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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

विभूति को पा सकेगा या विज्ञानालोकित पद पावेगा और, उस समय राजा या प्रजा
हो !
पर केवल इस बात आत्मोत्कर्ष से, या आत्मविकास से काम नहीं चल सकता
विचार से विचार का मेल और सहानुभूति विहीनता का स्थान नहीं पाता अतः न
वैयक्तिक विकास सार्वजनीनता के साथ जब सम्बद्ध हो तभी वह जनो-
पयोगी काम कर सकता तथापि इस बात को भी न तो हम ही अस्वीकार
रूप दिया जा रहा था और न ही इन दोनों में इस बात का ही कुछ विरोध
उपस्थित था केवल उन दोनों के मन में इस बात में मतभेद मात्र दिख रहा था,
सम्भवतः, जो हो सो हो, परन्तु यह बात तो निश्चित रूप से स्पष्ट हो
सकती है कि उस युग तक जन सत्ता का उदय
अपने आप नहीं था, न ही वह अपने बल पर था, न कोई वैसी चेष्टा ही
इधर से हो सकी थी जिससे यह कहा जावे कि जनता ने अपने अधिकार को पा
था, अथवा जन तंत्र
बात ऐसा था, जिसे दो जन नेता सुलझा
या सुलझाने का यत्न कर रहे थे तथा इन दोनों का स्वरूप न
तो एक सा था ही, न जन नेता इस बात बात को ही जन के हित में सोच
कर रहे थे? केवल वे अपने पक्ष को इस दृष्टि से, जिस से उनका ही
मत माना जावे विचार रहे थे और जब यह बात हो गई, जिसे दो
नेता जन के नाम पर जन
का भला कर रहे हों अथवा न कर रहे हों, अतः उस व्यवस्था के
लिए यह तो मानना, स्वाभाविक ही होगा कि जन का बल न तो था,
न था तो इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह एक
साधन अवश्य ही बन गया था और इस बात का प्रमाण भी इस बात
द्वारा हो जाता रहा जिसे हम ने देखा कि व्यवस्था के अनुकूल जन,
जिसे चाहे इधर कर ले या उधर कर ले अथवा जन अपने को जिस ओर
चाहे ले जावे ।
दूसरी बात यह भी थी कि उत्तर-मध्य काल प्रायः सब तरह अशांत
रहा था न केवल-मध्य काल प्रायः सब तरह अशांत ही था जन-मन भी उस काल
में न केवल क्षुब्ध, पर बात ऐसी अवस्था में जन का काम तो न हो कर
ही काम बन रहा था तथा जन का मन ही न तो इस बात के लिए
तत्पर था कि जन अपने रूप को समझे, न यह बात, जिससे जन को लाभ हो
कर सके, प्रत्युत वे तो एक, जो राजनीतिक रूप से अपने हित को ही
सोच रहे थे उनका
अनुगमन ही करते रहे या यों कह लें कि राजनीतिक सत्ता के जन को
बना ही ले रहे थे अथवा, ले ही रहे थे, पर इस बात की भी कोई चिन्ता
नहीं की जा रही थी तथा कोई ऐसा भी यत्न नहीं किया गया था कि
जनता को इस बात का तो बोध दिया ही जावे जिससे? वह उस रूप
को न समझे जो जनता के हित की बात थी; सो वह रूप
विहीन
केवल राजनीतिक ही दृष्टि तक ही सब कुछ सीमित था और यही
राजनीतिक जन सत्ता को जन्म दे, जिस से आगे जन सत्ता का रूप निखरे,
यह सम्भव, जन विहीन सत्ता अपने सीमित स्वरूप को, जिसे जन कहा जा
ही सकता के प्रभाव से परे न होने दिया तथा इस से जन को
इतना लाभ मात्र हो सका कि वे केवल अपने स्वत्व को समझने के लिए
ही जाग सके, जिसे वे जन हित समझ कर ही नहीं रहे बल्कि न तो अपने
हित को समझ सके, न अपना विकास ही कर सके ।
क्या राजनीतिक सत्ता से जन-हित सम्भव है? जन का यह स्वरूप उस काल
तक बना रहा अथवा न रहा? इस पर तो विचार किया ही जाना चाहिए
क्योंकि मध्य कालीन इतिहास के जो पृष्ठ हैं, वे केवल, राजनीतिक ही रहे हैं
जिस जन का, जन सत्ता के पक्ष से सम्बन्ध
व्यवस्था जन आन्दोलन के रूप में तो काम करती रही! व्यवस्था
का भी आधार जन आन्दोलन ही, जिसे जन आन्दोलन न भी कह सकें,
पर उस का रूप तो यही था जिस से जनता को ही लाभ हो या हानि और
105

इस बात सम्भावनाओं पर, विचार तो सब कर रहे थेलेकिन इसका कोई उपाय सो, किसी
पास न थाअथवा किसी उपाय के योग्य नथा
इस परिस्थिति मे भी सब उपस्थित थे, न सब युधिष्ठिर के, न सब
दुर्योधनके पक्ष मेथीउनमे से बहुततो, इन दोनों परिवारों अथवा दो राज
परिवारों के दो अलग होने पर भीनये उभरे उस राज्य के साथ उसी प्रकार जुडे
रहना
का दावा करते आये थे। राज्य इनके भरोसे नहीं था और न ये लोग राज्य के भरोसे जीते।
यह केवल कुछ ऐसा वर्ग था जो अपने को उस समय तक के किसी राजा से भी अधिक,
सम्मानीय पद का धनी
कह रहा था। केवल यही वर्ग था जो दोनों ओर की बात सुन सकता था, दोनों पक्षों
बात सुन कर इन पर प्रभाव डाल कर इन दोनों-को अपने प्रभावकारी निर्णय स्वीकार करने को बाध्यकर
इस विग्रह को टाल सकता था, यदि इनके पास कोई ठोस विकल्प होता।
युधिष्ठिरका रुख तो इस विषय मे स्पष्ट था, वह तो अपना हक
छोडने वाले नही थे।उन्हें इस बात का, जिसे वो अपनी सत्ता का भाग कह रहे थे
की विशेष चिन्ता न थी।वे जानते थेकि इस प्रकार के अधिकार तो उनके
भीष्म पितामह से ले कर तक प्रत्येक पुरुष के पास थे। बस नहीं था
अधिकार तो वह था केवल न्याय का और न्याय का जो निर्णय होता था उस पर
राज्य का विधान काम करता था। यदि युधिष्ठिर केवल राज्य-भाग चाहते तो केवल पाँच
गाँवकी ही माँग कभी न करते। इस प्रकार पाँच गाँवों की माँग करके, वह इस
अधिकार के साथ न्याय विधान स्थापित करने के लिये वचन बद्ध थेऔर यह अधिकार ही
उन्हे प्राप्त "नहीं हुआ!"
यह अधिकार केवल राज्य तक ही सीमित नहीं था या केवल हक तक ही नहीं था।
वास्तव मे तो यह सब उस न्याय की बात थीजिस पर आगे आने वाली सभी पीढि-
योंको अपना जीवन बिताना था। यदि इस समय वे किसी के दबाव मे आ कर पीछे हट
ते, यदि वो न्याय के साथ न खडे हो पाते तो फिर सब कुछ उलट-पुलट हो कर रह
ही जाता, जिसे बचाना ही युधिष्ठिर
न्याय का पर्याय मानते थे, धर्म का सार, जिससे मानव जाति निर्बाध रूप
अपने मार्ग पर बढती, चलती; जिसे सब प्रकार के संशय कभी कोई नया संकट
खडा न कर सकते । वे इस अधिकार, न्याय के साथ थे; इसलिए वे अपने इस
निश्चय पर से कभी न हटते । इस सब के बाद जो कुछ भी था, केवल यह देखना
था, कि कौन उन के साथ था अथवा उन की बात मान कर इस पर चलता
जब कि दुर्योधन का रुख, अपनी महत्वाकांक्षा तथा उन सबोँ का था
जो केवल आज की सत्ता के साथ जुडे रहने को ही अपना धर्म मान रहे थे और इस
लिए वो राजा की ओर से मिलने वाले हर अन्याय के साथ खडे हो कर अपने
स्वार्थ को ही सब कुछ मान रहे थे।अन्याय की सीमा भी राजा के साथ बँधी
थी, जो वो कहता था, उसी को अपने हित के लिए सब कुछ माना जा रहा था, न किसी
को
प्रकार की भय था या फिर अपनी ओर से कोई नयी बात कहने का साहस
रह गया था।इस प्रकार सत्ता के सहयोगियों का यह रूप आज भी कम या ज्यादा रूप
मे सब को ही हर जगह देखने को मिल सकता है। आज भी, सत्ता के ऐसे
रूप साथ
लगे हुए चाटुकार हर बात पर ताली बजाने को तैयार है! राजा सब कुछइनकी
ही सहायता से करता जाता है, न तो कभी प्रजाकी भलाई का ध्यान, केवल अपनी
और अपनों लाभ अधिक दिखाई पडता है।जिसके परिणाम भयंकर होते जातेहैं,
आज स्थिति ही कुछ ऐसी है! केवल सत्ता चाहिए या फिर धन! इसके बाद सब कुछ
राजा के ही साथ है, राजा केवल धनवानों का राजा है! जो भी हो आज यही बात
सामने आ रही थी, दुर्योधन के इस रुख से प्रत्येक हैरान था, वो भी
जो उसके पक्ष मे खडे थे या उसके दल मे अपने लाभ अथवा भयवश ही शामिल हो रहे
थे। न कोई विचार
केवल अपने लाभ का, अपने यश, अपनी साख, सम्बन्धी बातों तक ही
था, केवल भीष्म को ही इस परिस्थिति का दुख था जो सब के ही थे।लेकिन
इस सबमे? सब का न्याय कहाँ खडा था? आज भीष्म किसी लायक नहीं थे,
जिनका केवल नाम मात्र ही था? सब दुर्योधन के? शक्तिशाली दुर्योधन के साथ
106

