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न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

न्यायबिन्दु २६
धर्मशास्त्रोंके बनानेवाले। इस प्रकार गौतम आदिसे रागादिमत्त्व साधनधर्म की
व्यावृत्ति की।
संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेकः ।
यथाऽवीतरागाः कपिलादयः परिग्रहाग्रहयोगादिति ।
संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेक—
जैसे—कपिल आदि वीतराग नहीं है; क्योंकि उनमें परिग्रह और आग्रह है।
अत्र वैधर्म्योदाहरणम् ।
यो वीतरागो न तस्य परिग्रहाग्रहौ यथा ऋषभादेरिति ।
ऋषभादेरवीतरागत्वपरिग्रहाग्रहयोगयोः साध्यसाधनधर्मयोः
संदिग्धो व्यतिरेकः ।
इसमें वैधर्म्योदारण—
जो वीतराग होता है उसके परिग्रह और आग्रह नहीं होता। जैसे—ऋषभ आदि।
ऋषभ आदि के साध्यधर्म अवीतरागत्व और साधनधर्म परिग्रह और आग्रहके योगमें
व्यतिरेक संदिग्ध है।
अव्यतिरेको यथाऽवीतरागो वक्तृत्वात् ।
अव्यतिरेक—
वक्ता होनेसे वीतराग नहीं है।
वैधर्म्योदाहरणं यत्र वीतरागत्वं नास्ति स वक्ता । यथोपलखण्ड
इति । यद्यप्युपलखण्डादुभयं व्यावृत्तया सर्वो वीतरागो न
वक्तेति व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेरव्यतिरेकः ।
वैधर्म्योदाहरण—
जिसमें वीतरागता होती है वह वक्ता नहीं होता। जैसे—पाषाणखण्ड। यद्यपि
पाषाणखण्डसे दोनों की व्यावृत्ति हो जानेसे 'सभी वीतराग वक्ता नहीं होते' इस व्याप्तिसे
व्यतिरेकके सिद्ध न होनेसे अव्यतिरेक है।
अप्रदर्शितव्यतिरेको यथा—अनित्यः शब्दः कृतकत्वादाकाशवदिति।
अप्रदर्शितव्यतिरेक—
जैसे—शब्द अनित्य है; क्योंकि वह आकाशके समान कृतक है।
वैधर्म्येणापि विपरीतव्यतिरेको यथा यदकृतकं तन्नित्यं भवतीति ।
वैधर्म्यसे भी विपरीतव्यतिरेक—
जो कृतक नहीं होता वह नित्य होता है।
न ह्येभिर्दृष्टान्ताभासै र्हेतोः सामान्यलक्षणं सपक्ष एव सत्त्वं विपक्षे

३० भाषाटीका सहित
च सर्वत्रासत्त्वमेव निश्चयेन शक्यं दर्शयितुं विशेषलक्षणं वा ।
इन दृष्टान्ताभासों से हेतुका सामान्यलक्षण, सपक्षमें ही रहना और विपक्षमें सर्वत्र
अभाव अथवा विशेषलक्षणको निश्चय रूपसे दिखला ही नहीं सकते ।
तदर्थापत्त्यैषां निरासो वेदितव्यः ।
अत एव उनका निराकरण अर्थापत्ति ( सामर्थ्य ) से ही जान लेना चाहिये ।
दूषणं न्यूनतायुक्तिः ।
न्यूनता का कहना दूषण है ।
ये पूर्वं न्यूनतादयः साधनदोषा उक्तास्तेषामुद्भावनं दूषणम् ।
जो पहिले न्यूनता आदि साधनदोष कहे हैं उनका कहना दूषण है ।
तेन परेष्टार्थसिद्धिप्रतिबन्धात् ।
क्योंकि उससे दूसरेके इष्ट अर्थ की सिद्धिमें रुकावट होती है ।
दूषणाभासास्तु जातयः ।
दूषणाभास जातियाँ हैं ।
अभूतदोषोद्भावनानि जात्युत्तराणीति ।
अभूत दोषका प्रकट करना जात्युत्तर है ।
इति तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
न्यायबिन्दुः समाप्तः ।
इति तृतीय परिच्छेद समाप्त ।
न्यायविन्दु समाप्त ।
१. मुद्रित पुस्तक में 'अनुभूत०' पाठ है । किन्तु टीका से हमारे ही पाठ की पुष्टि होती है ।
इसके अतिरिक्त पहिले पाठ से अर्थ भी ठीक नहीं बैठता ।

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