह जीवन, जो
संसार के इतिहास का आज तक का सब से बड़ा वरदान मनुष्य को मिला है? तो क्या
परमात्मा से कभी पूछा-जाना?
अपने ही मन से कभी भी तो पूछा होता कभी, अपने भीतर झांक कर तो
देखा होता कभी निष्पक्ष होकर, कि जो कुछ मैंने अभी तक किया या कर रहा हूँ
क्या वही सब कुछ है? क्या इसी के लिए मैं इस जगत में आया था कि खूब
खाया पीया और सो गया और...? जिसे तुम यश, मान और धन कहते हो क्या
कभी सोचा इन सब से, किसी तरह अपने वास्तविक या आध्यात्मिक को जोड़ा है? या
फिर सब कुछ व्यर्थ नष्ट किया जा रहा है? यथार्थ ज्ञान न होने से मनुष्य सदा से ही भ्रमों
और वहमों-वश सब कुछ विपरीत ही समझता आ रहा है, जिसे हम अपना समझ कर
जीवन-भर के लिए अपना मान कर बैठे हैं? क्या यथार्थ में वह अपना है? जरा सोचो तो, जिस
शरीर को, अपना समझ कर श्रृंगारते रहते हो क्या कभी सोचा, अन्त समय
इसका क्या होगा? सम्भवतः चिन्ताग्रस्त ही जीवन समाप्त होगा?
तो हे जन सुनो, आज के भयानक जीवन से यदि बचना चाहते हो तो
भगवान् की शरण लो। सब कुछ उनके हाथ सौंप कर निश्चिन्त रहो, ईश्वर की, ज्ञान-
गंगा में, ज्ञान में, भक्तियोग में, कर्म-योग में, राजयोग में, ध्यान-योग
द्वारा स्नान करो, संन्यासी, त्यागी, बन कर, इस भव से तर जाओ, परमात्मा के
नाम की महिमा जानते भी हो या नहीं? जो परमात्मा सब जीवों का जनक
सब का कल्याण करने वाला है, उसके सामने सब लोग एक जैसे हैं। सब ही
उस भगवान् के अंश हैं, अतः आपस में लड़ाई और नफ़रत को छोड़ कर प्रेम का
भाव पैदा करो, मानवता क्या संदेश देती है? सब जीवों पर दया करो, जो
कुछ दिया है उस प्रभु का दिया हुआ समझ कर प्रभु चरणों में सब कुछ अर्पण, सदा
प्रभु स्मरण का ध्यान रखते ही सब कार्य पूरा करो, फिर देखो मुक्ति है?
हे मानव तू जो भगवान् को भूल कर दिन-रात संसार के मोह-माया में लिप्त
रहेगा, तो यह समय समाप्त हो ही तो जाएगा ही सो क्या कभी सोचा इस बात
को फिर यह भवसागर से पार कैसे होगा? अतः भगवान् की
भक्ति कर शरण में आ जाओ तब सब तरह का भय मिट जाएगा।
परमात्मा की शरण में आने के बाद ही जीव निर्भय हो सकता है। क्योंकि जिस
परमात्मा ने संसार को रचा उस परमात्मा से परे कोई शक्ति नहीं हो सकती,
इसलिए संसार रूपी इस माया-मोह वाले भव-सागर से केवल प्रभु ही पार
कर सकते हैं।
सब कुछ परमात्मा का ही दिया, भगवान् ही हमें सबल बनाकर सब कार्य पूर्ण करा
रहे हैं ऐसा ध्यान में सदा रहे, सब का कल्याण चाहो। क्या तू ही सब कुछ है?
जो करेगा परमात्मा ही तो कर रहा है सब, फिर तू क्यों अहंकार
करता है? तू तो उस प्रभु का बनाया हुआ खिलौना मात्र, जो सब परमात्मा की
इच्छा पर है?
हे मानव ... आज ही चेत जा, नहीं तो कल पछताना पड़ेगा। इस
तरह समय, आयु सब समाप्त हो जाएगा और फिर नरक भोगना पड़ेगा।
इस लिए तू अपनी समस्त वासनाएं त्याग कर प्रभु का नाम स्मरण कर मुक्ति
पद को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त कर। परमात्मा ही तो केवल एक शक्ति
तथा परम पिता परमात्मा रूप से ही सृष्टि की रचना करता और चलाता
फिर उसी में सब को समाना ही सर्वशक्तिमान् है, विचारशील तू
भी उस रब के भय से डर और अपने मन को शुद्ध कर जो प्रभु के आदेश हैं
उसका ही तू अनुकरण, जिस प्रकार पिता अपनी सन्तान से प्रेम करता
है उस तरह से, भगवान् भी सन्तान के समान ही भक्तजनों को प्यार
कर अपने गले से लगा लेता अथवा गोद में बिठा कर आनन्दमय बना
देता और अमर बना कर सब तरह से मुक्त कर देता है, बस एक शर्त भक्ति
की; तू भी भगवान् रूपी उस अमृत रस को पी कर सब से प्रेममय बन
कर प्रभु के गुणगान में लग जा।
मन एकाग्रता से ही बन सके, जो सदा सत्य पथ पर चलते निर्भय बन
दूसरों हित सदा लगा रहता है। प्रभु के आगे सब बराबर एक समान ही रहते
238

त्रिकालज्ञ भगवान् सर्वज्ञ को यह प्रत्यक्ष ज्ञात होता रहता कि भरतक्षेत्र का अमुक जीव अमुक
नामावाला या अमुक जीव का जीव अमुक पर्याय को छोड़ अमुक पर्याय को प्राप्त होने वाला आगामी तीर्थंकर,
प्रत्येक बुद्ध अथवा चक्रेश होने वाला है। इस प्रकार जो जीव जिस पर्याय को प्राप्त होने वाला है, उस जीव
तथा उस पर्याय सम्बन्धी जानकारी को जो ज्ञान जानता या कर सकता, सो उस सर्वज्ञ विशेष का ज्ञान है, सर्वज्ञ
विशेष का ज्ञान सर्व सामान्य ज्ञानस्वरूप आत्मा को ही जानता है, सो मानना नितान्त मिथ्या ही जानना, जो
कि सब को भली भांति समझ में आवेगा।
इस कथन का यह भी सार समझना योग्य है कि भव्य जीव, मिथ्या दृष्टि; इन दोनों का जैसा
स्वरूप जिनागमों में कहा सो सर्व को सम्यक्त्व लाभ का कारण हो सकता है। अन्यथा इन दोनोंस्वरूपों
सम्बन्धी जिनागम का कथन ही सब व्यर्थ हो जावे, सो तो जैन मत रूपी सत्य धर्म का कभी भी नहीं हो
सके अतः जिनागम का प्रमाण--वचन प्रमाण!