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इसका कारण यही था केवल भक्ति द्वारा ही प्रभु प्रसन्न नहीं हो सकतेथे। अतः केवल ज्ञान का
योग भी उनको प्राप्त नहीं करवा सकता क्योंकि इन धारणाओं का विपरीत परिणाम
आगे आ सकता, पर दोनों का सम्मिलित संगम ही प्रभु प्राप्ति का या प्रभु कृपा
प्राप्ति का साधन बन सकता था। अतः, केवल भक्ति का या केवल ज्ञान निष्ठा का पक्ष नहीं
लिया, लेकिन इन दोनों ज्ञान निष्ठा कर्म निष्ठा का समन्वय, दोनों का फल प्रदान
कर दिया गया तथा निष्कर्ष निकाला गया जिसके बिना कर्म निष्ठा भी निष्फल मानी जा
रही थी; पर जिस ज्ञान, सत् चित और आनन्द रूप का स्वरूप प्राप्त नहीं था; पर जिस ज्ञान, उस
ज्ञान विज्ञान का समाधान भी गीता ने स्पष्ट कर दिया था, कि वह ज्ञान
अज्ञान का रूप, केवल उस परमात्मा का अंश रूप, उस ईश्वर का अंश रूप जीवात्मा
का रूप माया का शिकार होकर अपने रूप को भूल जाता है, अहंकारवश उस पर प्रभु कृपा,
उस समय केवल यह जीवात्मा माया का शिकार होकर, उस प्रभु स्वरूप को परमात्मा
का सनातन अविनाशी स्वरूप मान लेता था इसलिए उस परमेश्वर को केवल परमात्मा रूप में,
उस परमात्मा सर्वव्यापी रूप मान कर जब तक वह निष्काम भावना से कर्म नहीं कर सकता
जब तक निष्काम भावना से कर्म नहीं किया जाता था तब निष्काम भावना, ज्ञान निष्ठा का
स्वरूप निष्काम था, वह ज्ञान ही प्रभु का स्वरूपमय ज्ञान था जिसमें केवल अपनी आत्म
निष्ठा केवल उस प्रभु रूप ज्ञान परमात्मा का स्वरूप रूप अहंकार निष्ठा थी। इस
रूप को नष्ट करने का जो परिणाम गीता ने प्रस्तुत कर दिया था वह रूप ही प्रभु का
रूप बन गया था!
गीता के अनुसार यह जीवात्मा ही केवल अहंकार वश, ईश्वर का स्वरूप
मान कर केवल परमात्मा स्वरूप मानकर अपने को सदा अहंकार स्वरूप बना-बैठता था,
जो ईश्वर स्वरूप मानकर अज्ञान रूप से इस माया के कर्म चक्र में चक्कर काटता
अज्ञानता के कारण अपने स्वरूप को खो कर उस ईश्वर के उस शाश्वत स्वरूप को खो, उस
सर्वेश्वर के ही स्वरूप माया, भगवान् के स्वरूप रूप जीवात्मा के स्वरूप को
ईश्वर का सनातन सनातन रूप नहीं मान सकता था।
ज्ञान निष्ठा द्वारा, केवल यह मानकर कर्म निष्ठा का रूप भी यह मान कर
उस ईश्वर स्वरूप मान लिया जाता था, केवल निष्ठा रूप मान कर, स्वयं को ईश्वर
मानकर सब कुछ, न उस प्रभु, न उस परम निष्ठा स्वरूप परमात्मा को ईश्वर मान
कर केवल स्वरूप ही, ज्ञान का रूप माना जा रहा; पर निष्ठा केवल
ईश्वर के स्वरूप रूप ज्ञान को ही केवल स्वरूप मान रही; ज्ञान रूप को निष्ठा
रूप का मान कर ही यह सब कुछ ज्ञान निष्ठा मानी जा रही थी तथा कर्म योग का रूप
केवल निष्काम भावना का रूप निष्काम भावना रूप बन कर ही, उस प्रभु रूप
ईश्वर के स्वरूप को प्राप्त करने के लिये भगवान् ने अर्जुन को सब कुछ रूप में
स्थिर करने का प्रयत्न किया था। अर्जुन, केवल अपनी आत्मा स्वरूप ईश्वर मान रहा था, तथा
वह, विचार भी, जो रूप ज्ञान का माना जायेगा, वह केवल अपने स्वरूप ज्ञान का माना गया
था, जिस ज्ञान के स्वरूप को अर्जुन निष्काम-स्वरूप मान रहा था। केवल अर्जुन ज्ञान
अथवा निष्काम का योग का आधार ज्ञान-स्वरूप मान रहा था पर निष्काम योग
रूप का जो यह समन्वय था निष्काम रूप का निष्काम स्वरूप कर्म निष्ठा का, यह केवल
कर्म योग का ही रूप नहीं, केवल यह ज्ञान निष्ठा का निष्काम स्वरूप, कर्म निष्ठा
निष्काम कर्म योग स्वरूप, इस निष्काम स्वरूप को निष्काम भावना वाला
केवल ही भगवान् का स्वरूप, केवल उस भगवान् के स्वरूप का ज्ञान केवल अपने ज्ञान
रूप स्वरूप तक ही सीमित था तथा वह केवल ईश्वर का रूप नहीं
अतः, ज्ञान निष्ठा और ज्ञानस्वरूप दोनों स्वरूप केवल प्रभु रूप ज्ञान रूप
ही, या प्रभु रूप ज्ञान ज्ञान रूप को केवल परमात्मा स्वरूप मान कर केवल उस परम
ज्ञान स्वरूप ज्ञान-स्वरूप ज्ञान को ईश्वर का रूप या ज्ञान का स्वरूप या
परमात्मा स्वरूप स्वरूप रूप में खो कर ही ईश्वर के ज्ञान को ज्ञान निष्ठा स्वरूप
रूप में मान कर स्थिर रूप निष्ठा को रूप ज्ञान रूप जीवात्मा के स्वरूप निष्ठा
स्वरूप का रूप मान कर स्थिर रूप निष्ठा जीवात्मा के उस ज्ञान को ईश्वर का
स्वरूप
ज्ञान निष्ठा स्वरूप का रूप जब तक ईश्वर के स्वरूप न बने, तब तक वह ज्ञान-
स्वरूप ही बना रहेगा, केवल जीवात्मा के ही स्वरूप ज्ञान को माना गया था
केवल यह रूप न बने, जो रूप उस निष्काम ज्ञान के स्वरूप केवल परमात्मा स्वरूप
का स्वरूप
गीता का सार यही, जिसका रूप ज्ञान का परम निष्ठा स्वरूप निष्काम कर्म स्वरूप
योग केवल परमात्मा स्वरूप ज्ञान बन कर ही प्रभु के ज्ञान रूप का ज्ञान रूप था।
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110

