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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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176

विचार करूँ और यह सब सोचूँ कि, जो जो इन दोनों का रूप या मन था उसको मैं
प्रेम करूँ अथवा इन दोनों का रूप और नाम जैसा कि इन दोनों का था, न भी रहे तो भी
इनके नाम और रूप को प्रेम करूँ ऐसा विचार ना ही बने, क्योंकि जो प्रत्यक्ष रूप
हम सब सुख पाते हैं सो सब रूप बदल जाता है।
सो जब मैं सब बातों को इस रीति से मन में सोच कर देखने लगा, तब ऐसी
विचारनाएँ मन में क्यों उठने लगीं? हे प्रभु जब तूने, या तेरे बनाए हुए किसी
ने यह रूप या मन रूप किया
है! तो उनको इस विचारना से क्या लाभ होगा या ऐसा करने से उन को क्या
लाभ हो सकता है जिन को, नाम या रूप विचारने से कोई लाभ नहीं हो
सकता, ना उनको जो इस संसार में सब बातों से परे कोई लाभ नहीं पाना
चाहते इत्यादि।
ऐसा सब सोच, "जब कि सम्पूर्ण रूप या नाम परमात्मा से उत्पन्न हुए
सब विचारना के पश्चात् अन्त को एक ऐसा शून्य वा प्रकाश रूप हो गया जिस
को न प्रकाश कह सकते हैं ना ही शून्य कह सकते हैं और ना शून्य कह सकते
क्योंकि प्रकाश और शून्य दोनों शब्द भी एक विशेष अर्थ दर्शाते हैं"
जिस का कोई दृष्टान्त नहीं दर्शाया जाता क्योंकि
वह सब कुछ अपने में अपने आप सब का आधार
अपने आप बिना सहारा स्वयं प्रकाश स्वयं प्रकाश स्वरूप
स्वयं ज्योति स्वयं ज्योति स्वरूप स्वयं चेतन स्वरूप
स्वयं चेतन स्वरूप न नाम रूप पर मन का आधार।
अब यह भी मन में संशय उठा कि शून्य अथवा प्रकाश रूपी ज्योति को
नाम रूप भी कोई कह सकता है या कह ही नहीं सकता, यदि कह भी नहीं सके; तौ
कह सकता है, यदि कह भी नहीं सकता तो नाम भी कैसे ले, यदि ले
सकता है तो क्या नाम दे? शून्य दे? शून्य का क्या नाम दे?
जो ना तो कोई वस्तु शून्य है, शून्य-मात्र शून्य है, जिस प्रकार सब ओर
शून्य का विस्तार सब ओर फैला हुआ है यदि प्रकाश स्वरूप कहें, तब सब ओर
तेज ही तो तेज भरा हुआ
दिखाई नहीं देता है, ज्योति मात्र सब ओर ना रहे, प्रकाश मात्र भी
सब ओर ना रहे। ना तो इस को शून्य, ना ही प्रकाश कह सकते हैं।
तो फिर जो भी, ज्योति रूप कहेंगे तो ऐसा ज्योति रूप जो मन का रूप,
ज्योति मात्र स्वरूप होकर मन का, मन का रूप, मन का रूप, मन का रूप
सब विचारनाओं को एक विचारना बना कर, न तो एक विचारना
ही रह सके, बल्कि उस का होना ही ऐसा हो सके जिस प्रकार एक ही
आ-पे को पा कर, सब भ्रमों से रहित हो-कर जो देखता रहा सो भी, उस
रूप का आधार बन खो-कर उस प्रकाश का रूप हो, उस प्रकाश के
अन्दर एकरस न रहे; जब तक ऐसा, मन को ना हो जाए तब तक;
ज्योति मात्र स्वरूप भी मन ही का प्रकाश का अंग ही कहलाएगा? ना केवल
प्रकार का नाम-मात्र का ही शून्य का नाम मात्र समझना, मन की एक
भूल होगी; जिस भूल को जब न खोया, तब तक ना जाना रूप बनेगा
विचार प्रकार का नाम ही न था केवल प्रकाश स्वरूप ही कहा
गया था जिसको परमात्मा रूप समझने का यत्न किया जा रहा था अथवा
मन के पश्चात् जो कुछ न प्रकाश था उसको परमात्मा का नाम देकर अपनी
विचारना द्वारा सब प्रकाश स्वरूप केवल मन को ही भ्रम से, या ज्ञान के
बिना विचार को ही नाम पश्चात् ज्योति स्वरूप समझ कर भ्रम-वश
से उसी प्रकाश के भ्रम में ही खोने की चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस
को ही परमात्मा ज्ञान विचार कर चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस को
ही परमात्मा का न जानना
रूप समझना अथवा कहना जैसा कि सब लोग केवल केवल कहते हैं? सब
का रूप ही अपने आप
ही रहा; जब तक, सब विचारनाओं का अन्त नहीं हो, परमात्मा का रूप
सब ओर सब बातों से परे, क्योंकि सब के पश्चात् ही नाम का जो ज्ञान है
उसका खो-कर मिलना, परमात्मा स्वरूप ही बन कर सब का विचारनाओं
रूप ही बनेगा।

177

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Let's do a quick count of the boxes in some lines to make sure it looks visually similar.
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Yes, this is exactly what I've written.

Let's write out the final response.