इस व्याख्यान का विचारवानोंको यत्न से मन लगाकरविचारनाचाहिये कि इस में शंका योग्य कोई
बात नहीं दिखती सो प्रथम कथन का जो अभिप्राय कहा सो ठीक समझ पड़ा? अथवा ऐसा कथन भी
जिनागमों विरूद्ध समझ पड़ा अथवा ज्ञान स्वरूप का स्वरूप इस कथन द्वारा कुछ भी निश्चय हो सका
कि नहीं ऐसा निश्चय मन द्वारा करो।
अथवा जो कथन जिनागमों का इन दोनों शब्द द्वारा कहा गया सो ठीक? या मिथ्या स्वरूप
भी इस कथन का माना जावेगा? सो भी विचारवान् पुरुष जिनागम मन्त्र को यथार्थ भाव से समझ
जिनागम को सत्य जानकर जिनागमों का जो कथन सो सब ही सर्वज्ञकथित ही हो सकता
अतः, सर्वज्ञकथित होने, सो मिथ्या हो सकेगा? इस बात को विचारवान् ही यत्न द्वारा समझ
कि जिनागमों का कथन मिथ्या, या इस कथन रूप? ऐसा जो मन में मान कर इन दो
शब्दों का जो जिनागम का मत है, सो तो सर्व जिनागम मत का त्याग ही करना है,
इस प्रकार जो जैन सम्बन्धी सब मत रूपी ज्ञान स्वरूप को समझ कर ही मन द्वारा निश्चय कर
इन दो शब्दों का यथार्थ भाव समझ में आवे?
सर्वज्ञ ज्ञान सर्वव्यापकता को लिये हुए--इस सर्वव्यापकता ज्ञानस्वरूपका
विचार जब आत्मस्वरूपों को ही इन दोनों शब्दों द्वारा निश्चयकरेगा, सो ही समझ में
सर्वज्ञ स्वरूप का भी लाभ हो सके, सो उस जन द्वारा दोनों शब्द रूप इन दो
अर्थ ज्ञान रूप लाभ प्राप्त हो सके।
ऐसा ज्ञान सर्वज्ञस्वरूप को समझाने का सर्वज्ञता स्वरूप का मुख्य ज्ञानस्वरूप ही
इन दोनोंशब्दों द्वारा ही समझ में सर्वज्ञता को ही कथन कर सर्वज्ञता सम्बन्धी
हो सके!
अतः विचारवान् पुरुषों को सर्व इन दोस्वरूपों का लाभ प्राप्त समझना ही
चाहिये इस बात को यत्न समझकर जिनागम सम्बन्धी सर्व ज्ञान लाभ प्राप्त करना ही
कर्त्तव्य है। ज्ञान लाभ सम्बन्धी जो विचार सब पुरुषों द्वारा किया जाता सो तो
जिनागम का कथन समझ कर ही किया जाना चाहिये सो उस जिनागम रूप ज्ञान द्वारा,
सब जीवों को ज्ञान स्वरूप लाभ का यत्न करना योग्य व उचित।
इन दोनों शब्द का जैसा जैसा स्वरूप इन दो शब्दों द्वारा कहा गया सो तो
सर्व जगत पूज्य भगवान् सर्वज्ञ द्वारा ही स्वरूप कहा गया समझ, सो सच्चा यथार्थ
कहा गया इन दो स्वरूपों को समझ कर सर्व जन को सुख लाभ ही उत्पन्न
होगा।
भव्य जीव का स्वरूप या मिथ्या का स्वरूप
जब सर्व जन सर्वज्ञ के द्वारा समझकर
उस को यत्न से मन द्वारा मन में लेवे, तो उस के मन का भ्रम, जो इन
दोस्वरूपों ज्ञान या सर्व-ज्ञान रूप में उत्पन्न हो रहा था।
सो सब मिटकर, सत्य ज्ञान व सर्वज्ञ स्वरूप ज्ञान उस को प्राप्त हो? अथवा इन
दोनों का यथार्थ स्वरूप नहीं? अथवा ज्ञान स्वरूप का लाभ हो? ज्ञान सर्वज्ञता का
होगा? अथवा भव्य जीव का ज्ञान स्वरूप मन को सम्यक्त्व का लाभ दे सके
कि इस प्रकार निश्चय कर यत्न करना चाहिये, ज्ञान द्वारा ही जो अज्ञानता का क्षय
करना योग्य माना सो अज्ञानता स्वरूप इन दो शब्द द्वारा सर्व-भ्रम का क्षय रूप जानना
सो, इन सब बातों विचार से सर्व मन को लाभ प्राप्त हो सर्वज्ञता स्वरूप ज्ञान सब
को इस प्रकार प्राप्त हो सो जिनागम स्वरूप समझना योग्य है, सो प्रत्येक जन को ऐसा
ज्ञान लाभ प्राप्त करनेको सब जिनागम मत का विचार करना उचित।
ऊपर के लिखे का मन में सब प्रकार से जो जन मन को लगा कर जो विचार
करे सो भव्य, सो सर्व का सार रूप हो जावे, सो सब अज्ञानता रूप जो सन्-देह
रूप था मिटकर सब लाभ प्राप्तहो।
239

अन्वेष-कर्ता तब घर लौट कर दो बरस तक अन्वेष-कर्ता रूप से विशुद्ध संन्यासी
रहा। वह अन्वेष-कर्ता रूप को तो केवल अभ्यास समझता रहा पर उसके माता पिता को लगा
कि यह सन्यास का स्वांग है, जो गृहस्थावस्था को सुधारनेके लिये ही रचा गया है। इस
पर भी उन्होंने उस वक्त विवाह का कोई यत्न नहिं किया क्यों कि उन्होंने देखा, कि इस
निरंकुश स्वाधीन
संन्यासी का चित्त तो उस तपोवन एकांत वन की ओर लगा ही हुआ था, जहां
उस को ज्ञान गुरु की संगति में विरति का आनन्द-रस मिल चुका था। कभी न कभी अवसर
पाकर वह फिर जा कर तपोवन बसेगा, इस से तो वह कभी इनकार नहीं करता था।
सम्बन्धी बालविवाह के षड्यन्त्र की ताक में थे।
परिवार वाले अब तक उस ब्रह्मचारी का विवाह रचानेका साहस इसलिए नहीं
कि बात ही विवाह की नहीं उठी। बालविवाह का समय गया जानकर अब दूसरा
सम्बन्ध हो सकना तो संभव था, लेकिन, सम्बन्धी लोग तो अवसर की ताक में रहकर
सम्बन्ध करने की बात को नहिं चला सकते थे, विवाह का अवसर ही कहां
था विवाह तो दूर।
अन्वेष कर्ता कह चुका था कि विवाह करूंगा तो दो ही दशा में। पहिले तो
असाध्य, ना, कभी... ना होने वाली। विद्याध्ययन करके ऐसा विद्वान बनूं जैसा संसार में