दयानाथजी सबको सन्तुष्ट देखना ही तो चाहते इसलिए उन्होंने कहा, 'जो जो राम-नाम लिखकर भेजिएगा
उन सब को नाम का चोला जरूर मिलेगा चाहे नाम और रूप का कोई विभेद या अधिकार नहो।'
व्यास जी जब नाम लिखाने कार्यालय पहुँचे तो वहां लम्बी लाइन, खचाखच भीड़।
लाइन में ही... कोई-कोई गप्प-शप्पबाजी कर रहे थे कि क्या पता, इन तीन लाख
नामा-क्षरों वाला चोला या फिर किसी अन्य का या यह सब ढकोसला न हो। व्यास जी यह
सब तो समझ देखकर व्यथित हो राम-दरबार गए व प्रार्थना
'प्रभो सब नाम जप तो कर रहे हैं? किन्तु नामाक्षर निष्काम कैसे? क्या सब आपका
ही चोला पाकर तृप्त होना चाहते हैं? भक्तवत्सल कृपा कर इन पर निष्काम कृपा करो? सब नाम
जपकर भवपार हो जायें और अपना यह महायज्ञ सब नाम प्रेमियों का! जहां दयानाथजी
स्वयं भी आ बैठे, भक्तवत्सल कृपा करके पधारो क्योंकि इन लोगों तक यह बात इस रूप
पहुंची जिस रूप को
ना होना उचित था, ना ही या ऐसा भी कह दिया गयाकि दयानाथजी कहो तो, या
अपना ही कोई रूप बनाकर भेज ही दें। अतः उन्होंने जो चोला धारण किया था, पीता-
म्बर वाला, चरण में नूपुर झंकृत, कमरबन्द वाला, कलाई में हार शोभित चन्दन,
की सुगन्ध बिखरता हुआ भक्तवत्सल श्याम रूप को उन सब लोगों ने देखा तो साक्षात्
रूप में, पर वह रूप विलीन हो गया सब लोग विस्मय विमुग्ध होकर स्तब्ध रह गए!
व्यास दयानाथ को देखो! चोला तो वो चोला! सब को दयानाथ को साक्षात् प्रणाम हो
रहा था।
व्यास कहने लगे, क्या देखा सबने? वो चोला सिर्फ दो चार नाम वाले नामा
रूपी का नहीं रूप होता, दयानाथ का स्वरूप तो स्वयं चोला रूप।
सब स्तब्ध, दयानाथ जी की साक्षात् लीला को देख सब प्रेम भाव विभोर
होकर अब राम नामा-क्षर स्वरूप में लीन थे।
"भगवान का रूप चोला धारण होगा? या वो जन-मन निष्काम चोला ही तो ना
था!"
सब को दयानाथ भक्त के रूप में, जो कोई रूप देख रहा था, सब अपने
अनुसार? पर वो रूप सब सबको चोला रूप से परे था, उस स्वरूप का कोई चोला
रूप नहीं दयानाथ तो भक्तवत्सल रूप में दयानाथजी जन के बीच स्वयं ही आ गए
थे, पर सब चोला खोज
"जो खोज रहा था वो तो मिला ही"
हर कोई प्रसन्न, उस रूप को देख कर सब रूप लीन व्यास जी दयानाथ और
भगवान रूप ही के अन्तर्यामी स्वरूप को जान उनका जो रूप था चोला के रूप
स्वरूप से, उस रूप को देखना सब के ही भाग्यवान हो जाने का पर्याय
स्वरूप दयानाथ के अन्तर्यामी स्वरूप व्यासजी जनमानस के बीच स्वयं
स्थित हो स्वयं स्वरूप को जो देख पाते, उस रूप रूप का सब चोला रूप ही
चोला रूप हो गया था, चोला क्या! वो तो चोला से परे चोला रूप से परे चोला रूप से
परे दया-धाम ही तो जो दयामय रूप--
"वो रूप स्वयं रूप चोला था पर चोला से दयामय था"
सब को यह रूप देख कर चोला का जो भ्रम बना हुआ था चोला का होना
ना रूप से निष्ठा पर सब रूप में लीन, सब उस रूप में लीन हो जाना चाहिए?
उस रूप को स्वयं देखना सब का लक्ष्य था? चोला तो वो चोला रूप, चोला स्वरूप
सब स्वयं स्वरूप में लीन था?
चोला का चोला रूप चोला ही तो सब जन का, तो वो ना रूप--का चोला चोला
रूप रूप था।
पर चोला रूप जन दयानाथ का रूप स्वरूप दयामय।
सब के ही चोला को चोला से सब जन जोड़ रहे, चोला तो सब दयामय ही
रूप रहा था, सब चोला रूप, वो ही चोला रूप--का चोला का चोला रूप दयामय
स्वरूप हो गया, चोला चोला स्वरूप हो! सब लोग उस चोला रूप दयानाथ
भक्तवत्सल रूप स्वयं स्वरूप दयामय सब चोला के रूप में स्वयं चोला बन गए,
जो वो चोला रूप बन गए? या वो चोला ही बन गए स्वयं?
दयानाथ का चोला स्वरूप ही सब का रूप चोला बन गया रूप में चोला
का रूप चोला ही तो सब दयामय रूप दयामय ही तो हो गए चोला चोला रूप में
लीन? वो तो चोला ही बन गए? चोला स्वरूप ही तो सब रूप चोला का चोला हो,
पर वो सब तो, चोला रूप चोला रूप में ही चोला चोला रूप को चोला रूप से,
चोला रूप चोला रूप में तो सब चोला रूप चोला को सब रूप सब का रूप चोला
111

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112

छठे दिवस कथा का विश्राम

॥ श्री रामचरित मानस ॥
अयोध्या काण्डम्
छठे दिवस कथा का विश्राम

दोहा 17
भरतहि सोचु नृपहि कृत कीन्ह विरंचि प्रपंचु
पात पात फल फलहिं तरु कीन्ह सत्य निज नेम॥
सानुज भरतु समेत सब परिछन मातु समेत
भोरहिं भोरहिं भरतु बहोरी निज कुल रीति बिचारि
परिछत सब निज चरणन लागन कहि सब सादर
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