हो? लेकिन किसी को रोको! सुनो, समझ कर विचारवान् व्यक्ति समझ जाएगा कि
सब कुछ तो ईश्वर व्यवस्था से होता रहा फिर न केवल यह सब हो रहा है सब
ही सब कुछ तो होगा?
जो हुआ सो हुआ, पर आज तो यह व्यवस्था बदल ही गई जब तब सब कुछ
ठीक ठाक चल रहा था तब तो सब न हो के रुका, पर विचारवान् का जीवन-
मरण तो विचार से, निर्णय से होता ही न होगा? और तब ऐसा ही सब कुछ
न हो के रुका था, जब तो विचारवान् रुका होगा, पर तब भी न रुका?
निश्चय, तब रुका और जिसका रुका ही नहीं तो वह तो तब तब भी न
रुका
इसका तो यह अर्थ न होगा कि, जो सब हो रहा होगा तो सारा जगत ही
रुकता था, विचारवान् भी, किसी के बस कुछ नहीं होता, सब कुछ सब ही कर रहा
था
विचार तब ही तो सब को यह होता था, कि किसी को तो अपना काम करना
पड़ा तब सारा सब रुका, जो रुकता ही नहीं था, रुकने से रुका सब ही था, पर
कोई यह रुका था, जो रुक जाता किसी दूसरे कार्य के सब व्यवस्था कार्य
था, जिसका काम हमेशा व्यवस्था में सब व्यवस्था था, विचारवान् रुका
ऐसा तो सब कुछ सब ही विचार करके ही सब हुआ, पर किसी के विचार
का कोई काम सब ही रुका तो वह विचार का हुआ था, पर किसी के विचार
से, या विचार करके व्यवस्था के काम से, जो हो रहा, सो तो व्यवस्था अनुसार
होना रुका था या व्यवस्था बदला, सुनो, पहले तो सब व्यवस्था सब ही था, जब
कि सब... सब सब काम था, सो; तब तो व्यवस्था सब ही हो तो विचार से तो
विचार बदला था या सब काम रुका विचार का सब काम तो सब ही विचार
से, विचारवान् को लगा तो सब रुकता था, पहले तो विचार बदल दिया तब सब
रुका था, जिसका जो काम था, उस विचार के अनुसार सब
इसका अर्थ यही था, "सब कुछ व्यवस्था बदल विचार से विचार हुआ"
सब संसार न सब संसार विचार ही सब व्यवस्था सब विचारवान् का तब
व्यवस्था सब विचार विचार के सब रुकने तब सब रुका सब विचार विचार ही
विचारवान् तो काम करता सब विचार विचार से सब काम करना चाहता इसलिए? फिर
भी विचार बदला? किसी को मन से, विचार, पहले तो सब काम किया सब
व्यवस्था के काम से था, तब जब सब काम कर रहा था, सो रुका; तब भी
रुका था, सो तो विचार बदला विचार सब काम रुका था, पहले विचारवान् से, सारा
संसार तब काम बदला?
किसी के विचार तो सब नहीं हो रहा काम विचार द्वारा सब विचार बदला
काम तो विचार सब ही हो रहा था तब सब काम रुका व्यवस्था काम से
विचार ही तो सब काम सब सब काम व्यवस्था सब काम से बदल ही रहा था
जैसा काम, सो काम किया विचार बदला, बदला काम विचार द्वारा व्यवस्था
रुका तो काम तो सब विचार बदला रुका, इसका विचार ऐसा विचार हुआ
विचारवान्, विचार बदला ही था, बदला ही! जब विचार सब ही बदला
गया तो काम ही क्या था, सब काम का बदला तो सब विचार ही सब रुका बदला
ही, पहले बदला काम सब ही हो रहा विचार से ही--कि जो विचार बदला तो काम
तो, बदला, रुका तो ही सब काम रुका विचार बदला काम से काम बदला
व्यवस्था रुका सो तो काम सब सब काम हो रहा सो विचारवान् बदला तो विचार
ही तो रुका था, विचार बदला तब विचार से सब विचार रुका तो सब काम रुका
था, बदला सब काम तो सब विचार बदला काम तो विचारवान् ही? सब को तो
विचार रुका ही!
फिर तो विचार सब बदला तो सब विचार से विचार बदला सब संसार तो
व्यवस्था काम रुका विचार व्यवस्था से सब काम रुका विचार बदला काम तो हो रहा
काम बदला, काम सब-सब काम हो ही बदला था, सब काम सब काम सब
सब था? संसार ऐसा लगा
संसार सब ही संसार सब सब न बदला, सब काम सब बदला, सारा काम
बदला ही? जब तो सब काम सब सब ही काम बदला सब विचार सब काम रुका
विचार ही सब काम काम रुका ही तो विचार से काम तो सब बदला ही था
सारा विचार रुका काम ही तो काम हो रहा था जो सब काम रुका था, तब

