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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

षोडश अध्याय

॥ श्री गणेशाय नमः॥
षोडश अध्याय
अर्जुन उवाच (तीन गुण)
श्लोक 2
अभयं सत्व संशुद्धि ज्ञानं च योगं तथा
दाने दमो च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्
अहिंसा सत्यम् अक्रोधस्त्यागः शान्तिर पैशुनम्
दया भूतेष्वलोलुपत्वं मार्दवं ह्रीरचापलं
तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो न नाति
"मानिता" भवन्ति सम्पदां दैवम् अभिजातस्य भारत
श्लोक 3
तेज क्षमा धृति शौच मद्रोहो नाति मानिता भवन्ति संपदन्दैवी
मभि जातस्य भारत। दम्भो दर्पो भिमानश्च क्रोध पारुष्यमेव
च अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पद मासूरीम्। दैवी
सम्पद विमो क्षाय निबन्ध नाया सुरी मता। मा शुचः सम्पदं
दैवी म भि जातोसि पाण्डव। द्वौ भूत सर्गौ लोकेऽस्मिन्
दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थमे
शृणु॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं "जना" न विदुरासुराः
भारत हे अर्जुन डर का न होना मन की पवित्रता हो, यह ज्ञान का अधिकार
बना रखने के लिये हो, योग स्थिति अर्थात् एक चित्त से ईश्वर चिन्तन का नाम
है, सत मार्ग में या सत पुरुष को अन्न जल वस्त्र आदि से तन सेवा से तन मन धन
सब दान करे, इन्द्रिय दमनशील हों मन को विषय से वश में रखे,
इन्द्रिय दमनशील नाम मनको वशमें करे, यज्ञ, हवन आदि,
विद्या, तप, सत्य से धर्म का पालन करना भगवान के लिये कर्म, निष्काम
का नाम यज्ञ है और न किसी को कष्ट देना मन वचन कर्म से किसी प्राणी
इत्यादि कर्म के विचार करने योग्य, स्वाध्याय, यज्ञानुसार कर्म का ज्ञान हो
वेद विद्या पढे भगवान् नाम स्मरण चित्त में हो, मन वश में रहे ना
ललचाये, दया, दान धर्म आदि कर्म सत्य वचन--सत्य आचरण में
ही रहे, किसी को बुरा-भल अपमानित शब्द मुख से न बोले, यह सब गुण
दैवी
हैं आत्मज्ञान प्राप्त पुरुष को नहीं, जो ज्ञान पथ पर चलकर इन को प्राप्त
कर लेता उस भगवान् भक्त को, अभ्यास रूप फल प्राप्त होता रहता है
जैसे फल वृक्ष को, फल वाले वृक्ष झुककर धरती का सत्कार
करते हैं झुक कर ही, फल मीठा होता... ।
दम्भी पाखण्डी! वेद मार्ग शास्त्र से जो विमुख कर्म करे या बात
बनाकर झूठ बोले या छल कपट से कार्य को साधे और अपने आप को बड़ा
रूप में दिखाये घमण्ड रूप न माने तो, यह अज्ञानता ही एक महा पाप
अज्ञानता ही सब पाप कर्मों की जड मानी गई है यह अज्ञान ही ऐसा रूप
धारण कर लेता है मनुष्य का पतन शीघ्रता से कराता ही रहता है।
क्रोध सब नाश कर देता इस से ज्ञान का, विचार करने योग्य शक्ति
सब मन्द पड जाती है। काम क्रोध लोभ मोह रूपी, असुरी सम्पद्
जीव को कभी सुख से जीने नहीं
ही यह सब काम क्रोध आदि के वशीभूत जीव रहता है, वह
चौरासी लक्ष योनियों में ही भटकता रहता--मनुष्य योनि से भ्रष्ट होकर
इन चौरासी लक्ष योनियों में भटकता हुआ जीव अपने कर्मों के अनुसार चलता
हुआ कष्ट ही पाता है। यह अविद्या व अज्ञान से ग्रस्त रहता हुआ
उस सुख को स्वरूप को प्राप्त नहीं कर पाता, इसी लिये बार बार
चौरासी के इस चक्र चक्कर में फंसा रहता, जो ज्ञान मार्ग का ध्यान करते
हुए इस पर चलकर जीव अपने स्वरूप को प्राप्त कर के उस सुख धाम को
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कहना चाहता था केवल इसके लिये कि जो कुछ तुमको दिया गया था उससे तुम सन्तुष्ट
नहीं हुवे और जो कुछ तुम को मिलाना था उसकी अपेक्षा कुछ और पाने की इच्छा किये जा रहे थे!