दोहा 18
भरत सो सोच नृपहि कृत कीन्ह बिपुल
सब विधि सब विधि भाइ सों कीन्ह बिधाता बाम
परिहरि सब जंजाल परिहरि सबहिं सनेह
कहत भरत सब सों दुख भारी कीन्ह बिधाता बाम
"तात" तात कहि बिकल रोवत न सकहिं सम्हारि
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

दोहा 19
कहत सबहिं भरत बिकल रोवत अति भारी
तात तात कहि रोवत भारी
कहत भरत सब सों दुख भारी कीन्ह बिधाता बाम
तात तात कहि रोवत भारी रोवत सब नर नारि
भरतहि सोचु नृपहि कृत कीन्ह बिपुल प्रपंचु
पात पात फल फलहिं तरु कीन्ह सत्य निज नेम॥
परिछत सब निज चरणन लागन कहि सब सादर
सो सुनि सानुज भरत तब चरणनि पर सिरु नाइ॥

भरत जी विचार करते-करते व्याकुल होकर गिरते पड़े! तात! तात! तात! सब कुछ तो
गया! जिस पर इतना भरोसा था? वो कैकेयी जिसने ही प्राण ले ली उस की,
जिसको मर्यादा का ज्ञान था। जिस कुल में? उस कुल को खा गई? जिस
पर मान था सब कुछ छोड़कर, सब पर भारी पड़ा! उस पर प्राण त्यागे! तो
उस समय राम व लक्ष्मण, वो समय ऐसा आया कि उस समय राम भी न मिले
प्रभु भी चले गये और वो भी चले गये। जिस पर भरोसा था? उस कुल का
जो सिर मौर्य था समाप्त हो गया? भरत जी कहते हैं रोते-रोते, जब तक यह
विश्वामित्र...? सब तो समाप्त करके ही दम लेंगे जो विधाता का विधान था
ऐसा क्यों हुआ? इसके बाद
भरत जी उठते हैं और रोते हुए पिता को देखते हैं और अपने को धिक्कारने
लगते हैं और कहते हैं, हे मेरे प्रभु, हे मेरे तात, आपने सत्य को मान देकर अपनी
प्राण प्रतिष्ठा-प्रतिज्ञा को पूरा किया और अपने को मुक्त कर दिया और मुझे
इस भव सागर में छोड़ दिया, हे कैकेयी माता तुमने ऐसा, जिसका फल जीवन
भर मुझे भोगना पड़ेगा, कभी नहीं सोचा? वो अपनी कुल मर्यादा को भूल
"अयोध्या का सुख भोगने वाली-कैकेयी जिसके कारण सारा साम्राज्य
कलंकित हुआ जिसका कारण सिर्फ वो कैकेयी थी जो सब कुछ जान बूझ
करके भी चुप, अपने स्वार्थ के सामने सब कुछ कुर्बान कर दिया, वो
यह भी न सोच सकी कि इस सबके पीछे कितना बड़ा अनर्थ होगा, कैकेयी तूने
मुझे कलंकित कर दिया, वो विश्वामित्र के कुलघातक को सब कुछ दिया जिसे
मैंने अपना माना, वो ही मेरे लिए काल बनकर आया"
आज सब कुछ? किसे कहूँ? किसको जाकर कहूँ? विश्वामित्र को सब
बताया गया, लेकिन वो सब कुछ तो समाप्त कर चुके थे अब तो केवल
रोना, विलाप सब कुछ रह गया था, लेकिन सिर्फ रो! स्वयं भगवान को पाकर
113

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114

कहावत सुनोगे? कहावत सुनोगे? अरे बाबा शांत वातावरणमें शांति मिलेगी या फिर
होटल जैसे या बाजार जैसी जगहमें या फिर इस तरह मंचपर या फिर इस तरह का कोई शोर-शराबा
होनेवाली जगह पर?
उसने झटपटसे हां, आसपास बैठकर जितने लोग बैठे हुए थे सब का सब ने
एक साथ बोलना प्रारंभ किया या किसी जगह-जगह अपने विचारको एक समय पर ही सब
ने शांत वातावरण में बैठकर बोलने लगा तो शांति से कैसे सुन पाएंगे? फिर उन्होंने क्या
कहा? शांत हो जाओ महाराजजी? फिर जगह-जगह परस्पर वार्तालाप बंद, लेकिन बीच में
अचानक हां, हे प्रभु जी, हे शरण में आए हुए को कभी त्याग देंगे? फिर बोलने का मौका?
यह वचन तो बराबर उस समय चल रहा था जब रामचंद्रजी विभीषण को आश्रय
दे रहे उस समय में विभीषणजी आए थे पर जो इसके सामने खड़ा होकर
बोलता गया और सम्भाषण समाप्त न करते हुए निरंतर
ही अपने इस प्रकारके वातावरण को शांत बनानेके अभिप्रायसे
जो उसने ऐसा कहा तब वहां जितने लोग बैठे थे उनका ध्यान उस ओर चला
गया और सब के सब ने एकदम से शांत होकर अपने कान खड़ेकरके, सुनकर शांत रहो, शांत!
ऐसा एक बार बोलने मात्रसे शांत होकर सब लोग इस प्रकार शांत हो गये मानो कोई जीवित
व्यक्ति वहां पर मौजूद ही नहीं हो ऐसा प्रतीत होता? फिर उन्होंने दो शब्द धीरे--से
बोलना प्रारंभ
किया जिस प्रकार आज दिनमें दो--तीन बजके करीब में? शांत होकर बोला हां, मंदिर का
द्वार खोला; मंदिर का द्वार खोला; तब तक शांत होकर देखने पर सब लोग ने
मंदिर द्वार की तरफ ही देखा, फिर तो भगवान् के सम्भाषणको सुन ही ना सके
और सब लोग न जाने कहां से आए हुए एक भगवान् मूर्ति जैसी देखकर सब लोग
शांत होकर फिर भगवान् के सामने नतमस्तक हुए और कहा, इसके पश्चात महाराजश्री,
आचार्यश्री विद्यासागरजी के ही वचनोंको हम सब लोग सुन न सके
इस संभाषणको हम सब लोग सुन रहे और जब तक शांत ना बैठ पाए तब तक
हां, पर इसके दो दिन पहले की बात याद आ रही थी, इस कारण सब लोग घबराए, उस
समय सब के मन यही चल रहा था कि उस समय न भगवान् की प्रतिमा का दर्शन
होने पाए और नहीं भगवान् के चरणोंमें हम जा पाए न भगवान् रक्षा स्वरूप कुछ कह
पाए या कुछ सुन भी नहीं सके।
अब महाराज इस भगवान् रूपी तन-मन रूपी इस नए भगवान् सम्भाषणको
जन-जन तक प्रचार करने का तो मन ही रहा है? किस वातावरण में रख कर यह
सबको यह बात याद आवे जिससे कि सब लोग यह बात का ध्यान रख सके पाए? तो वो
वक्तागण जो थे उन्होंने, सब को शांत वातावरण का पाठ पढ़ाया जिसका मुख्य
उद्देश्य यह था कि शांत रहकर जिस तरह भगवान् को याद किया, उस प्रकार सब
लोग, शांति को धारण ही करना है, तो मन को तो पहले शांत करना ही होगा, तो
किसी प्रकार चित्त एकाग्रता को प्राप्त करके फिर शांति मिलेगी, उस समय शांत होकर
सभी लोग अपने को संभाल तो रहे थे पर भगवान् स्वरूप वाणीको सब लोग सुनना चाहते थे,
इसलिए सब लोग शांतचित्त होकर बैठे, पर वो सोच रहे थे जिस तरह से भगवान्
प्रतिमा के मुखकमल शांत रहता है उसी प्रकारसे, वो लोग शांत बैठे थे लेकिन, मन
में किसी प्रकारका विचार आ रहा था, कि एकांत में बैठकर ही सारा समाधान संभव हो
सकता है। एकांत ही ऐसा माध्यम बन सकता है, जिससे सब लोग शांतचित्त होकर
ज्ञान की पिपासा को बुझा सकें और ज्ञान प्राप्त करके अपने जीवनको धन्य कर सकें
इस बात को सुनकर सब शांत हो गए।
इस प्रकार जो विचार कर शांति स्थापना का उपदेश आचार्यश्री द्वारा दिया गया
वह सबने बड़े ध्यान पूर्वक सुना था, और सबने इस निर्णय को माना भी, कि वाणी
को, या चित्त वृत्तिको एकाग्र, या शांत रखने से सब समस्याका हल हो सकता तथा
एक बात यह सब लोग जान सके जिससे आत्मा का उद्धार हो, जिससे ज्ञान की वृद्धि हो
सके और मन एकाग्र होकर एक रूप हो सके जिससे, ज्ञानकी धारा, प्रवाहित होकर,
अज्ञानान्धकार दूर हो सके, ऐसा ज्ञान सब लोग, प्राप्त कर सके।
सब लोगोंने शांत हो कर इस प्रकार उपदेशको मनमें भरा, कि सब लोग शांत
हुए।
इसलिए आचार्यश्री हमेशा सब को शांत वातावरणका पाठ जो पढ़ाते उसका प्रभाव
सब लोगों पर बहुत पड़ता था, शांतिका प्रसार हो, वातावरणमें शांति बनी रहे इस प्रकार
की कार्यप्रणालीके द्वारा सब लोग एक ही सूत्रमें बंधकर इस वातावरणको शांत रखने
लगे जिस से, समाज में इस रूप से शांति का विस्तार हो सके, तो यह उचित रहेगा?
115