179

विचारवंत जर खरे, निर्भय पण तर त्याचे विचार या तीन गोष्टी वरून ठरतात परिस्थिती परिस्थितीला
बदलणारे उपाय
कारण फक्त परिस्थिती सांगणे सोपे, परिस्थिती चा अभ्यास करून उपाय शोधणे कठीण त्या साठी
लागतो विचार
विचार फक्त स्वतः साठी विचार का समाज साठी, परिस्थिती चा अंदाज परिस्थिती? परिणामा
अंदाज? स्वतःवर बेतले तर काय या गोष्टी विचार? स्वतः विचार तो पण स्वार्थाने ज्या वेळी विचार
त्या वेळेला त्या विचारांच्या प्रभावाने त्या समाजाचे भले कसे होणार परिस्थितीवर काय मात केली
जाणार परिस्तिथी बदलणे म्हणजे काय हा प्रश्न येतो या परिस्थितीचा २ भागात विचार का करावा लागेल
परिस्थिती माणसा मुळे माणसावर ओढवली आहे किंवा निसर्ग मुळे किंवा दैवी किंवा अचानक संकट
मुळे परिस्थिती? या दोन्हीत मार्ग, उपाय दोन्ही वेगळे या वर, त्या वर मात कशी करता येईल याचा
विचार करणे उपाय शोधणे हा खरा विचार विचार या तीन गोष्टीवर का ठरवायचा?
जात पात धर्म पैसा प्रतिष्ठा समाजात निर्माण विषमता, अन्याय श्रीमंतगरीब
गरीब, परिस्थिती चा अभ्यास का केला जातो तर त्या मुळे होणारा अन्याय, जर या मुळे
होत असे तर त्याचा शोध घेणे गरजेचे, जर उपाय सांगू, तर सांगू काय सांगणार त्या
दोन्ही मधील जर भेद संपवा असेल तर उपाय संपणार का या दोन्ही चा विचार या तीन गोष्टी
वरून ठरवायचा का, समाजाचे या दोन घटकात जे, तर त्याचे सर्व प्रश्न याच गोष्टी वर जात पात
धर्म आणि पैसा या वर संपत जर तो उपाय हा निसर्ग नियम मानला तर उपयोग काय, तो विचार
कसा! जर या चार गोष्टी मुळे समाज दोन-तीन भागात वाटला जर या सर्व गोष्टी वर विचार जर
उपाय शोधून बदल घडणार का प्रश्न पडतो? या वर विचार केला तर, काही विचारवंतांचे विचार
फक्त मत काय होते
समाज विचारवंत स्वतः चा विचार जर, समाज या तीन चा विचार करून मार्ग जर शोधत
नाही समाज जर मार्ग शोधू शकत नाही, जर या दोन भागात समाज वाटून २ घटकात समाजात
विषमता या दोन घटकात निर्माण झालेली विषमता कमी करायची असेल तर विचार या परिस्थिती
वरून नाही शोधायचा परिस्थितीवर मात करायचा शोधणे गरजेचे, या गोष्टीचा मार्ग शोधणे गरज
आहे
"कारण मार्ग शोधताना आधी परिस्थिती समजून घेणे गरजेचे निसर्गाचा नियम
मानून चालत नाही हा नियम चुकीचा ठरवला पाहिजे"
असा जर मार्ग शोधायचा? परिस्थिती चा मार्ग विचार केला, निसर्ग नियम जर, नैसर्गिक
नियम आहे, तर बदल घडवताना नैसर्गिक नियम चा अभ्यास करावा लागेल पण, हा मार्ग
निसर्गाचा जर समजाचा नियम आहे म्हणून जर परिस्थिती बदल विचार केला नाही, तर समाज
मागे राहून जाईल असा विचार जर समाज मनात विचारवंतांच्या निर्माण झाला नाही तर या तीन
घटकात समाज जर, या तीन घटकात निसर्गाचा जर नैसर्गिक नियम ठरवून फक्त परिस्थिती
वरून विचार मांडला म्हणून परिस्थिती जशी आहे तशी जर चालू दिली, तर काय मार्ग निघणार
परिस्थिती बदलणे, सुधार, विचार, समाजसुधार कश्या पद्धतीने समाजाला मार्ग दाखव ती परिस्थिती
वर मात करू का स्वतःच्या विचाराने मात करता येईल परिस्थिती बदलणे हा खरा विचार
जरी समाज या तीन गोष्टी वर जर दोन भागात वाटून २ भागात वाटून जर मार्ग जर शोधत
नाही समाज जर मार्ग शोधू शकत नाही, परिस्थिती बदलणे, परिस्थिती चा अंदाज घेऊन त्यावर मात कशी करता
हा खरा विचार पाहिजे!
विचार काय या तीन गोष्टी वरून स्वतःचा विचार केला तर या तीन गोष्टी वरून मानसाचे दोन
तीन-चार भागात वाटले गेले विचार जर या गोष्टी वर जर विचार केला तर काय परिस्तिथी बदल घडेल
बदल हा समाज मनाचा विचार बदलून होणार परिस्थिती बदलून विचार कसा बदलेल? या तीन गोष्टी
शिवाय जर तीन गोष्टी, स्वतःचे स्वतःवर बसलेले संकट या परिस्थितीचा विचार? या तीन गोष्टी वर
स्वतःचा जर, स्वतःचा स्वतःवर संकट आले तर स्वतः चा विचार, तो स्वतःचा विचार
परिस्थिती बदलू शकत नाही!
जर स्वतः चा विचार हा स्वतः २ भागात जर वाटला तर या परिस्थिती चा विचार का स्वतःचा विचार
स्वतः स्वतः वर जर संकट ओढवून घेत जर समाज आला तर, तो समाजाचा विचार कसा
समाज स्वतः चा विचार स्वतः स्वतः करू शकत नाही, जर हा विचार केला, स्वतः समाज २
भाग, या दोन घटकात जर विचार केला
समाज या तीन गोष्टी, जर या तीन गोष्टी वर स्वतःचा विचार, स्वतः समाज
एका घटकात जर स्वतःचा विचार स्वतःचा विचार करू! एका घटकात स्वतःचा विचार हा स्वतः स्वतः
विचार हा स्वतः विचार स्वतः विचार स्वतःचा विचार नाही, विचार हा स्वतः विचार!
विचार स्वतःचा स्वतः विचार केला तर स्वतः विचार स्वतःचा विचार स्वतःचा विचार
स्वतः केला, समाजात या दोन्ही बाजूचा विचार करून जो स्वतःचा विचार समाजात जर विचार
केला स्वतःचा विचार स्वतः परिस्थिती विचार या वर या परिस्थितीचा हा विचार ठरवला
180