दूसरा कोई न हो। दूसरे जब साक्षात्कारी होकर संसारके लिये जगदाचार्य बनूं, तो जगत्-
गुरु का पद ले कर गृहस्थधर्म का निर्वाह करूं। जब इस बात की चर्चा उठी
कि यह कभी नहीं हो सकता, तो उस ने कहा कि अगर दूसरी बात कभी न हो
तो विवाह करने का विचार ही न लाया जाए।
सच्चे जीवन का पथ-अन्वेषक--यह तो केवल एक ही बात चाहता था कि
विद्या का गुरु मिल जाए जो ऐसा विद्वान हो जैसा संसार में अद्वितीय कोई
हो, या ऐसा महात्मा मिल जाए जो उस को, उस का साक्षात् करा के--सत्य का साक्षात्
करा कर निज रूप का दर्शक बना कर सच्चा संन्यासी बना सके। माता पिता
तथा सम्बन्धी तो इस बात को समझ ही न... ॥
सम्बन्धी तो केवल यही कह कर सन्तोष कर रहे थे। 'विवाह होगा तो
संसार ही में तो होगा।' संन्यासी भी तो इसी संसार में था। दोनों परस्पर विरोधी
बातों का परिणाम यह हुआ कि--अन्वेषक--का घर छूटा और ऐसा छूटा कि
घर ही छूटा वह फिर कभी लौट कर न आया।
उस संन्यासी की आयु इक्कीस वर्ष की थी, जिस में गृहस्थ में जाने के
लिये सम्बन्धी तो क्या उस का अपना ही मन क्या प्रस्तुत नहीं था? इस लिये
संन्यासी का भी, 'उसी का यत्न कर रहा हूं' कहना क्या विवाह की तैयारी
होने के संशय को पूरी शक्ति प्रदान करने के लिये बहुत नहीं था?
परिवार सम्बन्धी लोग उस को विवाह कराने का झांसा दे रहे थे,
तो, वह भी विवाह सम्बन्धी झांसा ही दे रहा था। इस का यह अभिप्राय
तो नहीं निकाला जा सकता कि विवाह करने की इच्छा उस के मन में कभी थी।
वह तो इस से सदा बचता ही रहा। पिता, माता तथा सम्बन्धी
उस का विवाह करा कर उसे बन्धन में बांधना चाहते थे, इस से अपने मन की
सच्चाई को उस अन्वेषक सत्य ने छिपाया नहीं, उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया
कि 'विवाह करूंगा विद्याध्ययन के समाप्त होने पर या सत्य का साक्षात् होने पर।'
उस के इस कथन का जो अर्थ उन्होंने लगाया, वह उन का दोष था।
इस प्रकार अन्वेष-कर्ता का घर को छोड़कर संन्यास ग्रहण करने
सम्बन्धी जो बात कही गई उस से सत्यार्थ प्रकाश-वाला संन्यासी जीवन सम्बन्धी
सच्चा, प्रमाण तो मिलता।
संसार कह चुका था कि यह विवाह करेगा। घर में भी कहा जा चुका
था। विद्याध्ययन के पश्चात् करेगा, पर सत्य प्राप्ति के पश्चात्--इस
का साक्षात् करने के पश्चात् तो वह सन्यासी बन गया, इस लिये संन्यास
का सत्य रूप बन गया। इस संन्यास ने संसार को, जो विवाह का झूठा
सत्य प्रचारित कर रहा था, उस का यह उत्तर, कि विवाह तो करूंगा,
जब मैं साक्षात्कारी बन जाऊं, तब संसार को विवश होकर स्वीकार करना
पड़ा।
240

समाज का वर्तमान रूप चाहे जो भी हो, पर इसमें परिवर्तन आ--
सकताहै। इसके दो उपाय सर्वथा संभव दिखाई देते
पहला तो यही जन-बल जाग उठे, पर सरकार तो इस जागरण का सिर ही
तोड़ डालने के लिए सदा कटिबद्ध ही रही है। और यदि जन बल सिर न उठा सके तो
कोई ऐसा महा पुरुष या दल या संस्था हो, जो कि वर्तमान शासन के स्थान पर ऐसा जन-
तंत्र बना, देसके! जो न्याय के आधारपर संगठित हो जिसमें हर एक व्यक्ति की ही
रक्षा नहीं वरन्, हर एक के तन का ही सुख न हो वरन्, जन-बल के जागरण
द्वारा ही सब काम हों। इसे चाहें तो समाज वा समाज
का नया संगठन कहसकते हैं, क्योंकि इस परिवर्तनशीलता में नया
जीवन विकसित हो, इसका पता परिवर्तनशीलता खुद देगी
कुछ लोग मत या धर्म के द्वारा इस काम को पूरा करना, तो असम्भव ही नहीं
वरन् हर प्रकारसे हानिकारक ही नहीं वरन् समय को व्यर्थ खोना भी समझते
हैं, वे भी इस बातपर सहमत हो रहे हैं, कि वर्तमान समाज व्यवस्था
केवल आर्थिक आधार पर ही टिक सकती है; वर्तमान युग में
हर एक व्यक्ति को हर तरहसे उपयोगी व सुखी बनाने की राह केवल यही है। यदि
समाज को ही ले, तो समाजमें हर प्रकार का काम हर मनुष्य करे। मनुष्य
के श्रम का मोल न हो वरन् यह बात हो, प्रत्येक को, आवश्यकता के, अनुसार मिले, तथा
सब, हर एक काम को अपना ही काम समझकर काम करने में सुखका अनुभव करें।
हर बात पर हर एक का हक हो; सब की बात पर सब का अधिकार हो;
मत या विचार का आधार न धर्मपर ही हो न वर्तमान ढर्रे पर ही वरन् उस स्वतंत्र
बुद्धिपर आधारित हो जो कि हर मनुष्यको दूसरे के प्रति निष्ठावान बना कर
सब काम करने की क्षमता और स्वतंत्रता प्रदान करती है।
समाज में आज तक यही होता आया है समाजमें किसी न किसी तरह का
मतभेद पैदा करने की चेष्टा की गई। कभी रूपका आधार लेकर व रंगका आधार
ले कर ऊँच नीच तथा छोटा बड़ा भाव पैदा किया गया, कभी धर्म का आधार ले कर
नया झगड़ा खड़ा नहीं किया गया? साधारण जनके ही हित का ढोंग रचकर उनके
स्वत्वों का कब हनन नहींकियागया? समाज आज तक जैसा बना हुआ था, वास्तवमें