इस प्रकार जीव का स्वरूप तो आनन्द का भण्डार था जो केवल आनन्दमय स्वरूप रहा, पर
जब वह प्रकृति के संसर्ग काल में आया अथवा प्रकृति का संयोग पाकर वह जो आनन्द का भण्डार था
सो तो सब नष्ट हो गया केवल ज्ञान ही शेष रह गया जिसका नाम आनन्द, जिसको न किसी बात
विद्या ज्ञान का या सुख का या आनन्द ज्ञान रहा परन्तु नाम मात्र का ही शेष रह गया था।
प्रकृति के संसर्ग द्वारा उत्पन्न जो जड़ भाव हुआ सो जीव प्रकृति की ओर आकर्षित हुआ कि
आकर्षित न होकर स्वतंत्र था, न विवश होकर रहा, न परमात्मा परमेश्वर की आज्ञा
द्वारा था, न प्रकृति, न माया, न काल; पर केवल अविद्यामय जड़ प्रभाव व माया शक्ति
द्वारा ही सब कुछ बना तथा जब अविद्या का क्षय हुआ तो अविद्या का सम्बन्ध जीव के साथ जो था सो
सब कुछ नष्ट हो गया था, यह सिद्ध हुआ।
जब तक वह जीव परमात्मा की व्यापक छाया में था तबतक सब व अविद्या परमात्मा
दोनों जड़ चैतन्यात्मक भाव शून्य होते थे जब अविद्या छाया से जीव गिरा तो वह केवल
अविद्यामय ही सब कुछ बना तथा अविद्यामय अथवा माया के भ्रम में पड़ गया जिस कारण
अविद्यामय विवशता अथवा विवशता आत्मिक सुख प्रभाव जीव तथा प्रकृति का सम्बन्ध
अविद्या के भाव-अभाव से ही सब कुछ सिद्ध रहा सो सब कुछ बना यह तो सब ठीक
समझा।
वास्तविकता तो यह सिद्ध हो चुकी जिस आधार पर प्रकृति का सम्बन्ध हो गया था
जब तक ईश्वर व्यापक रहा या सम्बन्ध हो गया था, उसने आनन्द का प्रभाव हीन
कर दिया, उसने प्रकृति तथा जीव के बीच सम्बन्ध जोड़ दिया-जिस प्रकार
चुम्बक--जो लोहे को लोह आकर्षण के समान ही जोड़ देता था तथा सब कुछ था, प्रकृति
का गुण जो प्रभाव-युक्त हो गया, उसने अपने प्रभाव प्रकाश को सब ओर फैला कर जीव--
को इस प्रकार अविद्या आच्छादित कर विकृत कर दिया, सो सब कुछ प्रत्यक्ष सत्य
सब कुछ ज्ञात हो गया अब अविद्या नाश हो जाने पर मोक्ष होता ही जब सब प्रकार
अविद्यामय ही काल रहा?
सो अविद्या का स्वरूप न था, पर जो कुछ उस समय सब कुछ होता रहा सो तो
केवल अविद्या का रूप तो यह न था, केवल इतना भाव, केवल इतना अविद्या
का रूप ही रहा तथा सब अविद्या उपाधियां जड़--भाव-युक्त, सब प्रभाव ही नष्ट
हो गया था जब जीव था, तो भाव-युक्त हो गया था, इसके बाद भाव-हीन सब
कुछ ज्ञान युक्त था व ज्ञान शून्य ही काल के वश में हो विवशता के सब कुछ का
दाता हो या सब कुछ? तो यह तो अविद्या भाव सब ही विद्या से सब कुछ केवल
विद्या युक्त था।
अविद्या का स्वरूप जो था, सो तो सब अविद्या का रूप; केवल अविद्या, केवल
प्रकृति का भाव मात्र था, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं! जो कुछ विद्या युक्त हो
गया, सो ज्ञान द्वारा सब अविद्या का क्षय हो गया सो ज्ञान स्वरूप ही सब कुछ
व्यापक हो कर जो कुछ सब व सब कुछ सत्य अविद्या का, सो तो केवल न व
केवल।
जब ज्ञान स्वरूप सब ओर व सब कुछ सत्य अविद्या का--विद्यामय प्रकाश
का प्रभाव ही सब अविद्या प्रभाव क्षय हो कर सब अविद्या का अविद्या का ही
केवल प्रभाव रहा
अविद्या के सब प्रभाव का नाश हो जाने पर जो कुछ विद्या, केवल सब ही सब
कुछ जो ज्ञान का रूप था सो विद्या का स्वरूप ही काल शून्य रहा?
ज्ञान स्वरूप सब कुछ अविद्या का नाश, परमात्मा के सब ज्ञान व सब का जो
प्रकाश था सब कुछ का सब प्रकाश अविद्या का क्षय था, सब ज्ञान अविद्या का नाश ही
तो ज्ञान का सब रूप था ज्ञान ज्ञान का प्रकाश हो जाने द्वारा ही सब कुछ, अविद्या
सब विद्या का प्रकाश होते ही अविद्या का सब प्रभाव समाप्त हो गया तथा
केवल जो कुछ व ज्ञान का प्रभाव ज्ञान स्वरूप ही सब कुछ स्वरूप अविद्या का, विद्या का
रूप ही सब कुछ प्रकाश ज्ञान विद्या का प्रकाश सब कुछ ज्ञान-युक्त हो रहा व था,
सो न व, केवल जो व जो कुछ सब विद्या का प्रभाव था वह सब प्रभाव सब कुछ
ही व ज्ञान प्रकाश सब ज्ञान विद्या प्रकाश का--ही सो तो अविद्या शून्य, अविद्या
सब विद्या का सब प्रकाश समाप्त किया, पर काल के प्रभाव से सब--ही सब कुछ विद्या
का, अविद्या, का सब प्रभाव जो समाप्त विद्या सब काल का सब ही प्रभाव रहा।
सो अविद्या का तो जो कुछ न प्रभाव व जो ज्ञान का सब था सो अविद्या का
रूप न रहा था, व केवल जो सब कुछ ज्ञान का प्रकाश था सो तो ज्ञान का रूप
केवल, केवल ज्ञान युक्त ही सब कुछ सत्य प्रकाश रहा, केवल ज्ञान-चैतन्यात्मक