जब सम्यग्दर्शन का उदय हो जाता है, ज्ञान, वैराग्य की छाया स्वभाव सम्यग्
दृष्टि का होता चला जाता है। जब तक आत्मा रूप ज्ञान का भेद-ज्ञान से शुद्ध
स्वरूप का रस नहीं पीता है। तब तक सांसारिक भोगों रूपी मदिरा का नशा नहीं छूटे-
गा। यह आत्मा पहले संसार में जो भी जो भी सांसारिक या अन्य प्रकार के भोग या
रस लेता रहा तथा उन भोगों का त्याग भी किया था।
वह तो एक रस से गैर-रस में गमन करने लगा था। रस तो सब संसार
संबंधी राग-द्वेष रूपी कर्म बंधन का उत्पादक होता रहा, रस नष्ट तो, कभी नहीं
हो पाया था। सो ही बात सम्यग् दर्शन रूप ज्ञान के द्वारा यह जीव रस के स्वरूप को
रस के वास्तविक रूप को ग्रहण करने लग जाता है। तब अन्य सांसारिक रस, जो
रस ही नहीं था जिसे हम, रस समझते चले आ रहे थे? जिसे अन्य सांसारिक
वासनाओं को-एक तरफ त्याग कर ज्ञान के द्वारा त्याग रूप धर्म कहा जाता था, वह
धर्म नष्ट होकर रस में बदलता, त्याग का परिणाम है, त्याग तो वह रहा ही नहीं
उस रूप त्याग को तो संसार
ही कहा जा रहा, राग ही! त्याग का क्या स्वरूप समझें? जब आत्मा के निज
स्वभाव को जान लिया जाता है। तब यह संसार के समस्त भोगों का रूप, चाहे
शुभ रूप ही क्यों न हों। जो कि सांसारिक संसार वासना के ही कारण
हैं, इस प्रकार के जान कर यह आत्मा इस त्याग वाले रस को--यह त्याग रूपी
रस, ज्ञान का रस नहीं बनता, त्याग नहीं? त्याग तो संसार रूपी
त्याग हो गया, इस रस का त्याग होने लग जाता त्याग रूप जो कि इस
रस स्वरूप को जान कर त्याग ज्ञान के रस का रस समझ कर रस लेता ही नहीं
रहता, रस तो यह तब तक त्याग रूप रस समझ कर लेता रहा था? जिसे अन्य वासना
का रस ही समझा जा रहा
सो इस प्रकार से इस रस का त्याग, स्वयं रूप त्याग जब तक न हो पाता
रहेगा, यह संसार रूपी त्याग
चलता रहेगा जो कि यह जीव संसार का त्याग तो करता चला जाता रहा
त्याग रूपी वासना स्वयं त्याग रूप में गैर-रूप से रस युक्त रूप बनता ही रहा
रस तो छूटा नहीं था, रस रूप बना रहा
सो केवल ज्ञान ही, हे भव्य जीव; यह रस ऐसा है कि जो कि इस ज्ञान के
द्वारा सब ही रस का नाश होगा! हे भव्य! रस के रस को त्यागने के लिये त्याग
का रस मत जान बैठो। रस तो ज्ञान के रस-रूप भगवान् के रस द्वारा ही
समस्त रस छूटेगा... ॥
सो अब तू विचार कर समझ कर व रस रस को समझ जा! तू रस रस
किसे कह रहा है, आत्मज्ञान के ज्ञान के रस को छोड़ कर अज्ञान रूपी
रस को त्याग समझ कर-के, त्याग रूपी कर्म ज्ञान स्वरूप भगवान् को
अज्ञान स्वरूप भगवान् मत समझ बैठना, रस आत्मज्ञान स्वरूप ज्ञान
का होगा।
ज्ञान तो सदा ही आत्मा का ही हो ही रहा ज्ञान रूप, सदा ज्ञान रूप
आत्मज्ञान सम्यग् दर्शन रूप, ज्ञान का यह सम्यग्दर्शन ही ज्ञान का
स्वरूप या स्वभाव कहा गया है।
समझे? भगवान् का ज्ञान आत्मज्ञान सदा रस स्वरूप होता है, सो
आत्मज्ञान सदा ही ज्ञान स्वरूप आत्मा का ही होवेगा, आत्मा के ही रस
से, यह आत्मा उस ही स्वभाव को ग्रहण कर इस ज्ञान के द्वारा त्याग से परे हो
कर उस रस के त्याग को ज्ञान स्वरूप आत्मा का सम्यग् त्याग करता या आत्मा
स्वभाववान् बनता हुआ निज स्वरूप के रस त्याग के ज्ञान से ज्ञान को प्राप्त
होता हुआ, त्याग को त्याग रूप जान कर त्याग रूप वासना का रस त्याग रूप
में मिटा कर
निज आत्मज्ञान रस रूप को ग्रहण करता हुआ ही यह ज्ञान स्वरूप ही
सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर आत्मज्ञान रूप रस द्वारा ही पूर्ण ज्ञान को
प्राप्त करता हुआ यह जीव केवल ज्ञानी हो सिद्ध पद व पद को, पद के व
स्वरूप को, जो कि ज्ञान का स्वरूप या आत्मज्ञान का रूप कहा गया है
मोक्ष रूप में ही, सो ही ज्ञान स्वरूप का सम्यग् या ज्ञान का त्याग रूप
रस का त्याग कर, सो ज्ञान रूप रस के ज्ञान रूप में त्याग देगा? सो ज्ञान त्याग
रूप तो रस रूप हुआ करता ही कहा गया, त्याग का स्वरूप
181