वैसा न होकर स्वतंत्र रूपमें आज तक मनुष्य को न पहचानसका क्योंकि मनुष्य
सब एक, सब समान पैदा हुए हैं, इस बात को मनुष्य कभी जान ही नहींसका।
समाज सदा ऐसा ही रहा है। समाजके किसी अंगको यदि कोई आघात पहुंचाता
रहा हैतो संपूर्ण समाज व्यथित हो, इसका नाम समाज है, यही समाज
का एक रूप हो सकता है। यह रूप बन सके इसके लिए सबसे पहले
वर्तमान समाजको नष्ट करना होगा, जो कि सब का सब सड़ा हुआ है। इस
व्यवस्था, का संहारकही नया जीवन, प्रदान कर सकता है। इस समाज को नष्ट
कर, ही हर प्रकारके रोग दूर होसकते हैं। पर यह सब, जो कि सब कुछ
समझने के कारण समाज सुधारक कहलाने का दम तो भरते हैं। पर किसी
तरह भी समाजको इस सड़े हुए ढांचेको बदलने का जरा भी यत्न नहीं करते।
केवल व्यवस्था बदलना कोई बात नहीं, यह काम तो नया जीवन चाहते ही
स्वयंमेव पूरा हो जाय इसमें दो राय नहीं होसकती। इसलिए वर्तमान समाज
रचना केवल शोषण प्रधान, मानव विरोधी भावना मात्रपर ही टिकती,
नजर आ रही
किसी बातमें कोई न, नया जीवन लाने का नया रास्ता निकलता न
देख, विभिन्न विचारकों अथवा मत वादी प्रचारकों द्वारा जो विचार पेश
किये जाते, उनसे समाज सुधार की आशा करना व्यर्थ जान पड़ता है। समाज
व्यवस्था स्वतः नष्ट हो कर नया रूप धारण कर सकेगी या नहीं यह भविष्य के
गर्तमें पड़ा हुआ ऐसा प्रश्न होगा, जिस पर हर एक विचार करने को बाध्य होना
पड़ेगा। पर यह बात अवश्य विचार करने की योग्य है, कि समय के साथ जो
परिवर्तन आताहै उसका रूप क्या हो सकता है। इसपर विचार करने की आज
बहुत ही आवश्यकता मालूम हो रही... !
आज तक जो मत या विचार इस बात--विशेष का हल न कर सके
समाजके हित--अहित के आधारपर उनका संगठन किया गया न जा कर के रूप में न
होकर रह जाता है, तो सब व्यर्थ... ।

241

राजा को यह डर हुआ मन्त्रणा न प्रकट हो, इसलिये विश्वामित्रजी का समाधान
किया कि फिर आवे, ऐसा ही हम यत्न कर लें, सब को साथ लेजाना उचित न
हो सम्मति का काम था।
राजा का मन वसिष्ठादिक सब से भर गया, ऐसा जान पड़ा धोखा खाया!
राजा ऐसा कहे, फिर सोच-विचार के यह बात कही महाराज क्रोध मत
करो तब तो राजा स्वरूप स्थिति विचार हुआ
पर रूप तो ज्ञान मय ब्रह्म स्वरूप सब है, पर जो बात जीव रूपी जीव
समझ कर कहें तब जीव ही से सम्बन्ध हो तब स्वरूप प्रकाश कैसे हो! जो रूप
की बात सो रूप स्वरूप विकार किस को? पर रूप ही में बात हुई ब्रह्म
को विकार क्या, पर जो बात रूप विकार कहा जाता है सो ब्रह्म स्वरूप में
कुछ बना, या रूप नाम-रूप ही विकार नाम ठहरा, विकार तो था,
स्वरूप में विकार का अभाव तो सब उपाधि से परे जान ले तब ही यह
स्वरूप जान ले तब सब से छूटे कहा।
राजा ऐसा कहे, तुम सब हो, राजा के कहने से जो यत्न कर लें, तब जो
बात सम्पूर्ण प्रकाश में आवेगी सो जान लेवे
सो ज्ञान जीव-भाव का था, राजा ने मन को वसिष्ठादिक में सब
प्रकार दिया था, सो छूटा, विचार न भया! जो ज्ञान से सब से भर ले सो
ज्ञान स्वरूप में स्थिर होता, पर अविद्या था
निश्चय जो रूप समन्दर का किया भया, सो रूप जीव ही से विकार
का जाना गया तब विकार रूप स्वरूप तो न भया पर जीव-भाव जान कर के
सो विकार रूप को ज्ञान अविद्या हुआ सो क्या? पर जो ज्ञान विकार
स्वरूप में ज्ञान रूप सो अविद्यादिक विकार से परे कर के ज्ञान
स्वरूप में स्थिर हो तब तो जीव रूप छूटे कहा
सब ही ज्ञान रूप--तो जो जीव रूप--उस बात से, सो सब ज्ञान रूप
से ज्ञान स्वरूप न भया तो सब माया के वश में सब ज्ञान स्वरूप न प्रकाश हो
उस माया को ज्ञान से परे जान माया न जान-विचार हो, न जान-भाव हो, सब
रूप एक ही सा जान ज्ञान रूप हो सब ज्ञान स्वरूप प्रकाश का रूप हो, सब
माया से परे हो ज्ञान प्रकाश
सो क्या प्रकाश? जो ज्ञान रूप से सब को स्वरूप ब्रह्म रूप में जान लेवे
निश्चय हो स्वरूप सो सब एक सा, सो माया स्वरूप को जान ले तो स्वरूप
स्वरूप रूप से अलग रहेगा, जो सब ज्ञान से ज्ञान को जान ले तब, सो सब
स्वरूप क्या? पर स्वरूप तो सब ज्ञान स्वरूप रूप से भिन्न है, जो स्वरूप
स्थिर रूप स्थिति में स्थिर हो सो ज्ञान रूप
सो सब कुछ मन के आधार पर है--सो तो सब वसिष्ठादि विकार है,
पर सब वसिष्ठादि ज्ञान के--विचार से सब स्वरूप सब से अलग हो के
ज्ञान रूप में हो कर स्वरूप स्थिति विचार किया
सो स्वरूप सब मन से अलग कहा, पर जो जो भी वसिष्ठादि
प्रकार सब माया रूप उपाधि सब को देख कर जो जो भी ज्ञान
स्वरूप विकार रूप से स्वरूप में भिन्न है, ज्ञान स्वरूप सब स्वरूप
स्वरूप अज्ञान से परे ज्ञान रूप से स्वरूप स्वरूप स्वरूप
ज्ञान का ही रूप सब रूप में रूप भया, सो अविद्या रूप
अविद्यादि सब सब सब ज्ञान से ही सब से परे भया, जो सब ज्ञान