116

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117

जब यह समय आया कि वह नन्हीं कस्तूरबा भागी, तब तो काबा जी
चकराये कि अब क्या उपाय हो सकता है? तो, उन्होंने तो हरिकृष्ण बापू जैसे
घर-घर गये, उन्होंने सब उपाय से जी भर दिया तो देखा वैष्णव तो रो रहे हैं।
उनके रोने का कष्ट देखकर तो वैष्णव रोते कभी न थे। बापू
वैष्णव केवल इस वास्ते रो रहे थे कि प्रभु को जो भोग लगा दिया था
वह अब दूसरा भोग जब तक न हो तब तक वह, ठाकुर जी भूखे रहेंगे
सो कष्ट था उन्हें, उधर कस्तूरबा के हाथ से जो हो गया था उसका तो
वह कष्ट भोग रहे थे, तो बापू बोले कि, हे वैष्णव तुम धीरज धरो। भगवान् तो
सब का कष्ट मिटाने वाले हैं। प्रभु का नाम जप करो सब ठीक होगा।
ऐसा कह के चले गये, पर जा के वह प्रभु आगे बैठ गये और प्रभु की आज्ञा
जब हो गई, तो हरिकृष्ण कस्तूरबा के पास गये और बोले कि जाइके क्षमा
मांगो। फिर कस्तूरबा जा के बैठ गई और प्रभु से, हे प्रभु तू तो कृपानिधि
है, कृपा कर कस्तूरबा के सब दोषों को, क्षमा कर कस्तूरबा को दी गई
आज्ञा, फिर जब कस्तूरबा सब विधि जान गई वैष्णवों के भय से डर के
रो रही, कस्तूरबा भगवान् को हाथ जोड़ रक्षक रक्षक कह, फिर प्रभु,
सब जन जान, कृपा करो, भक्तों के स्वांग को भगवान् को जानना, प्रभु तो
सबके घट की जाने।
जब रात बीती और सब ने उठ कर स्नान संध्या किया तो, सो तो बा--
पूजी ने ध्यान में देखा
कि साक्षात् प्रभु कस्तूरबा के गोद स्वरूप विराजते।
सो सब जन उठ कस्तूरबा को प्रणाम करने लगे, सब रो रहे
थे, सब को भय था कि इस मूर्ति रूप में प्रभु रूप होके प्रकट हुये तो
हम से जो बन पड़े सो प्रभु की सेवा में करें, पर सो सब जन रो, के तो
प्रभु बोले कि, तू कृपा कर सब जन पर।
"वैष्णव सब शरण गये, तो वैष्णव रूप प्रभु प्रकट सब को, वैष्णवों
द्वारा अपना यश सब को दिखाया और सब वैष्णव सब को भोग लगा भोग
कराया और वैष्णव जन, जो प्रभु के शरणागत होके सब कुछ करते
वैष्णव रूप प्रभु को भोग लगा आगे वैष्णव रूप प्रभु सब जन को भोग
देकर सब वैष्णव तृप्तता को पा के प्रभु सब जन वैष्णव रूपी प्रभु की
जय जय रूप सब ने उच्चारण किया सब ने वैष्णव रूपी प्रभु के चरण छुए
सब ने जो भोग दिया घर-घर जाकर सब जन सब को प्रभु का भोग सब जन
दिया, सो सब वैष्णव का कल्याण हुआ।"
सो सब जन देख के, कस्तूरबा के, वचन से, वैष्णवों का मान हो,
कस्तूरबा रूपी बा-पू के चरणों में वैष्णव चरणों को वैष्णव रूप मानकर
कस्तूरबा के आगे सब शीश नवा रहे।
बापू जब ध्यान करके उठे सब वैष्णव, जन, कस्तूरबा, सबने अपने
अज्ञान के भाव मिटाके जो कस्तूरबा बा-पू थे, उनके श्री चरणों में साष्टांग
प्रणाम कर सबने अपने अज्ञान को मिटा-कर वैष्णव के जो भाव को समझा
वैष्णव रूप कस्तूरबा को वैष्णव रूप में देख सब वैष्णवों का
कल्याण हुआ सब सब लोग भाव प्रकाश कर प्रभु के नाम का स्मरण कर रहे
और ध्यान धर
रहे कि भगवान् के स्वरूप को जो सब समझ ले उस पर प्रभु कृपा हो
सो सब वैष्णव ने जान कर प्रभु के गुण को गाया; तो इस तरह बापू अपने
गांव को, फिर परिवार के सहित चले आये।
"हे प्रभु हम सब को सन्मति दो।"
हे प्रभु आज हम सब ने कस्तूरबा रूप देखा, हे प्रभु तेरी लीला
सब जन क्या जाने कोई कोई जन जाने व समझे; हे प्रभु सब को तू अपना,
प्रभु का दर्शन सब को मिले जिससे व जाने, हे भगवान्, सब जीवों का
कल्याण कर सब पर दया कर कष्ट मिटा दे सब जीवों को सब कष्ट से छुड़ा
कर सब जीवों को अपने ही नाम का दान देकर अपने चरणों शरण में तू
लीना।
जब बापू सब काम निपटा कर बाहर आंगन में आये तो क्या देखते
हैं कि एक वैष्णव रो रहा था कि अपने अज्ञान से प्रभु को कष्ट दिया
और उस जन का कस्तूरबा ने कष्ट निवारण कर उस पर दया की व प्रभु
118