तुमने अपने २ कर्मफल को रूप रंग और अपनी शक्ति को परमात्मा द्वारा दिये गये उपहारों को
देखकर सन्तोष क्यों नहीं किया? तुम को किसने रोका था? केवल अपनी तृष्णा को छोड़ और
किसका दोष बताया जायगा? जो तुम रोते फिरते?
इस प्रकार जो जो जीव परमात्मा के नियम के वश होकर जन्म या अन्य दशा को प्राप्त
होतेहैं, वे भी जब तक अपनी स्थिति द्वारा कुछ लाभ नहीं उठा लेते तब तक कोई नया सुख
नहीं पा सकते और नित्य परिस्थिति का रोना, दुःख का रोना ही रोते रहेंगे।
इन उदाहरणों से हम यह परिणाम निकाल सकते हैं, यदि परमात्मा सब को एक
समान बना देता और सब को अपनी इच्छानुसार वस्तु मिल सकती तब भी कभी तृप्ति नहीं
होती, न सन्तोषजनक समय ही आ कर सुख प्राप्त कराता वरन् जो कुछ मिलता
जाता वह सब व्यर्थ होता जाता और नित्य नये रूप रंग व अन्य शक्ति को पाने की भूख
बढ़ती ही जाती जिससे केवल अपने २ रूप रंग शक्ति को संवारने में लगे रहने के सिवा और
कोई काम, न तो हो सकता न किसी अन्य वस्तु का सुख मिल सकता और न सृष्टि चक्र
चलता, न यह भिन्न २ पदार्थ, पशु, पक्षी, मनुष्य, वनस्पति, पाषाण, आदि दिखाई
पड़ते केवल प्रकृति का सुन्दर विस्तार, कुरूप, अन्ध, बहरा, अकर्मण्य बनकर रह जाता और
अन्ततः किसी अन्य सृष्टि के निर्माण के सिवाय अन्य उपाय न रहता
कोई सोच सकताहै कदाचित् ? कि जो जीव रूप रंग बल वैभव को पा चुके हैं
वह सब तृप्तहोकर सुख से अपना समय व्यतीत कर रहे होंगे, कदापि न होगा,
कोई भी तृप्त न होगा, जिसे अपनी इच्छा द्वारा सब कुछ मिल गया, वह उस
नये रूप-रंग को पाकर, तृप्त होने के बदले, और नये रूप, नये बल, नये
सुख की खोज में भटकता फिरेगा, यह सोच समझ कर २ रूपी और सर्वज्ञ
ईश ने।
सब को अपनी अपनी दशा व रूप, रंग बल को देकर सब दशा को भोगने
पर्यन्त सुखी अथवा दुःखी न होकर, अपने कार्य को आगे लेजाते रहने की प्रेरणा
की या आज्ञा, जिसे सब पूरा करते हुवे संसार को आनन्द से भर रहेहैं अन्यथा
सब का सब यह सुन्दर संसार या तो नष्ट हो जाता या निष्प्राण बन जाता या
फिर सब जीवों का मन एक रंग या रूप में रहने से उकता कर नया २ परिवर्तन मांगता
जो कि इस सृष्टि में न होकर इसे अन्य प्रकार के ही नियम-विधान के आधार पर
चलाना।
परमात्मा के प्रत्येक कार्य में ही कोई न कोई रहस्य या भेद छुपा हुआ
अथवा भरा पड़ा रहता है, जिसे सब जीव; जो अपने आप को समझ का पुत समझते
हैं।
जो वास्तविक आनन्द-प्रदायक विभूतियों अथवा साधनों को न पा कर केवल