रूप भया सो सो सब ज्ञान से ही परे हो कर न जान रूप, सो ज्ञान
का रूप था
सब कुछ सब ज्ञान से परे हो जाता है, जब सब से अविद्या ज्ञान
रूप तब सब उपाधि से परे ज्ञान-रूप भया, तब तो स्वरूप का ज्ञान रूप हो
सो, तब सब अविद्या! सब से अलग हो; जब ज्ञान को स्वरूप कहा तब, सो
अविद्या ज्ञान का रूप कहा जा सके, पर अविद्या ज्ञान सब
सब ज्ञान से अलग रूप कहा, सो अविद्या रूप ज्ञान अविद्या स्वरूप से
परे रूप ज्ञान रूप सब ज्ञान का स्वरूप सो अविद्या रूप से अलग
सो ज्ञान के स्वरूप प्रकार से अज्ञान से ज्ञान से परे था
स्वरूप का प्रकार स्वरूप सब का ज्ञान रूप भया सो
रूप में ही, तब सब अविद्या! सब ज्ञान स्वरूप स्वरूप सब ज्ञान
242

विश्लेषण का प्रयास कर रहे समस्त दार्शनिकों की जीवनव्यापी मानसिक या चेतना विषयक चेष्टा
का सारभूत निष्कर्ष।
पर बात तो तब बिगड़ती दी--जब इस अनिर्वचनीयता को--मन बुद्धि रूप दो चार
मात्र तत्त्वों तक ही, या यों कह लें मानव मन या चेतनामात्र सिर्फ तक, ही या यों कहें सिर्फ
व्यक्तिगत मानवमात्र के मन चेतना तक ही या यों कहे सिर्फ बुद्धि तक सीमित कर दिया
जाता या मन बुद्धि मात्र तक उसे रखकर आत्मवान् पुरुषार्थ चेष्टा चेतना का जो तत्त्वबोध कराया
था, उस पर तो पर्दादोष सिर्फ अज्ञानता का आरोपित कर ही अध्यात्मवाद को सिर्फ
बुद्धिमात्र पर ही निर्भर अथवा चेतना या मनोभाव मात्र समझ लिया जाता या अध्यात्म
विचारधारा को सिर्फ चेष्टा मात्र से जोड़ कर देखा जाता, पर ऐसा कहीं नहीं था,
बल्कि उन्होंने चेष्टा का साक्षात्कार चेतना के मूल रूप से किया और चेष्टा के
मूल भाव स्वरूप, या मनोभावों रूप मूल भावों से जो चेतना का रूप था या मूल
चेतनान्तर्गत जो समस्त चेष्टा, या मूल भाव से चेष्टा, या मूल चेष्टा रूप भाव
चेतनान्तर्गत जो समस्त चेतना थी उसकी या विधाता के मूल द्वन्द्व--अद्वन्द्व चेतना रूप
भाव, जिस से सर्व सृष्टि का रूप, जिस से समस्त जग का रूप, जिस से समस्त
जग की, जिस से समस्त जग के, जिस से जग जीवों मात्र तथा इस जग नियन्ता
चेतना का रूप था उस, के ही साथ जोड़ कर इस जीवन चेष्टा को मूल चेतना
रूप साक्षात्कार से ही जोड़ा था और उस दैव रूप परम साक्षात्कार चेष्टा चेष्टा स्वरूप
दिव्य चेष्टा स्वरूप न हो करके सिर्फ मन चेष्टा, सिर्फ बुद्धिमात्र
उस चेष्टा को चेष्टा ही समझ कर उस मन अथवा बुद्धिगत समस्त चेष्टा को
चेष्टा ही मान चेष्टा-कर्म में? ऐसी दार्शनिक चेतना द्वारा स्पष्ट कर दिया था,
जिससे चेष्टा के मूल का ज्ञान हो सके या, दार्शनिक व्याख्या के अन्तर्गत
सिर्फ चेष्टा कर्ममात्र सिर्फ दार्शनिक विचारणा सीमित, व्यक्तिगत विचार,
व्यक्तिगत चेष्टा ही सीमित तक होकर रह गई दार्शनिक रूप बन कर न
व्यक्तिगत विचारणा तक उस रूप में न केवल सीमित हो जाय या, वो मानव को
व्यक्तिगत ही रूप का दर्शन कराकर मानव चेतना को न सिर्फ सीमित
करके सीमित कर दे बल्कि चेष्टा रूप को, जिस रूप चेष्टा का विधाता
स्वरूप उस चेष्टा रूप जग रूप में सब जगह सब काल में दिखाई दे रहा अथवा हो
सकता प्रकृतिगत चेष्टा अथवा चेष्टा के ही साथ सदा सदा एकत्व रूप लिए हुए
भाव से चेष्टा का नित्य सम्बन्ध सम्बन्धित हो कर रूप लिए हुए दृश्य रूप में समस्त
जगतव्यापी रूप से दृष्टिगोचर स्वरूप हो रहा
ऐसी दिव्य चेष्ट, उस चेष्टा का ज्ञान मानव चेतना विचार द्वारा
पर जब जग की इस चेष्टा चेष्टा के विराट् रूप चेष्टा को सिर्फ व्यक्तिगत
चेष्टा मात्र तक सीमित समझकर या उस रूप में स्वीकार कर ही उस चेष्टा
रूप को, उस चेष्टा के मूल विराट् स्वरूप को विस्मृत ही कर दिया गया तो
उस रूप को, उस चेष्टा के दिव्य स्वरूप को उस चेष्टा के रूप को, उस परम
चेष्टा रूप भाव को विस्मृत कर उस चेष्टा को सिर्फ चेष्टा ही माना गया तो
सच, जिस को जग विस्मृत करता हुआ चेतना के रूप को विस्मृत... ही नहीं करता
पर वो विस्मृत करता जा रहा था उस मूल को जिसका रूप चेष्टा रूप में सर्वदा
साक्षात्कार स्वरूप ही चेष्टा का विस्तार लिए हुए सर्वदा गतिशील रहता
हुआ ही तो दृश्यमान है उस विराट् चेतनामय चेष्टा रूप सर्वव्यापी
दिव्य चेष्टा स्वरूप के रूप में चेष्टा, जो जग का रूप बना
सिर्फ या व्यक्तिगत रूप चेष्टा तक ही चेष्टा व्यक्तिगत के स्वरूप तक
सीमित होकर रही, जिसे समझ कर ही तो मानव ने भी चेष्टा रूप, उस चेष्टा
को सिर्फ जड़ चेष्टा रूप, चेष्टा के दिव्य भाव चेष्टा रूप से अलग कर के जो रूप
बना लिया था या मान लिया था, उस रूप चेष्टा भाव रूप से विलग जो
रूप किया गया? जिसने कि आगे चल कर मानवीय चेष्टा सम्बन्धी,
व्यक्तिगत ही, चेष्टा ही, व्यक्तिगत रूप चेष्टा चेष्टा रूप होकर रह गई या
संकीर्ण बन गई ; जिस से उसका स्वरूप?