इसलिए बार-बार समझाया जा रहा-था। संसार में रहकर ही मुक्ति का उपाय ढूँढ लो अन्यथा यह
तन छूटेगा
ताके, फिरि चौरासी न ॥ भाई, नर देहिया का न भरोसा पाछे परिहै काल की
फाँसी पर नर देहिया मिलेगी नहीं। जब तक यह नर देह मिली हुई तब तक अपने लक्ष्य को
तन से लगा लो भाई, नर देहिया फिर नहीं मिलनी है। फिर तो चौरासी की फाँसी में बंध
कर चले ही जाओगे और फिर सब का सब माया के चक्कर में फँसोगे। जो मनुष्य देह मिला
हुआ सब कुछ तो इसी में ही सब कुछ मिल सकता था। जब नर देह ही नहीं तो फिर
क्या? फिर काल चक्र घूमता ही ही ही रहेगा। चौरासी चक्कर लगा ओ!
इस शब्द पर सन्तमत व्याख्याता स्वर्गीय श्री तुलसीदास जी
का कहना बहुत ही सुन्दर व सार युक्त विचारणीय रहताथा-
"जिस मनुष्य रूप को, जिस मनुष्य शरीर जैसी अमूल्य वस्तु को सब ही
शास्त्र ग्रन्थ उत्तम मानते हैं। मन को सब से श्रेष्ठ मान कर मनुष्य को मुक्ति का साधन,
भगवद् का वा परमात्मा प्राप्ति का साधन मान कर साधन का ऐसा अमूल्य नर देह दिया
जिसमें न तो शक्ति की कमी थी और न बुद्धि की। जहाँ मनुष्य अपनी समझ से काम ले सकता
था। जिस देह से परमात्मा को भी वशीभूत कर सकता था। जिस नर देह से ईश्वर को
जाना जाता था और उस नर देह को, जो इतना सब कुछ कर सकता था। बिना किसी
खास उद्देश्य के यों नष्ट समाप्त किया जाय? जरा सा तो सोच देखो, बार-बार चेतावनी
सब सन्त महापुरुषों ने दी कि यह देह, इस देह को ऐसे न गंवाओ।"
बात ठीक, विचार कर सब कुछ किया जा रहा था। जब तक सन्त उपदेश दे रहे थे
समझाते थे, विभिन्न दृष्टान्तों से समझाते सब अपनी समझ लगा रहे थे कि हां,
सन्त ठीक समझा रहे हैं। सन्त रूपी गुरु शिष्य के हृदय रूपी कली को खिलाना
आरम्भ करते हैं। जब तक कली बन्द है, तब तक ज्ञान रूपी पुष्प की महक नहीं आ रही है
पर जब कली खिल जाती है, तो सब ओर महक फैल जाती है। सन्त भी यही चाहते हैं।
सब को, मानव-मात्र को, सब के घट में, सब के हृदय में सतगुरु परमात्मा का ज्ञान
जो प्रकाशित हो तो यह ज्ञान अन्धकार को हर लेता संसार के सब, प्राणी, जन...
॥
सब तो समझ में आनी वाली बातें हैं। समझ सब कुछ सकते हैं। पर फिर भी
ना समझ सा व्यवहार करते हैं। जो बातें मानव को घट रूप दीपक प्रज्वलित कर दी
जाने योग्य बना रही हैं। उन सब का प्रभाव उल्टा क्यों पड़ने लगता? इसका एक
मात्र कारण यह हो सकता है कि, मन का सब कुछ विपरीत
ही दिशा जाना था, मन का क्या भरोसा? इसका क्या विश्वास? मन सब को भर
मायेगा ही। मन का भरोसा ही सब को संसार की ओर खींचता चला गया।
इसका क्या उपाय सोचा जाय जिससे मन को वश में किया जाय? संसार के सब
बन्धन, मन द्वारा बाँधे जा रहे थे। मन के नियन्त्रण के लिए केवल
ही सतगुरु का नाम ही काम
आता देखा गया, पर जब तक जीव सतगुरु वचनों की ओर ध्यान नहीं दे रहा
होता था तब तक समझ में आ भी रहा होता था पर मन विचलित कर देता था।
सन्त गुरु समझा रहे थे कि, सतगुरु का, सन्त-गुरु का ध्यान मन द्वारा
किया जाय। सतगुरु नाम रूपी मन्त्र... का!
जो मन बार बार हर ओर भाग रहा, भटकाव में पड़ भटकता
फिर रहा था उस मन को बाँधने के लिए केवल सतगुरु नाम ही होगा? इसलिए जब
भी मन का ध्यान लगाया जाय तो पूरा-पूरा ध्यान केवल सतगुरु नाम में
पर होना चाहिए। ध्यान की सफलता के लिए ही तो मन को एकाग्र कर सब का
सब कुछ स्मरण किया जाता
केवल नाम का ही स्मरण करने से क्या सफलता मिलेगी? जब तक मन
केवल सतगुरु के ध्यान में एकाग्र न हो जाये? केवल मन को नाम द्वारा साध
कर क्या होगा? मन का क्या स्वरूप? जिसे सब ओर से मोड़
कर मन को केवल नाम रूप मन्त्र में एकाग्र करना पड़ा था।
स्मरण करने के लिए जब सन्त महापुरुषों से प्रश्न किया गया तो
उ त्तर, सन्त-गुरु ने स्पष्ट कर समझाया कि मन विकार रहित होकर
केवल ईश्वर नाम में ही ध्यान लगावे, तो संसार व सब विकारों से छूट
कर, मन का भटकाव सब दूर हो जाता तथा, नाम स्मरण करने
का अवसर आ ता, जिससे मन, सब ओर से हट, केवल परमात्मा का, प्रभु
नाम, रूप का स्मरण ही ध्यान में लाता, जिससे नाम का ही सिमरन हो
119

प्रत्येक पदार्थ अपने अपने स्वरूप कारण सत्ता अन्तःकरण का विषय बना, इसके दो रूप, १ रूप
वह जिसमें वह रहता वा वह १ जिसमें वह रहता अर्थ दोनों का एकही पर दो दो प्रकार
अनुभवगम्य है।
एक रूप तो इसका यह स्वतः सिद्ध वा यह रूप सब समय वर्तमानता से कह कहें
इस रूप से जगत का जो रूप वा रूप दृश्य जगत् उत्पत्ति-स्थिति वा प्रलय रूप यह जो
रूप सोई केवल रूप जगत् कह कह कह सत्य, जगत रूप जगत् का रूप उत्पत्ति-
स्थिति प्रलय का अनुगत ही स्वरूप कह जाता है।
इसमें जो भिन्न रूप वा जो भिन्नता सो दृश्य का रूप प्रत्यक्ष जगत् का जो
स्वरूप सो केवल रूप, केवल रूप जगत का, सो तो परिणामी ही, विकारात्मक
रूप ही सो सदा विकार सहित रूपार्थ में १ रूप सो, जो विकार रूप वह तो रूप सत्य
ही, पर जो रूप है, केवल परिणामी रूप में वह रूप सो, सो विकार रूप
सो रूप मिथ्या, केवल रूप जो रूप सो १ रूप सत्य ही जान पड़ता
वा १ प्रत्यक्ष के रूप सत्यता वा असत्य का निर्णय तो स्वतः ही बुद्धि द्वारा
प्रत्यक्ष हुआ कि?
सो प्रत्यक्ष रूप के सत्य असत्य कार्यकारणता से, जब विचार कर देखिये
स्वतः ही हो जाता कि जगत रूपार्थ सो परिणाम का रूप ही, जो केवल परिणामी है!
पर इस परिणाम का रूप जो सो, सो केवल ज्ञान रूप रूप १ रूप सत्य जान पड़ता
कि सब १ रूप का परिणाम रूप जगत् दृश्य परिणामी उपाधि से भिन्न केवल १
ही जान पड़ता है। कह कह सब जगत् परिणामी वा परिणाम के दो प्रकार
एक केवल सत्य वा सब दृश्य जगत रूप से सो सत्य, सो तो दो प्रकार जान
पड़ा
इत्यादि सब रूप से--इस रूप परिणामी सब जगत् रूप कह कर सो रूप से--इस
रूप विचार रूप, परिणाम स्वरूप विस्तार का निर्णय कह के, जगत् रूप को, सब
जगत् रूप मिथ्या रूप कहा, कह के इस बात को तो दो प्रकार से कह
दिया जगत् का सब रूप रूप का परिणाम
स्वतः सब परिणाम ही परिणामात्मकता को, परिणाम विस्तार रूप से जो दृश्य
जगत् सो तो सत्य ही कहा, जब कि परिणाम ज्ञान रूप कह के सत्य ही
कह कह कह कर कह के कह के कह, पर जो रूप दृश्य जगत् सो तो स्वतः ही वा दो
प्रकार सत्य ही, जो परिणाम के ज्ञान रूप से ज्ञान रूपी जगत् को ही सत्य
प्रकार कह
सत्य जान कर, केवल ज्ञान रूप को, केवल ज्ञान स्वरूप, केवल ज्ञान
रूप को ही जान लिया कि सब सो सब रूप कह कह कर, केवल
ज्ञान ही का रूप रहा कि?
केवल स्वरूप जान कर कह के कह दिया कि? यह ज्ञान केवल रूप जो
सो परिणाम का रूप कह कर कहा, जब कह दिया केवल, केवल ज्ञाना-
त्मकता ही केवल रूप कह गया, तो कह के यह निर्णय हुआ, कि केवल
परिणाम ही तो परिणाम के स्वरूप कह को कह दिया
तदनु; इन सब में परिणाम का स्वरूप यह कह के जो रूप सत्य कहा
सो सत्य ही तो स्वतः ही सत्य रहा, पर दो दो रूप में जो रूप सो सत्य ही
कहा ही, सो परिणाम के दो रूप में से एक रूप तो सब जगत् का केवल
जो रूप सो रूप ज्ञान रूप उपाधि से, सो ज्ञान रूप तो स्वतः सत्य रहा कि?
जब कह, सत्य रूप तो कहा ही, परिणाम परिणाम जान कह दिया ही, पर
रूप तो केवल
ही का रूप रहा जो सब जगत् रूप सो स्वतः सत्य रूप माना ही जाता
जान पड़ा? सो इस प्रकार से तो सब सत्य ही रहा कि? फिर दो परिणाम
कैसा रहा, कैसा रहा? फिर रूप से तो स्वतः जान सब जगत् रूप सो
कहा ही सो सत्य स्वरूप ही तो सब हुआ
पर दो दो रूप कह के तो इस रूप को दो प्रकार से तो कह दिया,
इस प्रकार जगत् के दो स्वरूप, एक रूप तो केवल जगत् रूप सो जो
सो तो सत्य ही, पर दूसरा रूप सो ज्ञान रूप में १ का रूप जो जो सो कहा
सोई सब परिणाम रूप से तो इस रूप में १ रहा, पर यह तो ज्ञान का रूप
जगत् उपाधि के रूप में तो स्वतः ही हो जाता कह के सब में १ रहा,
कह कर के केवल रूप जगत् का इस रूप कह के कह के कह १ रहा, सो
120