काल्पनिक सुख मान कर, किसी वस्तु विशेष को ही सब कुछ मान बैठते हैं
अथवा स्वयं अपने को ही सब कुछ मान कर उस परम शक्ति की ओर दृष्टि न
फेर कर जब दुःख पाते, तब उस परम पिता को कोसते हैं अथवा भाग्य को कोस
कर रोते रहते हैं। ऐसा मान कर भी वे अपनी बुद्धि पर कभी विचार नहीं करते,
कि जिस वस्तु, को हम सब कुछ मान रहे थे क्या वह वास्तव में सब कुछ सुख देने
वाली हो गई सिद्ध।
इस सब का केवल यह कारण कि प्रत्येक को जो कुछ दिया वह कर्मानुसार होने
पर भी जीव को अपनी ही कामना द्वारा सब कुछ न मिलने के कारण वह सदा अतृप्त
रह कर उस प्रभु कृत सृष्टि को ही दोष देता है अथवा भगवान् को ही दोषी ठहराने
लगता है। वह यह नहीं सोचता कि जो कुछ
अपने लिये उचित समझ कर दिया है, वह सबप्रकार से उस जीवकेलिए ठीक
ही है और जो जो भी मिला अथवा मिल रहा वह सब भी जीव के भले के लिए
निर्धारित कर परमात्मा ने दिया है उस सर्वव्यापक? जिसने सब विचार कर
व्यवस्थिति करके सब प्रकार जीवोंके हितार्थ ही जो उचित था उस को सब कुछ
अधिकार उस जीव विशेष के हाथ में दिया।
प्रत्येक जीव अपनी इच्छा के अनुकूल सब को वश में रखना और सब कुछ
प्राप्त करने की हर समय चेष्टा करता हुआ अपने आपको सब का कर्ता धर्ता मानकर ही
सब को ही दबाए और मन-माने ढंग से व्यवहार करने लगा था जिससे संसार
व्यवस्था सब क्षत विक्षत हो कर प्रत्येक प्राणी को ही भारी कष्ट, दुःख
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इस प्रकार जब हम अनेक जातियों को अपने भीतर समाविष्ट कर लेते हैं तब हमारा राष्ट्र अधिक
समर्थ होता
पर बात तो यह थी कि यह तो ब्राह्मण द्वारा रचा गया खेल था। उसने स्वयं श्रेष्ठ बनने
के लिए जातियों बनाईं जो कि ऐसा कार्य था जो ईश्वर को भी रोष से भर दे। इसलिए उसने
उनके लिए एक ऐसे मसीहा को भेजा जो इस विषय पर अपने देश भाईयों को सही शिक्षा दे।
स्वामी जी हंस, पर निराशा से सिर हिला दिया। विवस्वान् ने उसे देखा, वे
शान्त थे।
विवस्वान् फिर बोले... ज्ञान के द्वारा ही तो हम सत्य तक पहुँच सकते हैं। क्या
ज्ञान ज्ञान में अंतर हो सकता है? ज्ञान एक दिव्य ज्योति है। यह केवल एक सम्प्रदाय अथवा
जाति तक ही सीमित नहीं रहता। प्रत्येक मानव आत्मा ज्ञान का पात्र बन सकती है। ज्ञान ईश्वर की
सबसे सुन्दर देन है। क्या ईश्वर? प्रकृति सब मनुष्यों? प्रकृति केवल किसी विशेष जाति को
ही ज्ञान देती है। ज्ञान का दीपक तो सब के लिए जलता है। क्या वायु सब के लिए नहीं बहती?