एक चेष्टा को, उस चेष्ट को जो इस जग, दार्शनिक या चेष्टा रूप दिव्य
रूप जग का रूप चेतना स्वरूप था, उस से सम्बन्धित चेष्टा रूप, जग-रूप
चेष्टा स्वरूप से अलग, उस दैव चेष्टा साक्षात्कार से अलग ही सिद्ध
किया गया, जो चेतना रूप चेष्टा चेतना का रूप था उस चेष्टा से
अलग हो? जिस रूप का परिणाम था, वो जग चेतना रूप लिए हुए उस चेतना
243

अभिमान बड़ा था, इतना विशाल वपु था, इन्द्रजीत जैसा सुभट जिसका पुत्र था। किन्तु इस सबके होते हुए जिस प्रकार एक ही क्षण में वह सब नश्वर होकर उस महारथी का विनाश कर सकता था उसी तरह सब कुछ देखकर भी गान्धारी समझती थी, कि दुर्योधन का बड़ा भारी नाश होने वाला है। उसकी समझ, सब व्यर्थ सिद्ध
होकर विवश होकर अपने नेत्रों द्वारा पश्चात्तापमय अश्रु ही बहा सकती थी। गान्धारी का शोक उस समय का था जब उसका ज्येष्ठ सुपुत्र दुर्योधन--जिस पर उसे बड़ा ही गर्व था। वह जब रणक्षेत्र में जाने लगा तो उस समय उसने अपने पुत्र को किस प्रकार से क्या कह कर विदा किया
संसार रूपी नाटक-रंगमंच पर यह सब जो कुछ कौतूहल प्रदर्शित होता है, वह सब एक मायावी जादूगर के हाथ की कठपुतली रूपी-नाट्य मात्र है। किसी पर कोई गर्व कैसा, क्षणभंगुर संसार, क्षणभंगुर काया, सब कुछ एक क्षण में नष्ट भ्रष्ट हो जाने वाला है। फिर भी यह सब देख कर, मानव इस पर गर्व
कर बैठता है। जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं उस पर वह अपना हक समझने लगता है, यह भी उसकी भूल ही है। मोह और अज्ञानता ही इसका मूल कारण है। उसने कहा, वत्स ! यह युद्ध धर्म और अधर्म
का संग्राम है। अतएव धर्म की जय होगी
तू अधर्म पथ पर चल रहा है, इसलिए तेरी ही पराजय होगी और
धर्म की ध्वजा लहराने वालों की ही जय होगी। तूने क्या कभी सोचा है?
कि जन्म--मृत्यु किसके वश में है, यह, सब, विधाता का खेल है। हम तो मात्र रंग मंच के पात्र हैं? तू, उस दिन तो भगवान् कृष्ण का बड़ा भारी अपमान कर बैठा था। वत्स, तू तो बड़ा हठी है? उस समय-समय, तू ने उस भगवान्, जो कि न्यायाधीश, न्यायकर्ता देवता, तथा इस समस्त सृष्टि का जो कर्ता-धर्ता एवं स्वामी है--उस का तो मान-मर्दन किया? क्या तू उन्हें अपने जैसा ही समझता? क्या वह एक-साधारण मानव हैं? वे तो त्रिलोकी के स्वामी हैं? उनका नाम ही तो संसार में सबसे बड़ा! उनका तो स्मरण ही भव सागर पार--
उतारने वाला एक मात्र साधन है।
जिस पर वे प्रसन्न होकर कृपा कर दें
उसके जैसा दूसरा कोई नहीं रहता।
संसार के सर्वशक्तिमान् कहे जाने वाले भी, उनके सामने हाथ जोड़े नतमस्तक हो, उनके चरण कमलों को स्पर्श कर, अपने दोनों हाथों को फैलाकर वरदान माँगते हैं। उनका ध्यान करने मात्र से जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तो फिर, तूने तो उनका अपमान किया।
गांधारी का हृदय इस समय ममता रूपी धारा में बहने लगा था। वह अपने दुर्योधन रूपी पुत्र का ध्यान इस प्रकार से कर रही थी मानो अपने प्राणों से प्यारे पुत्र को कोई संकट न आवे। वह अपने हृदय पर पत्थर रखकर अपने पुत्र के दुर्गुणों को देखकर भी, अनदेखा कर, अपने पातिव्रत धर्म का प्रभाव डालना चाहती थी। वह जानती थी कि दुर्योधन अवश्य पराजित होगा, पर एक माँ का हृदय ममता के वशीभूत होकर अपने पुत्र को बचाने का कोई उपाय तो अवश्य करेगा ही। इसलिए उसने दुर्योधन को आज नग्न होकर आने को कहा था, जिससे कि उसका शरीर वज्र का बन सके। वह अपने इस पातिव्रत प्रभाव से अनभिज्ञ नहीं थी, पर दुर्योधन ने उसकी आज्ञा का पूर्ण पालन नहीं किया। उसने अपनी जंघाओं पर वस्त्र लपेट रखे थे। जिसके कारण उसका सारा शरीर तो वज्र का बन गया पर जंघाएँ न बन सकीं। जब गान्धारी ने यह देखा, तो वह फूट-फूट कर रो पड़ी और बोली--“वत्स ! तूने यह क्या किया? तूने तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। तूने मेरी बात न मानी, जिसका फल तुझे भोगना ही पड़ेगा। अब तुझे कोई नहीं बचा सकता। तूने भगवान् श्रीकृष्ण का अपमान किया, संतों का अनादर किया, धर्म का मार्ग छोड़ दिया, अब तू उस भगवान् की शरण में जा। शायद वे ही तेरी रक्षा कर सकें। गान्धारी के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे और दुर्योधन लज्जित होकर खड़ा था। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।”
गांधारी ने, जो न देख

244

इस बाल्यकाल के बिना किसी परिश्रम स्वाध्याय के बिना ज्ञान तथा सब प्रकार के भोग
अनेक प्रकार सब प्रकार सिद्ध तथा सम्पूर्ण सुख भोगने योग्य जो उत्तम पदार्थ
मिले हैं, उनका उपभोग जो करते हैं।
जो विचार अथवा विवेक तथा ज्ञान रूपी नेत्रोंको बन्दकर सम्पूर्ण सुखरूप जल