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पाँच श्लोकों तक तो इस महाकाव्यके रचनाकालके सम्बन्धरूपमें ग्रन्थ--रचना-उद्देश्यका ही
काव्योचित चमत्कारका प्रतिपादन कर अब ग्रन्थ के प्रारम्भ में जो मङ्गल रूप पद कहा गया था उसकी
व्याख्या की आवश्यकता समझ-बूझकर ग्रन्थकी रचना क्यों, किस प्रयोजन से कीगई,
मङ्गलके पद का क्या भाव हृदय में समाविष्ट था इसका अब वर्णन इस काव्य द्वारा करते हैं।
इस काव्य में जिस पावन चरित्र तथा उस चरित्र के अधिष्ठाता का गुणकीर्तन कियागया है
उस का स्वरूप क्या था तथा वह गुणकीर्तन किसप्रकार कियागया इसपर प्रकाश डाला गया
है, सो कहते हैं कि उस पद के द्वारा केवल इतना मात्र संकेत कर देने परकि 'जिनके द्वारा'
मात्र कह देने से तो काम नहीं चला, सो कैसा स्वरूप उन का था इस बात को स्पष्ट
समझने के लिये यह कहा गया है, सो पहिले अर्थ को समझ लें।
जो भव्य जीव जो भी आत्म या पर का स्वरूप देखते हैं, सो बिना
ही जाने वा, बिना जीवादि के यथार्थ स्वरूप जाने नहीं हो सकता, जिस से
संसार का अन्त हो जाय, ऐसी मुक्ति अवस्था के लिये जो भव्यजीव प्रयत्न--के
पात्र--अधिकारी हैं उनको जो उपदेश या प्रेरणा इस ग्रन्थ द्वारा दी गई है उसका
तात्पर्य ही मोक्षमार्ग को न समझने वाले अज्ञानी जनों के लिये यह ग्रन्थरूपी दीपक है।
ग्रन्थकार को भी मोक्ष पद को प्राप्त करानेवाला सिद्ध हो सके यह भी, कारण ग्रन्थ की
रचना करने में मुख्य तथा प्रधान हेतु समझा जा सकता है। इस प्रकार ग्रन्थ के
निर्माण का जो प्रयोजन, वह भव्य जीवों को सन्मार्ग की ओर ले जाने का साधन रूप सिद्ध
हो यह इस काव्य से, स्पष्ट समझ लिया जासकता है।
सिद्ध-जीवों का स्वरूप तो सब ही शास्त्रों में, कर्म रहित होने से शुद्ध ही
कहा गया है। सो इस पावन स्वरूप का कथन करने वाला ग्रन्थकार कैसा होना चाहिये!
ऐसा ग्रन्थकार भी शुद्ध होना चाहिये तभी वह इस प्रकार का ग्रन्थ लिखेगा! सो उस
ग्रन्थकाररूप पवित्र आत्मा को जो अपने ही स्वरूप का अनुभव कर रहा है ऐसा जो
सम्यग्दृष्टि है उस आत्मा को सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान तो है ही, साथ
ही सम्यक् रूप आचरण भी उसका हो सकता है। यह ग्रन्थ-कर्ता का गुण है।
ग्रन्थ-रचना में, ऐसा यथार्थ-ज्ञान आत्मा युक्त ही हो कर ग्रन्थ को प्रमाण
बना सकता है। जब भव्य जीवों को इस ग्रन्थ का आदर करना हो अथवा इस
ग्रन्थ से लाभ उठाना हो तो इस ग्रन्थकारके स्वरूप का मनन करना बहुत ही
जरूरी बात समझी जाय, सो ग्रन्थ-रचना का जो भी कारण है, भव्य जीवों के
कल्याण की भावना मात्र है, ग्रन्थकार किसी भी लाभ के लिये, चाहे वह ख्याति के
रूप-में प्राप्तहोती हो अथवा द्रव्य के रूपमें मिलती हो, अर्थ-सम्बन्धी
प्राप्ति का ग्रन्थ कर्ता कभी भी अभिलाषी नहीं होसकता। केवल पावन चरित्र
रूप सिद्ध-पद का वर्णन ग्रन्थ-कर्ता ने किया, भव्यजनों को उस
ओर, आत्म-स्वरूप साक्षात्कार करने के लिये, साधन के रूप में,
सिद्ध-पद को प्राप्त हो कर जो सब से बड़े ग्रन्थकार हुए हैं उनका
रूप इस ग्रन्थ में बताया गया है जो कि भगवान् ऋषभदेव थे।
ऋषभ देवने केवल ज्ञान प्राप्तकर, सब ही जीवों के लिये
कल्याण का मार्ग बताया। ज्ञान ही तो आत्माका स्वरूप है, जो सब ही
संसारी जीवों में विद्यमान है। उस ज्ञानात्मक स्वरूप का वर्णन इस ग्रन्थ में
किया गया है, जिसका मनन प्रत्येक मुमुक्षु को करना आवश्यक समझा
गया है--यह सब ही भव्य जीव, जो इस ग्रन्थ को मन-वचन और काय
से पढ़ते हैं वे-भी इस पदके अधिकारी बन जाते हैं।
इस काव्य का भावार्थ यह, कर्मों के विनाश करने वाले पद को प्राप्त
करने के लिये उस पद का स्वरूप तथा उस स्वरूप वाले गुरु का पद सब ही
जीवों को, जो भव्य हैं और जो संसार से पार जाने के लिये उत्सुक हैं
उस पद को प्राप्त कर सकते हैं, इस लिये इस काव्य का आशय यह ही हुआ
समझ लेना चाहिये कि यह ग्रन्थ, मोक्ष को चाहने वाले भव्य
जीवों का, "मोक्ष को देने वाले भगवान् का यह स्वरूप है। उस
स्वरूप को तुम सब मनन करो जिससे, संसार के जन्म और मरणरूपी चक्र से
मुक्ति पा सको।"
यह भाव बतलाते हुए "केवल ज्ञानके इस स्वरूप को प्रकट किया"
ऐसा अर्थ समझना चाहिये।
इस ग्रन्थ-कर्ता ग्रन्थकारने जो कथन किया है, कार्य-रूप कारणका
कथन समझ कर सिद्धान्त रूप में समझ कर ग्रहण तो करना ही चाहिये, पर
केवल उस कथन रूप वचन के बलपर ही मात्र विश्वास कर लेना ही उचित
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