क्या सूर्य केवल?
अब तक उसने ब्राह्मण को केवल घमंडी और स्वार्थी रूप समझा था। ज्ञानवान्
विवस्वान् नम्र थे, विवस्वान् के मुख पर क्रोध का कोई चिह्न न था। विवस्वान् ने कहा
तो सब था, किन्तु उनके स्वर में कटुता नहीं थी। क्या ऐसा ब्राह्मण भी हो सकता है, जो
ब्राह्मणवाद विरोधी विवस्वान् ने आगे कहा
पर बात तो तब बनती जब मैं, या स्वामी जी या अन्य सम्प्रदाय वाले हम सब
वे विवस्वान् की-सी भव्य मूर्ति देखते रहे।
उसने हाथ जोड़ प्रणाम किया व केवल बोला
"ज्ञानियों की वाणी से अज्ञानियों मिटना चाहिये। ज्ञानियों को समझना होगा ज्ञान का दीपक
बुझेगा"
स्वामी जी आगे बढ़ गये। दिन-रात के संगम काल की इस संध्या वेला को
उन्होंने बहुत देखा था, किन्तु आज कुछ विशेष बात
"ज्ञानियों को तो केवल उस सर्वशक्तिमान की पूजा करनी चाहिये जो विश्व रक्षक है।"
उसने हाथ जोड़ प्रणाम किया व केवल बोला
उन्होंने देखा वह विह्वल होकर सिसक
पर यह सब, जो हो तो चुका था उस ओर दृष्टि न कर वह आगे की ओर देख रहा था
वे सन्यासी की ओर बढ़ रहे थे, पर बात तब भी बनती जब स्वामी जी यह मान लेते कि
ज्ञान सब मनुष्यों का, जब केवल ब्राह्मण का ही नहीं सब मानवों का अधिकार है। फिर क्यों
ना ज्ञान रूपी दीपक चारों ओर फैल कर, अंधकार को मार, उजाले से संसार को भर दे।
उसने भी, पर ज्ञान को अपने तक सीमित रखना ही तो सबसे बड़ा पाप है। ज्ञान रूपी
दीपक बुझे; तो केवल यही, कि सम्प्रदाय बने, ना ब्राह्मण बने, ना कोई शूद्र बने, ना
क्षत्रिय रहे।
उसने ब्राह्मण को केवल एक ही रूप में ही देखा था। क्या ब्राह्मण का कोई रूप
और भी हो सकता है, फिर ज्ञान सब मानवों तक कैसे पहुँचे? जो समाज अपने
को सर्वश्रेष्ठ समझ बैठा है वह तो ज्ञान का ही नाश कर रहा है। ज्ञान पर तो
सबका अधिकार होना चाहिये। विवस्वान् की बात पर सोचता हुआ, वह आगे बढ़
गया। वह सोच रहा
उसने कहा मेरा स्थान नहीं ब्राह्मण
उसने केवल प्रणाम... ।
"ज्ञान अन्तः-मन को ही पावन कर देता है।"
वह संध्या कालीन बेला थी जब वह आश्रम-द्वार पर पहुँचा था, जब उसने
ज्ञान रूपी ज्योति जला कर अपने जीवन को पावन बनाने का निश्चय किया था। स्वामी
जी शंख की ध्वनि बजा, संध्या की ओर उन्मुख हुये; अपनी ओर आते हुए उस
को देखकर रूक गये, क्या कोई नया भिक्षु? वह स्वामी और शिष्य के मध्य चुप-
चाप हो उस ओर बढ़ रहा था, पर, स्वामी जी की दृष्टि ने उसे बांध
दिया था। मन ही मन वह नतमस्तक हो गया। स्वामी जी ने देखा वह विह्वल होकर
रोया, उसने स्वामी से कहा, कि वह सब कुछ छोड़ ज्ञान की प्राप्ति के लिए
आया है। विवस्वान् ने कहा, ज्ञान का द्वार सबके लिए खुला
केवल मन निर्मल स्वच्छता की ओर होना चाहिये। स्वामी, जी क्या सन्यासियों