पूर्ण के समान विषय भोगों रूपी जल में डूब रहे हैं जिससे न कभी पार पावेगा तथा
अनेक जन्म में, सो सो योनियों में जिस प्रकार मनुष्य विषय सुख भोग रहा है, सो तो
अन्य सब पशु पक्ष्यादि योनियों में सम्पूर्ण भोग प्राप्त होता ही रहता है। किन्तु,
उपकारी ज्ञान प्राप्त होकर जिस ज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है सो तो प्राप्त धर्मात्मा
विचारवान पुरुष ही पुरुषार्थ के अभ्यास द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त करते हैं। जो विद्या
धर्म, ईश्वर रूप जो उपकारी ज्ञान जिससे सब प्रकार का सुख हो, सत्य, सुविचार,
विज्ञानादि रूप जो सदा साथ-साथ रहने वाला है सो अविद्यावान् को प्राप्त ही नहीं।
इस कारण-कारण ज्ञान रूपी धन को जो मनुष्य नहीं करते वे मूर्ख, विवेक शून्य
ही जन्म धारण किये
वृथा जन्म खो, काल रूप महा सर्पके मुखमें प्रवेश करते हैं।
सो अविद्यावान् मनुष्य पशुके समान ही है, कारण जिस प्रकार पशु खाता पीता
विषयको भोगता भोग भोगके कालके वश हो जाता है सो पशुके सदृश ही है। इसी
प्रकार मूढ नर जो सो अविद्यावान् को प्राप्त भोगोंके भोगनेमें सदा तत्पर रहता
कभी भी उस प्रभु का गुणानुवाद तो कभी भी नहीं करता, उस परम दयालु को जो
सब सुख दाता अविद्यावान् को भी सुख, सो सो ज्ञान प्राप्त कर उस प्रभुके
उपकारोंको भी याद नहीं करता, सो तो जन्म लेकर विष भक्षण करनेके तुल्य जीवन
को धारण किये हुए ही है, सो इस जन्म में भी दुःखी, पर जन्म भी दुःखी
सो अविद्यावान् मनुष्य अज्ञानता रूपी जाल में फंसा ही रहता है, जन्म-मरण
रूप भवके फन्दे को कभी त्याग नहीं सकता तथा सो अनेक प्रकार के दुःख भोगता
ही रहता है, जिस प्रकार बन्धन सहित कुत्ता कसाइयों के हाथमें जाकर अनेक
कष्टोंको वा दुःख-दारिद्र भोग को ही भोगता रहता है उसी भाँति, सो नर अज्ञानी
मूढ़ ही जन्म धारण कर सब कुछ खोता है।
सो अब सो सब भी अज्ञानता नाश हो तथा सुमति प्रकाश हो इसलिए प्रार्थना
पूर्वक प्रभु स्तुति की सो कही है, सो अब कृपा कर के, हे प्रभु सब दोषों हरिये?
जिससे शुद्ध होकर तुम्हारे पादारविन्दों में मन स्थित होकर सदा आनन्दित रहे
तथा सदा सब सुखोंके दाता प्रभुकी शरण में सदा मन स्थिर रहे, सो यह
सत्य ज्ञान का प्रकाश सब जीवों द्वारा प्राप्त हो सो प्रभुने कृपा करके वेद रूप
ज्ञान प्रकाश, वेद, सो सब का सब सब के कल्याणार्थ सब जीवोंके सुखके हेतु रचा,
जिस, सब का उद्धार हो तथा सब अज्ञान रूपी अन्धकार मिटकर सत्यता रूप सब
जीवों को कल्याण का प्रकाश वा आनन्द सदा प्राप्त होवे सो प्रभुने सब जीवोंके
ऊपर कृपा करके सत्य ज्ञान का प्रकाश जो किया है? सो उसका सब प्रकार नित्य
अभ्यास सो जो करेगा, उस अभ्यास की दृढ़तासे मन शुद्ध होकर प्रभुके
स्वरूपका ध्यान करके जिससे उस पद मोक्ष पदको प्राप्त कर लेता है, सो जब
मनुष्य अज्ञानता को तजकर सब जीवोंको इस उत्तम मार्ग पर चलावे तथा
स्वयं सत्य स्वरूप को मन वचन कर्म द्वारा सेवन कर मोक्षपद, पद प्राप्त करे,
सो संसार में जो कुछ भी है सो परमात्मा सबको ही समान रूप देकर उपकार
है, सो सब मनुष्य, सब का सब, सब प्रकार का कल्याण ही चाहे
सो जो सज्जन ऐसा करते हैं सो उत्तम हैं, तथा जो केवल अपना कल्याण
ही चाहते तथा दूसरों सदा का अनिष्ट ही, विचार ही मन में, परोपकार ही,
अथवा परोपकार शून्य सो नर पशु रूप ही जानिए
आज का दिन इस बात का बड़ा भारी आनन्द हुआ जिसका वर्णन वाणी से
भी नहीं हो सके तथा चित्त आनन्द स्वरूप परमात्मा के चरणारविन्दों में मग्न
हो, प्रार्थना रूप सब सत्य सुखकारी शब्द रूप है? अतः सबको सन्मार्ग पर चलना
योग्य
इसलिए सब जीवों का यह परम कर्तव्य है कि सो भी, सब प्रकार के
भय को त्याग कर सर्वव्यापक ईश्वर के ऊपर, सम्पूर्ण भाव तथा दृढ़ विश्वास करके
सब जीवों अपने आत्मा के समान समझ-बूझके परोपकार ही करना यह ही सब का
मुख्य काम है। क्या राजा, प्रजा सब कोई, परस्पर सब मिलकर, एक-दूसरे
जीवोंके सुखार्थ सब प्रकार से मन धन तन से सहायतार्थ ही प्रवृत्तरहें, सो ही
उत्तम मनुष्य सब को कहा गया।
245

तब यह विचार कर और शान्त चित्तके अनुसंधानसे निश्चय करो! इस संसारमें धन और वैभवका सुख विनाशी,
क्षणभंगुर, जरा और मृत्युसे संकीर्ण, यह समझ कर इस संसार और सांसारिक भोगोंको तृणवत् समझकर
परित्याग कीजिये अथवा सब भोगोंको पर त्यागने न बने, अर्थात् भोगों विषय, जिस पर अपना विशेष
विचार वा अनुराग वा आसक्ति न होय उसे भोग कर उसीके द्वारा उस पर पुरुष परमात्माका साक्षात्कार
करें? जो ऐसा विचार न कर सके तथा भोग पदार्थोंके विषयमें लोभी न होवे, तो इसका फल क्या?