यह बात विचार करके देखना चाहिये कि सब जगह विद्या रूपी फलवती लता फैली है, पर
उस विद्या का फल सबने नहीं चखा और न तो उसका रस ही जाना। यह तो सबको विदित ही
अनुभवार्थ प्रत्यक्ष सिद्ध विषय है। जब हम सबों को ईश्वर ने ज्ञान, मन और नेत्र दोनों दिये हैं
पश्चात् ईश्वर प्रदत्त उन शक्तियों को काम में न लाना यह तो अपने ही ऊपर एक बड़ा भारी अन्याय है,
कि सब विद्या ईश्वर सब को प्रदान कर सकता पर उसने सब विद्या नहीं दिया, क्यों! जो केवल
ज्ञान का ही सब विद्या सब मनुष्यों को स्वतः प्राप्त हो जाता तब ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं
रहती, पर सो तो न होकर सब विद्या के अभ्यास कराने वाले शिक्षक जन उसने पैदा किये जिनको
प्रथम ज्ञान देकर पश्चात् शिक्षक बनाया ताकि उनसे सब विद्या को सीख सकें? हाँ!
इन शिक्षकों द्वारा विद्या प्राप्त करने पर भी सब मनुष्यों का सब विद्या में एक सा ज्ञान
नहिं, सब शिक्षक विशेष समझ रखते हुए सब शिक्षक ज्ञान-दान सब मनुष्यों को एक सा
देने पर भी शिक्षार्थी सब विद्या समान ग्रहण करने वाले कभी नहीं हो सकते क्योंकि योग्यता का भेद
सबमें समान अधिकार न होने से सब एक से कभी नहिं हो सकते। अतः जब परमात्माने
विद्या रूप फलवती लताको सर्वत्र फैलाया! उसका आस्वादन सब कोई भिन्न भिन्न ले, कोई
रस, कोई फल, कोई छिलका, कोई पत्ता, कोई जड़ ही अपने ज्ञानके अनुसार ग्रहण करे इस में वृक्ष वा लगाने
वालेका क्या दोष।
सो विचार करके, प्रत्येक जनको यत्न करना ही चाहिये कि उस फल का आस्वादन पूर्णतया करके
पूर्णानन्द का उपभोग किया करे नहिं तो कोई कहेगा कि वृक्षपर अमृतफल लगा पर हमको केवल
खटासका अनुभव हुआ इसलिये उस वृक्षपर फल नहीं था अथवा यदि था तो खटास भरा था।
ऐसा कहना सर्वथा उन लोगोंका ही दोष समझा जायगा क्योंकि वृक्षपर लगे अमृतफल को जो खट्टा
कहे वह महामूर्ख है। विद्या-रूपी कल्पतरू संसारमें लगा हुआ सब को फल देता है।
इसपर अपने कर्मके अनुसार सब मनुष्यों को ज्ञानका फल प्राप्त होता जो कि नाना प्रकार
का देखा जाता। किसीको कम ज्ञान हुआ और किसीको अधिक यह सब उसके पुरुषार्थ का फल है
इसमें ईश्वरपर दोष नहीं दिया जा सकता। कोई कहे कि ईश्वरने जब सब कुछ रचा है तब उसने
सबमें पूर्ण विद्याका प्रकाश क्यों नहीं किया और सबोंको ज्ञानी क्यों नहीं बनाया? जो सबको
पूर्ण ज्ञान देकर सृष्टि करता तो संसारका समस्त कार्य चलना दुष्कर हो जाता। सब कोई एक
सा कर्म करते हुए कोई किसी का कार्य न करता और संसारकी समस्त लीला बन्द हो जाती।
इस लिये सब मनुष्यों को अपने २ कर्मानुसार भिन्न २ ज्ञानका प्रकाश हुआ करता है।
जो संसारमें विद्यारूपी महावृक्षको सब फल दिये हैं सो सांसारिक व्यवहारमें
उपयुक्त होने के लिये उन फलों में कुछ खटास कुछ मिठास कुछ चरपराहट सब मिलाया हुआ
है। इस से सब संसारी जनोंको अपना २ फल प्राप्त होकर "रस" प्राप्त होता है। जब तक संसारमें रहना
पड़े, तब तक विद्यारूपी वृक्षके फलका रस भोग करते हुए संसारके सब कामोंको करना चाहिये,
पर जब संसार विषयक सब कार्योंसे मन उपरामता पावेगा, तब फिर उस ज्ञानरूपी
अमृत फलको चखना होगा।
इस अमृतरस पानेके, पश्चात् संसारी सुख दुःखका लेश भी बाकी नहीं रहता।
उस समय सर्वथा अपने आत्माका प्रकाश चारों ओर ज्ञानरूप होकर संसारके सब पदार्थों में
प्रकाशित रहता है। जिस आनंदका प्रकाश अनुभव रूप होकर उस अवस्था में मनुष्य देखता
है। उस समय सब संशय दूर होकर अविद्या-रूपी अंधकारका नाश होजाता है। इस अमृतरूपी फल
का ऐसा माहात्म्य है जिसको पाकर मनुष्य कृत-कृत्य होता है! उस फलका रस जब तक नहीं
मिलता तबतक, संसारके झूठे फलोंके रसमें चित्त मग्न रहकर विषय वासनामें भटकता है। सो प्रत्येक
मनुष्यका यह धर्म है, विद्यारूपी महावृक्ष के जिस फलको खाकर फिर तृषाका लेश न रहे उस
ज्ञान-रूपी फलको यत्नसे प्राप्त करनेका यत्न करे, उस अमृतरूपी फलको जो चाखता है, वही
संसारी दुःखों से मुक्त होता है!
यद्यपि संसार में, विद्या की प्राप्ति सबके लिये समान रीति से सर्वत्र सुलभ नहीं होती
तथापि बाल्यकाल में सब कोई अवश्य ही, विद्या अध्ययनाधिकार को प्राप्त होते हैं।
पश्चात् आगे २ अभ्यास से सब विद्याओं की प्राप्ति होती जाती है। किन्तु भाग्य की
मन्दतासे विद्याध्ययन में विघ्न आ उपस्थित होता है।
"प्रारब्ध कर्मणां भोगात् क्षयेणैव प्रमुच्यते।"
इस शास्त्रोक्त वचन के अनुसार प्रारब्धका भोगना तो अवश्य सम्भव ही है पर यदि
यत्न किया जाय, तो प्रारब्ध मन्दता रूप अन्धकारको हटाकर ज्ञान रूपी सूर्यका प्रकाश अवश्य प्रकाशित
होता है। तब फिर भाग्यका रोना रोना नाहक है। ऐसा विचारकर सब प्रकारके विघ्नोंको दूर करने
का सतत यत्न करना ही परम पुरुषार्थ है।
इस लिये प्रत्येक मनुष्यको बाल्य ही से यत्न करना चाहिये कि जिस प्रकार हो सके
विद्याध्ययन अवश्य किया जाय। क्योंकि विद्याहीन मनुष्य केवल मनुष्य नहीं वरंच प्रत्यक्ष पशु
तुल्य मानागया है! इस पर किसी ने कहा है, यथा पाठ नीचे लिखा जाता है!
182

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इस पृष्ठ में फ़ॉन्ट (Font) लोड न होने अथवा फ़ॉन्ट करप्शन (Font missing/tofu glyphs) के कारण देवनागरी के सभी अक्षर आयताकार बक्सों (rectangles/boxes - □) के रूप में दिख रहे हैं। केवल विराम चिह्न (जैसे ,, !, ?, ", --) और पृष्ठ संख्या 184 ही दिखाई दे रहे हैं।

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The text in the image is corrupted due to missing/unembedded fonts, rendering the Devanagari characters as glyph boxes (□). Below is the line-by-line representation of the visible content:

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The provided image contains text where the font has failed to render, resulting in missing glyphs (tofu boxes ▯) throughout the entire page, with only punctuation marks, symbols, and the page number intact:

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188

भगवान्‌ को यह बात सब पता चली तो, उनहोंने विचार करके अर्जुन को कह
दिया होगा देखकर आ, तो वो सब गये तो उसने बताया कि ऐसा अजब कौतुक था,
कि वो सब सब तो तालाब से सब अलग पानी पीतेथे, अलग-२ भी, कभी दो
इकट्ठे भी हो, पर जो सब एक ही घटमें आतेथे तो वो सब ३ इकट्ठे
बैठते नहीं थे सब, महाराजा ने सब बात को सुन कर कहा ऐसा
होगा कि कलिजुग में सब एक ही नांव के नीचे बैठेंगे पर वो सब न्यारे,
बिराने से होकर बैठेंगे कोई किसी की नहीं सुनेगा
तब उसने पूछा ३ बाणों के बारे में, उसने तो जितने निशाने बांधे सब खाली
गये, सिर्फ एक लगा जिससे बबूल गिरा तो महाराज बोले जितने भी
निशाने बांधे वो तो सब संसार रूपी निशाने थे पर वो काम नहीं आये पर, एक
निशाने जो प्रभु नाम का लगा वो काम कर गया क्योंकि वो, कभी खाली
नहीं जाता प्रभु नाम का किया हुआ सिमरन व्यर्थ नहीं जाता
सो वो सब समझदार थे सब वो भी थे जो सब बातों को समझ
गये पर हम लोग बातें सुनते जरूर हैं पर मन में नहीं उतारते जिसका कारण
हम वो बातें भूल जाते हैं, क्योंकि मन में और बातें जो, हम सब सांसारिक
बातें ज्यादा भर के रखते हैं, सो जिस बात को ज्यादा भरेंगे वो, ही याद
रहेगी या प्रभु का नाम याद रहेगा या फिर सब काम काज याद या सब संसार
याद रहेगा, प्रभु का नाम याद रखना नाम सिमरना मुश्किल नहीं, नाम जपना
कोई देर का काम नहीं सिर्फ, भाव से बैठ कर प्रभु नाम में मन लगाना
है
महाराज त्रिलोचन प्रसाद जी, परमार्थप्रकाश, परमात्मानंदजी तीनों संत
एक ही गुरु भाई थे और सब एक ही रास्ते पर चलते थे पर जैसा प्यार संत--
महात्माओं जैसा होना चाहिये
वो संत कहते थे, सब को ऐसा प्यार था कि जैसा एक रूप हो या
ऐसा भाव दोनों तरफ, प्रेम-प्यार सब को, सब काम ही ऐसा मन लगा
कर करते थे
जैसे कहा गया, "एक से दो भले, दो से भले चार"
पर यहां पर तो सभी का एक भाव था
ऐसा होना बहुत बड़ी बात होती है
सब एक ही तो काम कर रहे थे, सो जो कुछ भी वो कर रहे, वो सिर्फ प्यार
ही प्यार था सब में, सब का सब को सुख देनेवाले थे सो प्रेम-प्यार से
ही सब, सब कुछ करते
सो ऐसा ही होना चाहिये था, पर जैसा सोचा था, वो वैसा नजर न आया तो
देखा कि अब ३ का क्या फैसला निकलता १ बैठा विचार में लीन मन को प्रभु
के २ बैठा देख रहा था कुछ देर बैठ कर, कुछ विचारने के बाद वो भी
निकला... २ निकला... ३ तो बैठा समाधि लगा के, वो सोचता कि कोई न छेड़े;
वो समाधि में मस्त था सो बैठ
सो वो चला ही गया था, सो वो संत शांत रहकर सब नजारे को देखता, तीसरा
फिर खड़ा हुआ वो सोच, कि जो ज्ञानवान्‌ थे वो प्रेम-प्यार से
अलग ही बैठा था, प्रभु का नाम तो सिमरन ही रूप से किया
"जो प्रभु का नाम जपते सिर्फ वो ही नहीं, जो प्रेम प्यार बांटते वो भी
प्रभु के प्रिय कहलाते"
सो वो सब संत परमात्मा के रास्ते ऊपर चलते महापुरुष
प्रभु परमात्मा के सब रूप ज्ञान से वो सब कुछ समझ गये, प्रभु के नाम रूप
अमृत रस, जो वो सब प्रभु से मांग रहेथे वो सब कुछ
उसके पास ही था, महाराज केवलानंद जी सब कुछ देख रहेथे
सब कुछ जानते सब कुछ समझ रहे थे उस प्रेम-प्यार, त्याग-वैराग्य भाव को देख
कर मन बहुत खुश हुआ पर बाहर कुछ न बोले कुछ शांत भाव बैठे देख रहेथे
वो सब कुछ देख रहे, पर वो अंतर्यामी सब कुछ जानते
विचार कर रहे, वो सिर्फ देख, सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने कोई दखल न दिया,
इसलिए सिर्फ सब कुछ देखते ही रहे ताकि किसी दूसरे को, किसी बात
पर कोई ऐतराज न हो-सो वो सब कुछ देख कर किसी तरह का दखल नदेकर
अपनी मौज में मस्त-मगन होकर केवल केवल प्रभु नाम सिमरन में लीन होकर
ही आनंद प्राप्त करने लगे
189

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॥ श्री भिक्षु यशोवर्मा ॥
चौथा खण्ड
भिक्षु पद सन् देश वास प्रकाश

ढाल 27
नर भव पायो रे नर भाव लीधो फिर मन कीधो
साँचो गुरु सिर धार्यो सुद्ध आराधियो।
साँचो ज्ञान लयो भ्रम तज्यो सम्यग् दर्श पायो
चारित निर्मल पाल्यो परभव सुध साध्यो॥
धरम दलाली कीधी संजम हेत रो।
साँचो माल दिवायो जग रो तारवो॥
गुण रो भण्डार भरयो अकल अपार थई।
सम कित पायो थारो धरम सुधायो॥
संयम पाल्यो समकित धार्यो भव जल तार्यो।
पायो नाम अमर जग माँहि सुहावणो॥
भारी करम खपाया मुक्ति सिधारिया।
सुख सम्पत्ति पाई ज्ञान उजागर भाख्यो॥
भव भव सुख पायो शिव मग साध्यो।
चउदस दिन दिन उदयो ज्ञान प्रकाश भलो।
जग माँहि जस पायो नाम अमर थयो शिव सुख
ज्ञान दियो जग माहिँ न कोई उपमा थारो उपगार।
सुद्ध मार्ग दर्शायो भव जल तार्यो॥
वर वो नाम लयो नहिं भूलूँ थारो उपगार।
जग सिर ताज अमर सुद्ध साध्यो मार्ग मोक्ष।
नाम अमर सिर ताज सुख दायक जग रो तारक।
नर भव पायो सार सुख सम्पति न कोई भूलूँ।
श्री भीखमजी साता पायो साता पद पायो॥

इन ढालाँ द्वारा यह भी स्पष्ट ज्ञात होता है कि स्वामी जी केवल ज्ञान की खोज में नहीं निकले
अपितु-उनका तो विचार यहाँ तक था कि यदि मुझे कोई सच्चा गुरु न मिला तो स्वयं ही संयम ग्रहण
न करुँगा पर किसी को अपना गुरु मानकर या धोखा देकर अपना जीवन नष्ट नहीं करुँगा, ऐसा मेरा
दृढ निश्चय उन्होंने जीवन के प्रारम्भिक दिनों में किया था।

सत्य की खोज करना अथवा किसी भी बात को समझना और तत्पश्चात्-उस तथ्य-पूर्ण वस्तु
को ग्रहण या न ग्रहण करना यह व्यक्ति की प्रकृति-का एक अङ्ग बनकर रहता ही है। पर जब
इस बात का पता लग जाय कि अमुक वस्तु अथवा विचार में दोष, पाप या फिर किसी प्रकार
हानि की बात नहीं, तो उस पर दृढ़ हो जाना ही विचार शील व्यक्ति का कर्त्तव्य समझा
जाता है। इस बात की सत्यता की भी परख हो जाती है। यह बात भी केवल समझ की दृष्टि तक
ही परिमित-नहीं रहती वरन् जीवन के आचरण में उस सत्य निष्ठा का प्रभाव स्पष्ट रूप से
नजर आने लगता है। स्वामी जी का रुख भी कुछ इसी प्रकार का था। उनका जीवन जहाँ
सत्य के प्रति पूर्ण सजग था वहाँ सत्य को कार्य-रूप में परिणत करना उनका प्रथम
लक्ष्य था। इसके अतिरिक्त जीवन को सुखी बनाने का उनका विचार भी इससे जुड़ा हुआ
दिखाई पड़ता है।