द्वारा ही इस मानव समाज भला हो सकता है। क्या घर रह कर मनुष्य ज्ञान की ओर
ध्यान दे सकता अथवा मन को एकाग्र कर क्या वह ईश्वर को पहचान
सकता है, ज्ञान क्या घर छोड़ना? ज्ञान तो मन का, ज्ञान तो मन की तृष्णा का ही
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विचारो का मथन्न् प्रारंभ होता ही था, किंतु दो तीन मिनट बीतने पर देखा, उसका चेहरा
भी ढीला
चेहरा ढीला, उसकी चोंच कुछ शिथिल सी गिर पड़ी नीचे, पंख संकुचित
होकर नीचे लटकने लग गये—; नीचे सिर, आँखें बंद, उसकी गर्दन ढीली पड़ कर जमीन
पर लेट गयी। उसका सिर ज़रा सा हिला और दम छूँ-छू गया री, बेबस; पल-भर पहले वह,
जिसने उड़ान का दम मारा— जिसने सारे वायुमंडल को नाप लिया—
केवल दो मिनट? यह विस्मित विचार मन में टकराकर खामोश हो गया। सारा
पर्यावरण आश्चर्यचकित स्तब्धता से भर उठा था। एक ओर दो-चार हंस इस प्रकार
चोंच नीचे गिराए खड़े रहे और दूसरी ओर कई जल-पक्षी भी मुंह-बंद से बैठे रहे।
केवल हवा में तरावट आयी, जिसके दो झोंके लहरों पर से होकर हमारे चेहरों तक पहुँचे—
मानों प्रश्न कर रहे हों— क्या? क्या मृत्यु सत्य है? क्या जीवन क्षणभंगुर है? क्या वह हंस
संसार छोड़ गया?
हमारी आँखों में पश्चाताप की भावना भर उठी। मैंने कहा—
पश्चाताप केवल इस बात का था, जिसे हमने सताया था, उसकी हम रक्षा न कर
सके। ऐसा लगा, उस हंस रूपी देवता की हम रक्षा न कर सके, जिन्होंने स्वयं
अपने प्राणों को त्याग कर हमें बचा लिया—; पर क्या बचा? उस दिन
हमारा जो कुछ नष्ट हुआ था वह अब कभी भी नहीं आ सकता था।
पर सब कुछ, सब कुछ नष्ट हो गया; वह सब कुछ जो उस चिड़िया के रूप
में हम पाए हुए थे।
तभी जो हंस, जिसके सिर पर सफेद सी लकीर थी वह आगे बढ़ा और एक
ही छलांग में पानी में कूद पड़ा। उसके कूदने से पानी में जो हलचल हुई वह
शांत हो गई लेकिन झील के मध्य--में जा कर वह हंस रुक गया। उसकी
गर्दन में कुछ मरोड़ सी पैदा हुई और वह जल-पंछी, जो हंसों का मुखिया
जान पड़ता था, आगे बढ़ा और पानी में तैरने लगा। बाकी हंस,
जो किनारे पर थे सब कुछ देख रहे थे लेकिन सभी अवाक खड़े थे।
उसने कहा, "जीवन का सत्य तो परमात्मा द्वारा प्रदान की अनूठी देन
को खो देना नहीं है।"
इसके बाद तो उस जलकुंभी से भरे सरोवर का सारा दृश्य ही बदल गया।
किनारे पर खड़े हंसों ने अपनी चोंच को पानी में डूबोया और पंखों को
फैलाकर तैरना प्रारंभ किया। पानी की धार में उतरने वाले पंछी भी सरोवर
की गहराइयों में तैर गए। इसके बाद वे सभी हंस, जो जल
क्रीड़ा
छू--छू पंछियों का चहकना मन को मोह रहा था। पक्षी तो उड़ रहे थे।
फिर हमें ऐसा क्यों लगा? पक्षी तो कभी बीमार नहीं पड़ते। मनुष्य
क्यों उस पंछी की भांति स्वयं को असहाय बना लेता है?