पश्चात्गामी होगा या नहीं? अर्थात् पश्चात्तापको ही प्राप्त होगा तथा अंतमें नरककी यातना भी भोगे
पर उस ईश्वर का साक्षात्कार वा मोक्ष पद कदापि न होवेगा और न ही सुख पावेगा! ईश्वर सबमें व्याप्त
इस सब जगत् को धारण करने वाला सब का प्रेरक परमात्मा जो सब जगत् में व्यापक होकर स्थित
होकर भी! अपने ज्ञानवान् मुमुक्षु भक्त को अविद्या रूपी अंधकार विषयक भोगों से रहित होने की
प्रेरणा करता व कहता, सावधान करो उस ईश्वर को जो सब का साक्षी वा सब में व्यापक, सब का धारक सब
का पालन कर्ता, यह समझ कर उस ईश्वर सबको व्यापता है उस ईश्वर को सर्व व्यापक जान ईश्वर
निमित्त सब कर्मोंको अर्पण कर नित्य अपने आत्माको तृप्त वा परमात्माको तृप्त कीजिये!
परमात्मा स्वयंप्रकाशित होने कारण सब पर कृपा करता हुआ सब जगत्के ऊपर व्याप्त हो रहा
है सो उस ईश्वर सबसे भिन्न वा पृथक्-पृथक्? विचार करो उस ईश्वरका साक्षात्कार वा ज्ञानके होनेपर
कोई संशय वा शोक वा अज्ञान अथवा क्लेश कभी नहीं रहता क्योंकि वह ईश्वर अविद्या, भ्रम
नाश का करवाने वाला
है उस ईश्वर को सब प्रकार देखना चाहिये? सो परमात्मा सर्वत्र व्याप्त सबको व्यापने वाला सब
पर सब का स्वयंप्रकाशित सर्वज्ञ सब शरीरोंके रूप रहित सूक्ष्म वा स्थूल, सूक्ष्म लिंग वा कारण देह
के नाश रहित जो सब जीवोंको कर्मोंका फल देने वाला
ईश्वर अपने दिव्य तेजसे सब जगत्को तृप्त, आनन्दित करता हुआ सब जगत्में व्यापक होकर
दिव्य रूप सर्वव्यापी सर्वेश्वर रूप सर्वज्ञ सब शरीरों रहित वा, सब जीवोंका प्रेरक शुद्ध व्यापक है,
सब प्रकार विशुद्धताके दाताभावसे जो निष्काम कर्म रूप परमात्माकी उपासना अथवा ध्यान रूप
उत्तम कर्मों द्वारा, ईश्वर सब दिव्य जीवोंका कल्याण सर्वदा करता रहता
ईश्वर सबका साक्षी होकर सबको तृप्त
वा सब पर दयाल वा पोषक, सबको उस ईश्वर रूप सूर्य वा तेजके सन्मुख वा शरण,
जिसमें जीव को सब दुख वा कष्ट नाश हो कर परम शान्ति प्राप्त हो, यही सब उत्तम मनुष्योंका
धर्म
हे सच्चिद् ब्रह्म परमात्मा भो, हे शिव रूप ईश्वर परमात्मा भो, हे सनातन रूप स्वामी परमात्मा भो, हे
सब जगत् कर्ता परमात्मा भो, हे पोषक रूप ईश्वर परमात्मा भो हे सब जगत् प्रेरक परमात्मा रूप हे प्रकाश-
स्वरूप भो, हे सूर्य रूप अविद्या-नाशक परमात्मा भो, हे कल्याण रूप, हे व्यापक रूप, हे
शुद्ध रूप, हे समस्त इस ब्रह्माण्डके स्वामी वा जगत्के सुख दाता स्वरूप सर्व ऐश्वर्यवान्
परमात्मा भो सब ऐश्वर्यवान् परमात्मा भो, सब शरीरोंमें व्यापने वाले वा सब जीवोंके कल्याण कर्ता
रूप ईश्वर परमात्मा भो, विद्या व ज्ञान दाता भो, हे केवल
सो ईश्वर सत्य प्रकाश रूप--
ॐ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह ।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँ शरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर क्लीबे स्मर कृतँ स्मर ॥
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥
इस प्रकारका विचार करने वाले मनुष्यके लिये ईश्वर कभी दूर वा गुप्त नहीं होता
ज्ञान वा उस पुरुष--ईश्वर भाव को जानकर, परमात्मा का साक्षात् वा दर्शन किया, इसके पश्चात्
वह जीव ईश्वरकी वा परमात्माकी सत्ता व सामर्थ्य तथा अपनी जीवात्माकी अल्पज्ञताको जान उस
परम परमात्माके शरण होकर परमात्माके साक्षात्कार सुख लाभ को प्राप्त हुआ वह अपने सत्य जीवन
को, सब जीवों ईश्वर, सबको ईश्वरके ही सब सम्बन्धी जीवात्माका सम्बन्ध समझता हुआ उत्तम
गति
को प्राप्त करके सब दुख वा अज्ञान कष्ट भोगोंसे छूट, हे सत्य स्वरूप वा ब्रह्म रूप ईश्वर
सब पर अपनी कृपासे सब जीवोंको सब प्रकारके भय क्लेशोंसे दूर रखिये, सब प्रकारके भय से ही
रक्षा कीजिये जिससे सब ही जीव भय क्लेशोंसे दूर रह कर आनन्दित रहें वा सब जीवोंको ईश्वर
कृपा प्राप्त होने पर मनुष्य कभी किसी प्रकारके क्लेशमें नहीं पड़ता, इस बात को, विचार
कीजिये तथा स्मरण रखिये सब ही जीव, विचार करो उस ईश्वरको? ईश्वर कैसा ईश्वर, कैसा
वह परमात्मा परम दयाल व सर्वेश्वर सर्वव्यापक, वह कैसा ईश्वर होगा जो जीवोंको सब प्रकार
आत्मिक शान्ति प्रदान कर सब प्रकार के कष्ट, सब जीवोंके क्लेशों तथा दुर्गुणोंको छुड़वाता
वा भगाता? सदा ईश्वर अपनी सर्वशक्तिके ज्ञानद्वारा... ॥
सो विचार करो ईश्वर कैसा; क्योंकि उस ईश्वरका स्मरण करने वाला सब संशयों तथा
दुःखों से? तथा अविद्या के प्रभाव से छूटता? ईश्वर कैसा दयालु? इसका उत्तर आगे
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