स्वामी जी का यह कथन कितना स्पष्ट है कि जो कार्य करूँगा, निष्पक्ष भाव से करूँगा
चाहे जो कुछ भी परिणाम निकले मैं सत्य से पीछे नहीं हटूंगा। उनका यही निश्चय था।

सत्य-का मार्ग भी तो एक ऐसा ही होता है जिससे मनुष्य अपने लक्ष्य तक पहुँच
ही जाता है। केवल उस रास्ते पर चलने की क्षमता ही मनुष्य को सफलता प्रदान करने में समर्थ होती है।
सत्य-का मार्ग चाहे कितना ही टेढ़ा, पथरीला क्यों न हो, एक बार उस पर चलने के पश्चात् विजय
निश्चित है।

इसी प्रकार, यह बात उनके लिए पूर्ण रूप से लागू हो सकती है। जिन्होंने सत्य
के मार्ग पर कदम रख कर यह स्पष्ट कर दिया था कि वे अपने पथ से डिगने वाले नहीं थे।
इस प्रकार उनका जीवन यह संदेश दे रहा था कि सत्य को पहचानो, उस पर दृढ़ रहो।

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यह आत्मा ज्ञान का एक ज्ञायक स्वभाव धारण करता हुआ सब पर द्रव्यों के संयोग रूपी विभाव पर्यायों द्वार से रहित होता हुआ केवल स्व स्वभाव को उपलब्ध होता
जिस प्रकार यह आत्मा पहले था, उस प्रकार का अब ज्ञान रूपी आत्मद्रव्य पर्याय सहित ही अब प्राप्त हुआ, अर्थात् अपने स्वभाव स्वरूप स्थित हुआ।
किन्तु यह बात तब तक ही संभवित हो सकतीहै जब तक सम्यक्त्व पूर्वक सम्यक् रूप परिणत आत्मा हो, जो पर द्रव्य पर्याय रूप हो कर मिथ्या श्रद्धान करता हुआ पर द्रव्य पर्यायरूप ही अपने को मान रहा अथवा पर द्रव्यों के निमित्त से आत्मन्‌को कोई भी विकार आदि पर्यायें हो उन्हें अपना स्वरूप मान रहा वह तो अज्ञानी जीव जब तक ऐसा भाव रखता तब तक वह अनन्त-संसारी हुआ सदा काल संसार रूपी दुःख को ही भोगेगा जिस को सर्वज्ञ देवों द्वारा कहे हुए के अनुसार यह श्रद्धा नहीं कि मैं शुद्ध आत्मा हूँ केवल, सो मिथ्यात्वी जीव अनादिकाल पर्यायों संग भ्रमण करता रहेगा।
अब यह बतलाते हुए समाधान करते हुए कहते हैं कि ऐसा विचार कभी नहीं करना योग्य कि मैं ज्ञानी हूँ, अब जो कुछ भी, सब कुछ सर्व कर्मों को नष्ट कर ही दूंगा सो, इस प्रकार बिना ज्ञान सम्यक्त्व धारण किए हुए ही केवल मात्र अपनी इच्छा रूपी परिणति करके कभी कोई कर्म नष्ट नहीं हो सकते और न कभी मोक्ष की सिद्धि प्राप्त
एक समय किसी सेठ का एक बेटा, जो कि घर पर बैठा हुवा मुनीमगिरी का काम देखता था सो घर बैठे बैठे विचार करने लगा ६ लाख रुपैयोंका लेन देन तो मेरे हाथ से ही होता, अब मैं भी सौ घर देख कर ऐसा ही करूँगा, यदि दस लाख हाथ में आजावें तो मुनीम क्या मैं तो बड़ा भारी सेठ बन कर बैठूँ सो इस से यह शिक्षा मिलती कि कहने मात्र से कभी काम नहीं होता
कार्य तो उस का करना ही पड़ता ही कथनी मात्र से कार्य नहीं, सो यह जीव कहने को, मन के विचार मात्रसे कर्मों का नाश तो करना चाहे और अपने आत्म स्वरूप ज्ञाता द्रष्टा का तो ध्यान नहीं रखता सदा संसार सम्बन्धी राग द्वेष रूप अज्ञान दशा रूप ही हो रहा; जिस प्रकार मुनीम के मुख कह देने-से वह तो बड़ा सेठ, लाखी अथवा करोड़पति नहीं बन जाता उसी प्रकार इस अज्ञानी को कहने मात्रसे कर्म रूपी पर्वतराजों चूर्ण नहीं हो जा सकते! मुनीमजी तो मुनीमजी ही, सेठजी कहाँ सेठजी स्वयं सेठ, उस प्रकार यथार्थ स्वरूप को जानना चाहिये, केवल मन से कल्पना करके कभी कार्य नहीं होता, अज्ञानियों की तो बात ही निराली है शास्त्रों की बात को समझ-कर ही कहना, सो अज्ञानी जन शास्त्र पढ़ कर भी सदा अज्ञानरूप ही रहते, सो कार्य तो उस स्वरूप में ही लीन हो जाना स्वाध्याय का फल है, न कि केवल मुख से कहना मात्र
कवि का वचन है, " कहनी का कंचन
कथनी से कछु न सरै सो ही जो कहै सो करै।" जिस प्रकार ६ लाख रुपैयों के लेन देन का काम करने वाले मुनीम को यह बात असंभव कि पचास ₹ माह मुनीम को मिलते हों, ६ लाख रुपयों का मालिक कह देवे, ६ लाख का काम तो केवल उस द्वारा कराया गया
तो जिस प्रकार मुनीम के हाथ में करोड़ों का माल रहता हुवा भी वह केवल मुनीम होता है उसी प्रकार से, ज्ञान के निमित्त से राग रूप जो भाव हो उन्हें आत्माका कभी स्वरूप नहीं कहते, किन्तु परद्रव्य भाव जान कर आत्मा उन से भिन्न रहता हुआ कभी उन का कर्त्ता नहीं बनता जो इस भेद विज्ञान रूपी स्थिति को नहीं पहिचानता वह केवल ज्ञानीपने के अभिमान में ही मस्त हुआ अपने को ज्ञानी मान कर ही सर्व कर्मों का नाश करने लग गया सो इस अज्ञानी को उस मुनीम की तरह कभी फल की प्राप्ति नहीं हो सकती अतः अपने अज्ञान भावों को छोड़ सम्यक्त्व का प्रकाश हृदय में करना चाहिये न कि केवल अपने मुंह से कहना कि मैं ज्ञानी हूँ? सो मुनीमपना ही रहेगा वा सेठ बने? वा मुनीमपने का जो फल ६ सो ही मिले?
कहने मात्र का फल तो कभी भी संसार में कहीं भी सफल नहीं होता किन्तु उसी के अनुसार गुण का नाम उस के अनुसार होना चाहिये सो ही सच्चा ज्ञान है, जो इस बात को समझ सम्यक्त्व के बल द्वारा सब पर द्रव्यों भिन्न केवल अपने स्वरूप ही पहचान कर लीन होते हुए सर्व कर्मों का नाश करके मोक्ष को ही प्राप्त! मुनीम कभी सेठ होगा! कभी मुनीम कहला कर तो नहीं होगा!
अब निश्चय सम्यग् दर्शन स्वरूप कहते हैं कि जहां जीव पुद्गलादि द्रव्यों सहित संसार को सर्व रूप छोड़ कर केवल अपने ही आत्म स्वरूप में लीन भाव को शुद्ध सम्यग् दर्शन कहते हैं निश्चय सम्यग् दर्शन व्यवहार के निमित्त से प्रगट होता हुआ निश्चय का स्वरूप बनता सो निश्चय सदा स्वद्रव्य रूप ही होता व्यवहार पराश्रय रूप होता है, सो व्यवहार त्याग कर शुद्ध निश्चय रूप? ज्ञान स्वाध्याय का केवल फल यही
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पृष्ठ संख्या: 193