प्रकृति का ऐसा सुंदर रूप तो किसी की समझ में नहीं आता, फिर
मनुष्य क्यों भागता है? मनुष्य उस हंस जैसा क्यों नहीं बनता
जो अपनी मृत्यु को शांत भाव से स्वीकार करता है?
क्या मनुष्य को नहीं सोचना चाहिए?
मानव समाज का दुर्भाग्य है, मनुष्य उस बात को नहीं समझ सका।
जो समय के महत्व को समझ गया, वह सब कुछ पा गया।
...
वर्तमान में जो कुछ दिखाई देता है वह कल नहीं रहता।
जो समय को पहचान गया वह अपने जीवन में सफल हो गया,
समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जो समय को महत्व नहीं देता
वह कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता।
वह जीवन में सदा ही पछताता रहता है।
इस बात को समझ कर ही हमें आगे बढ़ना चाहिए।
एक बार जो समय बीत गया, वह फिर वापस नहीं आता, अतः अपने
समय का सदुपयोग करना चाहिए।
22

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हम चाहे जितनी भी प्रार्थना करें या तपस्या करें पर इसका फलित होना या अथवा मिलना तभी
संभव होता है, जब प्रार्थना हृदय की गहराइयों तक या तपस्या निष्काम भाव से की जाए।
जब हम समर्पित भाव अपनाते हैं तब हमारी हर बात ईश्वर तक पहुंचती है। प्रभु, यह तो
समर्पण देखना चाहते हैं। इस बात को एक दृष्टांत से इस प्रकार समझें।
एक नगर का यह नियम बना हुआ था कि वहां का राजा केवल पांच वर्ष के लिए बनाया
जाता था। पांच वर्ष राजा रहकर राज्य के सारे ऐश्वर्य भोगने के बाद उस राजा को उस राज्य की
सीमा के उस पार एक बहुत बड़े बीहड़ जंगल में छोड़ दिया जाता था। जहां
घूमते हुए वह राजा अपने अंतिम संस्कार पश्चात अपना जीवन समाप्त करता। इस प्रकार उस देश
में अनेक राजा आए, उन्होंने राज किया, सुख भोगे, पर अंत में सब वहीं पर छोड़ गए। यह
सोचकर कोई भी व्यक्ति उस नगर का राजा नहीं बनना चाहता था। क्योंकि अंततः मृत्यु-लोक जाने
पर अपना सर्वस्व-वैभव सब बिखर जाएगा।
"क्योंकि इस संसार रूपी जंगल में तो अपना कोई भी नहीं होता। जो केवल
सद्कर्मों द्वारा इस संसार में कर्म करता हुआ प्रभु भक्ति करता है वही इस भवसागर से पार उतरता
है, तथा इस पार संसार का सुख-चैन तो विनाशीय पदार्थ मात्र है।"
अंततः एक, दो व्यक्तियों द्वारा आग्रह करने पर एक व्यक्ति ने उस राज्य का राजत्व स्वीकार
कर लिया। नियमानुसार वह सिंहासन पर बैठ गया। उसने उन पांच वर्षों में राज्य का सारा
वैभव भोगा तथा अपने राज्य को विकसित करते हुए एक अत्यंत सुंदर नगर की रचना की, उस
जंगल में जो उस नगर के पार था। उसने वहां पर सुंदर-सुंदर महल, बाग-बगीचे बनवाए।
चारदीवारी का निर्माण करवाया, उस बीहड़ को एक अत्यंत सुंदर और हरा-भरा व सुरक्षित
स्थान बना दिया। पांच वर्ष पूरे हो जाने पर, नए राजा द्वारा विदाईस्वरूप दी गई
विशाल नौका में बैठकर वह उस पार पहुंच गया और अपने बसाए उस नए सुंदर राज्य में सुख
पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।
क्या ऐसा कोई व्यक्ति था वह? नहीं! कोई भी नहीं। केवल कथा रूपी इस संसार में ही
सत्य को जान सका! पर सत्य है कि हम सब भी इस संसार में पांच वर्ष के लिए आए
हैं। हम सब कुछ जानते हुए भी इस बीहड़ जंगल रूपी जीवन को नष्ट कर रहे हैं। ईश्वर
द्वारा दिए गए इस शरीर को जो एक नश्वर वस्त्र की तरह है जिसे एक दिन छोड़ना ही
पड़ेगा। इसके पश्चात हम सब भी उस पार के उस भव-सागर में उतर कर उस बीहड़
जंगल में चले जाएंगे! सत्य यही रहेगा!
उस बीहड़ जंगल में अपना कोई भी नहीं है। वहां केवल प्रभु की भक्ति रूपी,
सत्य निष्ठा रूपी नौका ही इस भवसागर को पार कराने में सहायक बनेगी। यह संसार तो
सराय रूपी है। हम सब यात्री इस सराय में थोड़े दिन रुकेंगे और फिर चल देंगे, इसलिए
जिस प्रकार उस राजा ने अपनी समझ से उस पार की चिंता की, वैसे ही हमें भी
उस बीहड़ संसार की चिंता करनी चाहिए जहां सब कुछ छोड़ कर जाना ही है,
जिसे पारलौकिक सुख कहते हैं? इसलिए हे मानव! प्रभु के आगे अपनी प्रार्थना समर्पित
करके देख, जो कुछ भी तूने कमाया है उसे प्रभु को सौंप दे, यह समझ कर कि
सब कुछ प्रभु का ही है। इस समर्पण भाव से तू इस संसार से पार उतर
जाएगा। जो प्रभु का होकर रहेगा, पारलौकिक सुख को पाकर ईश्वर भक्ति रूपी
सुख में मगन होकर, प्रभु के धाम में स्थान पाएगा। जो समर्पित भाव से कर्म करेगा
उसे इस जन्म में शांति, और मृत्यु के उपरांत प्रभु का सामीप्य अवश्य प्राप्त होगा, बस! तू
निर्मल मन से कह, हे प्रभु! मैं तेरा और तू मेरा? तू ही मेरा पालनहार है?
यह प्रार्थना भाव मन में धारण करके जब तू अपनी निष्काम भक्ति रूपी
साधना करेगा, तो ईश्वर की कृपा क्यों नहीं बरसेगी?
ईश्वर को जानने की नहीं, भाव से मानने की वस्तु है।
यह संसार भले ही कितना भी विशाल हो परंतु जब हम मन को एकाग्र करके, इस
परम तत्व को जानने बैठेंगे? तब हमें ज्ञात होगा कि संसार में ज्ञान, विज्ञान और बुद्धि
का बहुत बड़ा क्षेत्र है। यह सब कुछ जान लेने पर भी जब हम शांति को खोजेंगे, तब-
तब हमारे मन में ईश्वर के प्रति एक तीव्र प्यास जगेगी, व यही प्यास संसार
के सब सुख-साधनों से परे होकर हमें, उस परम चेतना की ओर ले जाएगी।
सांसारिक सुख-भोगों का अंततः नाश होगा, पर ईश्वर शाश्वत है, यह बात समझ
कर, हम ईश्वर शरणागत हो जाएंगे।
उठो! जागो, जाग्रत बनो, इस मन, बुद्धि, इंद्रियों को, अहंकार को, काम को,
क्रोध को प्रभु के चरणों में समर्पित कर ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाओ। आओ,
सब मिलकर, एक होकर, निष्काम भाव से ईश्वर के चरणों में वंदन करते हुए, उनकी स्तुति गाएं।
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