और जो लोग कहते कि मनुष्य को तो पाप का फल भोग कर नरक से मुक्ति मिल ही जाती होगी?
शायद हो जाय, ऐसा तो किसी ने शास्त्र में कहा? उस काल उस लोक
में, जहां नाना प्रकारकी या तना होती हैं उस में ऐसा ज्ञान या विवेक
मन में उपजेगा कि मैं ऐसा करूंगा? उस काल में, जहां सब प्रकार काल
अंधेरा प्रकाश का नाम नहीं है वहां उस को यह ज्ञान होने लगे कि मुझको
इस पाप फल भोग कर उस लोक में, वा इस लोक में इस प्रकार का काम
करना है? जिस काल में, वा उस काल के उपरान्त जब वह नरक से छूटेगा
फिर उस को, वा जिस प्रकार से कि नरक से उसका पातक कटेगा, उस में उसको
यह ज्ञान वा, वा उस काल पर्यन्त उसको इस बात का ज्ञान रहेगा, वा उस समय उसको
सब बातें चेत रहेंगी कि जिस के करने से, इस बात का ज्ञान उस को हो जायगा,
अथवा जो २ पाप उस ने किये-थे वा जिस २ पातक के कारण उस को नरक भोग
का फल भोग हुआ होगा वा होता रहेगा? इन बातों के उत्तर में
सत्य, सत्य यह उत्तर हो सक्ता, जिस को न्याय से विरोध न हो, क्योंकि
किसी वस्तु विशेष ऽ वा विकार का स्मरण अथवा अभ्यास से बिना कोई ज्ञान
स्मरण वा चेत किसी बात का मनुष्य को हो नहीं सक्ता
जो इस प्रकार न्याय से विचारे सो अवश्य यह जानेगा कि पापी जीव,
अनेक जन्मों तक अज्ञानता और मलिन वासनाओं से युक्त होकर कुयोनि
यों में अथवा नरक में बार बार जन्म ले अवश्य ही भ्रम में भटकता ही रहेगा,
इस लिये पापी जीव को जो जो दुर्गतियां होती हैं उन को सुन कर, जो मनुष्य ऐसा न
करेगा उस का निवारण नहीं, पापी अवश्य घोर नरक
गामी हो कर जन्म जन्मान्तर पर्यन्त क्लेश पाता रहेगा सो नरक के पापी
जीवों अथवा भ्रम युक्त जीवों को परमेश्वर के बिना कौन उधारे? कौन
बचाय! हे ईश्वर तू मुझ को बचा, तू ही दयालु सब का हितकारी और ऽ रक्षक
है! मन, प्राण, तन सब कुछ तेरा ही दिया हुआ सो तू मुझको अपना दास
जान के कृपा दृष्टि कर के सब प्रकार से मेरी रक्षा कर
हे दयानिधान सर्व समर्थ तू मुझको पाप में न गिरने दे--
तू ही दीन बन्धु तू ही सर्व का रक्षक
हे अनाथ नाथ, सब को सुखी कर, परमेश्वर तू ही सब जीवों का हित
है? किस से मैं अपने पापों कहूं? बिना तेरे, हे नाथ संसार भर
सब ही अनाथ बने हैं--
कोई किसी का नहीं सब स्वारथ के
सब ही हैं इस संसार महा भयंकर
हे दीन बन्धु, तू ही नाथ, सब को तू ही कर पार इस भव से?
तू ही एक सब का रक्षक है--
मेरी सुन ले पुकार, तू अनाथों का नाथ परमेश्वर है
तू, जिस अ-विनाशी को सब से बड़ा ही सब से परे सब
संसार महा अंधकार में जिस के तेज से प्रकाशमान है, सत्य,
प्रकाश, जिस का नाम है सो सब के पापों से रहित सत्य रूप
जिस की महिमा का नाम सब वेद शास्त्र गाते हैं उस परमेश्वर
का मन में ध्यान कर
किस लिये, ऐसा सोच किया? चिन्ता किस की? सो स्वामी सब का,
सदा ही सब का, सच्चा स्वामी सब काल
सब का रक्षक, सब प्रकार समर्थ सो सब के पाप से बचा
सक्ता है सो सब काल उस को जप सब के पाप से नाश कर सक्ता
परमेश्वर सब पर दया कर के सब प्रकार का ज्ञान, जो जो पाप से बच
ने का है उस का प्रकाश कर के जीव को पापों से बचा सक्ता, सो
उस का आश्रय ले, सब पापी नरक के क्लेश से छूटेगा
तू सब काल में सब प्रकार दया का सागर
सब पर दया कर सर्व शक्तिमान
सब का सब काल पालन करनहार
सत्य तू, सत्य नारायण, सत्य रूप, सत्य नाम! इस लिये मुझ
को पाप से बचा ले, जिस से फिर मैं नरक का क्लेश न देखूं
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